- अगस्त में ईरान की सालाना महंगाई 84.4% पहुंची और खाने की कीमतों में भारी उछाल आया.
- डॉलर करीब 20 लाख रियाल तक पहुंचा, जबकि पेट्रोल स्टेशनों के बाहर लंबी कतारें लगीं.
- तेल निर्यात और विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ने से आम लोगों की गरीबी और बढ़ने का खतरा है.
ईरान की अर्थव्यवस्था इस समय ऐसे दौर से गुजर रही है जहां आम लोगों की सबसे बड़ी चिंता घर, कार या दूसरी बड़ी चीजें खरीदना नहीं, बल्कि महीने का राशन और इलाज का खर्च निकालना बन गई है. अमेरिका ने अब ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट नाम से नए प्रतिबंध लगाने की शुरुआत की है. लेकिन ईरान में कई लोगों को लगता है कि देश की अर्थव्यवस्था पहले ही इतनी खराब स्थिति में है कि नए प्रतिबंधों का असर सीधे आम लोगों की जिंदगी पर पड़ेगा.
अगस्त 2026 में पिछले साल की तुलना में ईरान में खाने-पीने की चीजों की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हुई है.
सब्जी तेल 383% महंगा हुआ.
अंडों की कीमत 294% बढ़ी.
चिकन 177% महंगा हुआ.
रेड मीट की कीमत 148% बढ़ी.
वहीं बीते महीने के अंत में ईरान के सांख्यिकी केंद्र ने बताया कि अगस्त में सालाना महंगाई दर 84.4% पर पहुंच गई. पिछले 12 महीनों का औसत भी करीब 65 फीसद रहा. इसका सीधा असर लोगों की खरीद क्षमता पर पड़ा है. परिवारें कम सामान खरीद रहे हैं, खाने की क्वालिटी लगातार घट रही है और लोग पुराने कपड़ों को बदलने के बजाय उनकी मरम्मत कर उन्हें इस्तेमाल कर रहे हैं.
ईरानी मुद्रा भी रिकॉर्ड निचले स्तर पर
ईरान की आर्थिक मुश्किलों का एक बड़ा कारण उसकी मुद्रा रियाल का लगातार कमजोर रहना भी है. वहीं एक अमेरिकी डॉलर की कीमत
ईरान की आर्थिक परेशानी का एक बड़ा कारण उसकी मुद्रा रियाल का लगातार कमजोर होना है. अगस्त में एक अमेरिकी डॉलर की कीमत 20 लाख रियाल तक पहुंच गई थी. हालांकि फिलहाल यह 13,74,600 पर है. रियाल की घटती कीमतों की बड़ी वजह विदेशी मुद्रा की कमी को बताया गया है.
जब स्थानीय मुद्रा तेजी से गिरती है तो विदेशों से आने वाली चीजें महंगी हो जाती हैं. इसका असर दवाओं, खाद्य पदार्थों और दूसरी जरूरी चीजों पर पड़ता है.

मीट खाना कई परिवारों की पहुंच से बाहर
महंगाई का स्पष्ट असर लोगों के खाने की चीजों पर दिख रहा है. अप्रैल 2026 में ईरान में रेड मीट की मांग पिछले साल के इसी महीने की तुलना में 50 फीसद कम हो गई.
लोग मीट की जगह आलू जैसे सस्ते विकल्पों की ओर जा रहे हैं. इससे कुछ जगहों पर आलू की आपूर्ति में कमी भी देखने को मिली. ईरानी नागरिकों के मुताबिक अब समस्या यह नहीं है कि वे घर या कार खरीद सकते हैं या नहीं. समस्या यह है कि वे मीट खरीदें या नहीं, खाने की क्लालिटी को कैसे बनाए रखें और इलाज को कितना टालें?
पेट्रोल के लिए लंबी कतारें क्यों लगीं?
आर्थिक संकट का असर केवल खान-पान तक ही सीमित नहीं है. राजधानी तेहरान और देश के दूसरे बड़े शहर पूर्वोत्तर के मशहद में पेट्रोल पंपों के बाहर लोगों को कतारें देखने को मिल रही हैं. कुछ कतारों ने पूरी सड़क को जाम कर दिया है. कई पेट्रोल पंप बंद भी हैं.
हालांकि सरकार ने इसकी वजह घबराहट में अधिक पेट्रोल खरीदने की कोशिश और संभावित कीमत बढ़ने की अफवाहों को बताया. साथ ही, तेहरान के तीन प्रमुख तेल डिपो में से दो पर इजरायली हमलों से नुकसान की बात भी सामने आई.

