यह ख़बर 17 नवंबर, 2013 को प्रकाशित हुई थी

कोलंबो ने खारिज की मानवाधिकार जांच की दलील

कोलंबो:

राष्ट्रमंडल के शासनाध्यक्षों की बैठक (चोगम) में हिस्सा लेने आए ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन की मानवाधिकार रिकार्ड की अंतरराष्ट्रीय जांच की चेतावनी को खारिज करते हुए श्रीलंका ने शनिवार को जोर देकर कहा कि राष्ट्रमंडल अपने सदस्य देश पर अपना फैसला नहीं थोप सकता है।

समाचार एजेंसी सिन्हुआ के मुताबिक कैमरन ने कहा कि यदि मार्च 2014 तक श्रीलंका मुद्दे का समाधान करने में विफल रहता है तो अंतरराष्ट्रीय जांच कराई जाएगी।

श्रीलंका के उत्तरी क्षेत्र का दौरा करने वाले कैमरन ने शुक्रवार को कहा था, "मैंने श्रीलंका के राष्ट्रपति को साफ कर दिया है कि उनके पास उदारता दिखाने और सुधार करने और अपने देश के बेहतर एवं समग्र भविष्य सुनिश्चित अवसर है और मुझे उम्मीद है कि वे अवसर को हाथ में लेंगे।"

श्रीलंका में गृह युद्ध की विभीषिका झेल चुके क्षेत्र का दौरा करने वाले कैमरन 1948 में श्रीलंका के स्वतंत्र होने के बाद जाफना की यात्रा करने वाले पहले विदेशी नेता हैं। उन्होंने जोर दिया कि उनकी यात्रा ने 'उत्तर के तमिलों को एक आवाज दी है और इस आवाज को दुनिया को सुननी होगी।'

कैमरन ने कहा, "मैं यह साफ कर देना चाहता हूं कि यदि मार्च तक जांच पूरी नहीं हुई तो मैं संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) में अपनी हैसियत का प्रयोग करूंगा और एक विश्वसनीय अंतरराष्ट्रीय जांच का आह्वान करूंगा।"

श्रीलंकाई संसद के अध्यक्ष निमाल सिरिपाला डीसिल्वा ने इस बात पर जोर दिया कि उनका देश एक संप्रभु राष्ट्र है इसलिए यह किसी अंतरराष्ट्रीय जांच के प्रयासों का विरोध करेगा।

डीसिल्वा ने कहा कि यह ब्रिटेन द्वारा दी गई कोई पहली चेतावनी नहीं है। उन्होंने कहा कि श्रीलंका सरकार देश के मानवाधिकारों के मसले पर अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप रोकने के लिए यूएनएचआरसी के अन्य सदस्यों से अपील करेगी।

यूएनएचआरसी श्रीलंका पर 2012 और 2013 में दो प्रस्ताव पारित कर चुका है और देश मार्च 2014 में फिर से परीक्षण के दौर का सामना करेगा।

डीसिल्वा ने कहा, "राष्ट्रमंडल का इस्तेमाल एक वैश्विक पुलिस के रूप में नहीं किया जाएगा।" उत्तरी श्रीलंका में हुए कथित मानवाधिकार उल्लंघनों का हवाला देते हुए डीसिल्वा ने कहा कि उत्तर के अधिकांश लोगों का ख्याल रखा गया है और देश पर लगाए जा रहे मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप निराधार हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रमंडल एक ऐसा मंच होना चाहिए, जिसके जरिए इसके सदस्य देश सहमति पर पहुंचने के लिए साथ काम करें, किसी को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी के मसले पर फैसला सुनाए।

डीसिल्वा ने राष्ट्रमंडल के शासनाध्यक्षों की बैठक (चोगम) से अलग एक प्रेस वार्ता में कहा, "राष्ट्रमंडल में सभी देश समान हैं। हमें एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए और एक-दूसरे के मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।"

श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे 2015 तक राष्ट्रमंडल के अध्यक्ष रहेंगे। श्रीलंका चोगम की मेजबानी भी कर रहा है।

श्रीलंका सरकार ने तीन दशकों तक लिट्टे के खिलाफ युद्ध लड़ा और अंत में 2009 में उसने लिट्टे को पूरी तरह परास्त कर दिया, लेकिन इसे मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामलों में अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना करना पड़ रहा है।

कनाडा के प्रधानमंत्री स्टीफन हार्पर और मॉरिशस के प्रधानमंत्री नवीनचंद्र रामगुलाम ने चोगम में शिरकत न करने का फैसला किया।

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भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी घरेलू दबाव के कारण 10 नवंबर को इस बैठक में हिस्सा न लेने की घोषणा की थी।