- चीन ने 1972 में जापान को पांडा भेंट करके दोनों देशों के बीच रिश्तों को सामान्य करने की शुरुआत की थी
- जापान के आखिरी दो पांडा जिओ जिओ और लेई लेई 25 जनवरी को चीन लौट रहे हैं, जिससे जापान में पांडा खत्म हो जाएंगे
- चीन और जापान के बिगड़ते राजनयिक संबंधों के कारण जापान को चीन से नए पांडा मिलने की संभावना कम है
चीन से जापान आए आखिरी 2 पांडा भी वापस चीन लौट रहे हैं. जापान के हजारों लोग 25 जनवरी को पांडा के जुड़वां बच्चों, जिओ जिओ और लेई लेई को चीन लौटने से पहले टोक्यो के उएनो चिड़ियाघर में आखिरी बार देखने के लिए जमा हुए थे. ये दोनों पांडा मंगलवार को चीन चले जाएगा और इसका मतलब यह है कि पिछले 54 साल में पहली बार ऐसा होगा जब जापान में कोई पांडा नहीं रह जाएगा. यह वाकया उस समय हो रहा है कि चीन और जापान के संबंध पिछले कई सालों में सबसे निचले स्तर पर हैं और इस बात की संभावना कम है कि जापान को बदले में कोई और पांडा चीन से मिलेगा.
चलिए आपको यहां बताते हैं कि चीन और जापान के बीच कैसे 54 साल पहले 'पांडा डिप्लोमेसी' की शुरुआत हुई थी. अब जापान के ये आखिरी दो पांडा वापस चीन क्यों जा रहे हैं. इससे जापान को क्या घाटा होगा. आखिर अभी चीन और जापान के रिश्ते हद से अधिक खराब कैसे हो गए हैं. इस सभी सवालों का जवाब आपकों यहां एक-एक करके देते हैं.
Q- 54 साल पहले कैसे शुरू हुई पांडा डिप्लोमेसी?
चीन ने पहली बार 1972 में जापान में दो पांडा भेजे थे. यह एक तरह से जापान को दिया चीन का गिफ्ट था. तनाव के बीच दोनों देशों ने अपने रिश्तों को सामान्य करने की कवायद की थी और उसे ही चिह्नित करने के लिए था चीन ने पांडा भेजा था. प्यारे काले और सफेद भालू ने तुरंत ही जापानियों का दिल जीत लिया, और उनसे पैदा हुए तमाम पांडा जापान में नेशनल सेलिब्रिटी बन गए.
जापान में जो दो पांडा सबसे पहली बार आए थे उनका नाम था- कांग कांग और लैन लैन. चीन का यह गिफ्ट 28 अक्टूबर, 1972 को उएनो चिड़ियाघर पहुंचा था. उस समय जापान के प्रधान मंत्री, काकुई तनाका और चीनी प्रधान मंत्री झोउ एनलाई ने देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाने के लिए इससे एक महीने पहले ही संयुक्त विज्ञप्ति पर हस्ताक्षर किया था. तब जापान ने कहा था कि वह ताइवान को चीनी क्षेत्र का "अभिन्न हिस्सा" मानकर उसपर चीन के दावे को "पूरी तरह से समझता है और उसका सम्मान करता है".
Q- आखिरी दो पांडा वापस चीन क्यों जा रहे हैं?
जापान मुख्य रूप से मौजूदा लीज समझौतों और दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों में महत्वपूर्ण गिरावट के कारण अपने आखिरी दो विशाल पांडा चीन को लौटा रहा है. चीन की "पांडा डिप्लोमेसी" नीति के तहत, सभी पांडा पर (चाहे वो विदेश में जन्मे हो) तकनीकी रूप से चीन का स्वामित्व है. अभी जो दो जुड़वां पांडा चीन जा रहे हैं, जिओ जिओ और लेई लेई, वे 2021 में टोक्यो के उएनो चिड़ियाघर में पैदा हुए थे. टोक्यो मेट्रोपॉलिटन सरकार और चीन के वन्यजीव संरक्षण संघ के बीच एक कौन्ट्रैक्ट के तहत वे चीन लौटने वाले थे और अब वही हो रहा है.
इन दोनों की चीन वापसी तो पहले से निर्धारित थी, लेकिन उनके बदले चीन से कोई नया पांडा नहीं आ रहा है, यह बड़ी बात है. दोनों देशों के बीच ऐसा कोई समझौता नहीं हो पाया है और यह दोनों के बीच संबंधों के बिगड़ने से जुड़ा है.
Q- पांडा के लौटने से जापान को क्या घाटा होगा?
कंसाई यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर कात्सुहिरो मियामोतो के अनुसार, टोक्यो के उएनो चिड़ियाघर में पांडा की गैरमौजूदगी से लगभग 20 बिलियन येन ($128 मिलियन) का सालाना नुकसान होगा. भारतीय करेंसी में यह रकम 1173 करोड़ रुपए के आसपास बैठती है. एपी की रिपोर्ट के अनुसार मियामोतो ने एक बयान में कहा, "अगर स्थिति कई वर्षों तक ऐसी रहती है, तो पांडा न होने का नकारात्मक आर्थिक प्रभाव दसियों अरब येन तक पहुंचने की उम्मीद है. पांडा-प्रेमी जापानियों के लिए, जिनमें मैं भी शामिल हूं, मुझे आशा है कि वे जल्द वापस आएंगे."
Q- चीन और जापान के रिश्ते हद से अधिक खराब कैसे हो गए हैं?
जापान को चीन के साथ बढ़ते राजनीतिक, व्यापार और सुरक्षा तनाव का सामना करना पड़ रहा है. जापान की प्रधान मंत्री साने ताकाची ने हाल ही में टिप्पणी की थी कि अगर ताइवान के खिलाफ चीन कोई कार्रवाई करता है तो जापानी हस्तक्षेप कर सकता है. ताइवान एक स्व-शासित लोकतांत्रिक द्वीप है और उसपर चीन अपना दावा करता है. जापान के इस बयान के बाद से चीन और उनके बीच तनाव चरम पर पहुंच चुका है. तब से दोनों देश एक-दूसरे के प्रति बढ़ती शत्रुतापूर्ण कार्रवाइयों और बयानबाजी में लगे हुए हैं. इस महीने की शुरुआत में, चीन ने जापान को रेयर अर्थ मेटल्स से संबंधित उत्पादों के निर्यात पर प्रतिबंध कड़े कर दिए.
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