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पेट्रोल की कीमत बढ़ाना सरकार के लिए क्यों मुश्किल है?
ईरान सरकार लंबे समय से महंगी ईंधन सब्सिडी कम करने और पेट्रोल की कीमत बढ़ाने पर विचार कर रही है.
लेकिन सरकार को 2019 का अनुभव याद है.
नवंबर 2019 में पेट्रोल की कीमत अचानक 50% बढ़ाई गई थी. इसके बाद कई दिनों तक हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए थे.
इसलिए मौजूदा आर्थिक संकट में पेट्रोल की कीमत बढ़ाना सरकार के लिए सिर्फ आर्थिक फैसला नहीं, बल्कि बड़ा राजनीतिक जोखिम भी है.
ईंधन तस्करी ने संकट को और पेचीदा बनाया
ईरान के भीतर ईंधन तस्करी भी बड़ा मुद्दा बन गई है.
ईरान के राष्ट्रपति के डिप्टी साकब एस्फहानी ने दावा किया कि देश के दोनों राजनीतिक धड़े ईंधन तस्करी में शामिल हैं. उनके मुताबिक अगर वह इसे बंद करने की कोशिश करेंगे तो संबंधित लोग उनके खिलाफ खड़े हो जाएंगे.
इस बयान के बाद राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से मामले की जांच की मांग की गई है.

सरकार अब गरीबी के आंकड़े भी सीमित करेगी
आर्थिक संकट के बीच पारदर्शिता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं.
ईरानी सरकार की प्रवक्ता फातेमा मोहाजेरानी ने कहा है कि भविष्य में गरीबी से जुड़े आंकड़े तभी प्रकाशित किए जाएंगे जब राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद इसकी अनुमति देगी.
इसका मतलब है कि देश में लोगों के जीवन स्तर में गिरावट के आंकड़े भी सार्वजनिक करना ज्यादा मुश्किल हो सकता है.
सरकार लोगों से 'देशभक्ति' की अपील कर रही है
ईरानी नेतृत्व अब आर्थिक संकट को अमेरिका के खिलाफ युद्ध के व्यापक संघर्ष का हिस्सा बता रहा है.
बसीज अर्धसैनिक बल के नए प्रमुख ताएब ने लोगों से पेट्रोल की खपत 10% तक कम करने की अपील की. कम यात्रा करना भी देशभक्ति का हिस्सा बताया गया.
वहीं राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के नए और ज्यादा कट्टरपंथी सचिव मोहम्मद रेजाई ने युवाओं को घर पर ही जरूरी सामान बनाने की सलाह दी.
लेकिन ईरान के एक आर्थिक पत्रिका के संपादक ने इस सलाह की तुलना माओ के चीन में 'बैकयार्ड स्टील फर्नेस' अभियान से की, जिसका नतीजा बेहद खराब रहा था.

असली संकट तेल निर्यात का है?
ईरान के ऊर्जा विशेषज्ञ आमिर हुसैन हाशेमी-जाविद के मुताबिक देश की सबसे बड़ी आर्थिक समस्या यह है कि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान के लिए तेल निर्यात करना मुश्किल है.
तेल ईरान की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण आय का स्रोत है. अगर तेल कुएं से निकलने के बावजूद ग्राहकों तक नहीं पहुंचता, तो उससे सरकार को राजस्व नहीं मिलता. उल्टा उसके उत्पादन, भंडारण और सुरक्षा पर खर्च बढ़ता रहता है.
यही वजह है कि अमेरिकी प्रतिबंधों का असर सिर्फ सरकार की आय पर नहीं, बल्कि आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर भी पड़ सकता है.
ईरान के सामने अब एक बड़ा सवाल है. क्या लगातार टकराव और प्रतिबंधों के बीच आगे बढ़ना ज्यादा फायदेमंद है या कूटनीति के जरिए आर्थिक दबाव कम करने की कोशिश करना?
अर्थव्यवस्था पहले ही महंगाई, मुद्रा संकट, ईंधन की कमी और तेल निर्यात पर दबाव से जूझ रही है. ऐसे समय में नए अमेरिकी प्रतिबंध हालात को और कठिन बना सकते हैं.
सबसे बड़ी चिंता यही है कि आर्थिक संकट का बोझ अंततः सरकार पर नहीं, बल्कि आम ईरानी परिवारों पर पड़ेगा.
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