- 1975 में शिया और सुन्नी मुसलमानों के बीच गृहयुद्ध शुरू हुआ, जिससे लेबनान में धार्मिक समीकरण प्रभावित हुए
- 1979 में ईरान की सरकार ने लेबनान के शियाओं को हथियार देना शुरू किया, जिससे उनकी सत्ता में मजबूती आई
- 1985 में ईरान की मदद से हिजबुल्लाह की स्थापना हुई, जो बाद में दक्षिणी लेबनान पर प्रभुत्व स्थापित करने लगा
1943 में लेबनान में शिया, सुन्नी और ईसाइयों के बीच राजनीतिक समझौता हुआ. इस समझौते के तहत सुन्नी मुसलमानों को प्रधानमंत्री, ईसाइयों को राष्ट्रपति और शिया मुसलमानों को संसद स्पीकर का पद दिया गया. यह समझौता करीब 25 साल तक चला, लेकिन अंदर-अंदर शिया सुलगते रहे. धीरे-धीरे फिलिस्तीन से सुन्नी मुसलमानों के आने के कारण लेबनान में धार्मिक समीकरण और गड़बड़ाने लगे. शिया मुसलमानों को लगने लगा कि उन्हें सत्ता में मिल रही भागीदारी भी समाप्त हो जाएगी.
1979 से ताकत मिलनी शुरू हुई
लेबनान की सत्ता से बेदखल होने के डर से 1975 में लेबनान में शिया और सुन्नी मुसलमानों के बीच भीषण गृहयुद्ध शुरू हो गया. इस दौरान फिलीस्तीनी लड़ाके मौके का फायदा उठाकर दक्षिणी लेबनान से इजरायल पर हमले करने लगे. इसके बाद 1978 में जवाबी कार्रवाई करते हुए इजरायल ने लेबनान के कई हिस्सों पर कब्जा कर लिया. 1979 में शिया बहुल ईरान में सरकार बदली और उसने लेबनान में कमजोर पड़े शियाओं को हथियार देना शुरू कर दिया. ये सरकार थी खामेनेई की. इससे लेबनान में एक बार फिर शिया मुस्लिम मजबूती से उभरे और उन्होंने हथियारों के दम पर लेबनान पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया.
1985 में हुई स्थापना
साल 1982 में इजरायल ने लेबनान पर फिर हमला किया था. यह हमला फिलिस्तीन मुक्ति संगठन के हमले के जवाब में किया गया था. इजरायल ने बेरूत समेत दक्षिणी लेबनान पर कब्जा कर लिया, मगर इस बीच सबरा और शतीला नरसंहार में करीब तीन हजार फिलिस्तीनी शरणार्थी और लेबानानी नागरिकों की जान चली गई थी. इस घटना के बाद ईरान की मदद से हिजबुल्लाह का उदय हुआ. हालांकि, आधिकारिक रूप से हिजबुल्लाह की स्थापना 1985 में हुई.
कई देशों की सेना पर पड़ा भारी
दक्षिणी लेबनान और बेका घाटी पर हिजबुल्लाह का प्रभुत्व है. मौजूदा समय में वह दुनिया के सबसे शक्तिशाली मिलिशिया में से एक है.1983 में हिजबुल्लाह ने बेरूत में अमेरिका और फ्रांस की सेना के 300 जवानों की बम हमले में जान ले ली थी. हिजबुल्लाह की ताकत का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि साल 2000 में इजरायली सेना को अपने कदम दक्षिणी लेबनान से पीछे खींचने पड़े थे.
इसलिए आज भी ईरान के साथ
लेबनान में हिजबुल्लाह सैन्य के साथ-साथ एक बड़ी राजनीतिक ताकत भी है. 1992 में लेबनान में गृह युद्ध थमा. इसके बाद पहली बार आठ सीटों पर हिजबुल्लाह को संसदीय चुनाव में जीत मिली थी. 1993 में भी हिजबुल्लाह ने उत्तरी इजरायल पर हमला किया था. इसके जवाब में इजरायल ने "ऑपरेशन अकाउंटेबिलिटी" शुरू किया था. इस इजरायली ऑपरेशन में 118 लेबनानी नागरिकों की जान गई थी. हिजबुल्लाह का मकसद सशस्त्र संघर्ष के जरिये इजरायल को खत्म करना और अमेरिकी आधिपत्य और क्रूर पूंजीवादी ताकतों के खिलाफ लड़ना है. यही कारण है कि हिजबुल्लाह आज भी ईरान के लिए खड़ा है और अमेरिका और इजरायल पर हमले कर रहा है. हालांकि, इजरायल ने उसे भी बहुत कमजोर कर दिया है.
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