बांग्लादेश इन दिनों एक ऐसे स्वास्थ्य संकट से जूझ रहा है, जिसने हजारों परिवारों की जिंदगी बदल दी है. देश में फैले खसरे के प्रकोप ने मार्च 2026 से अब तक 986 बच्चों की जान ले ली है और यह संख्या 1,000 के भयावह आंकड़े के करीब पहुंच चुकी है. राजधानी ढाका के शिशु अस्पतालों में हर दिन नए मरीज पहुंच रहे हैं, जबकि कई बच्चे इलाज के दौरान दम तोड़ रहे हैं. माता-पिता अपने मासूम बच्चों को बचाने के लिए अस्पतालों के चक्कर काट रहे हैं. डॉक्टरों के अनुसार कुपोषण, देर से इलाज और टीकाकरण में आई बाधाओं ने इस महामारी को और घातक बना दिया है. यह संकट अब पूरे देश के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गया है.
अस्पतालों में गूंज रही बच्चों की चीखें, 'हमने दो को मरते देखा'
ढाका के शिशु अस्पताल में इन दिनों हालात बेहद चिंताजनक हैं. वार्डों में बीमार बच्चों की आवाजें, ऑक्सीजन मशीनों की लगातार आती आवाज और चिंतित परिजनों की भीड़ हर तरफ दिखाई देती है. न्यूज एजेंसी AFP के अनुसार, 30 वर्षीय रीमा अख्तर अपने नौ महीने के बेटे साबित हक के पास बैठी थीं. उन्होंने बताया, 'सिर्फ एक घंटे पहले एक बच्चे की मौत हो गई और उसका शव हमारे सामने से ले जाया गया. आज हमने दो बच्चों को मरते देखा है.' साबित हक उन दर्जनों बच्चों में शामिल है जो खसरे के वार्ड में भर्ती हैं और इलाज करा रहे हैं.
Bangladesh's deadliest measles outbreak in decades is nearing the grim milestone of 1,000 child deaths, as a devastating epidemic sweeps through the country and crowded hospital wards fill with struggling babies.
— AFP News Agency (@AFP) September 5, 2026
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986 बच्चों की मौत, 1.80 लाख से ज्यादा मामले
बांग्लादेश के स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, मार्च से अब तक खसरे से 986 बच्चों की मौत हो चुकी है. वहीं 1 लाख 80 हजार से अधिक संदिग्ध और पुष्ट मामले सामने आ चुके हैं. स्थिति इतनी गंभीर है कि देश में हर दिन 1,000 से अधिक नए संदिग्ध मामले दर्ज किए जा रहे हैं.
Does a fever always mean measles?
— UNICEF Bangladesh (@UNICEFBD) August 27, 2026
And if it is measles, does your child always need to go to the hospital?
Watch Dr. Riad Mahmud, Health Manager, Immunization, UNICEF Bangladesh, answer these questions and more. pic.twitter.com/8Qeh2Clygh
AFP के अनुसार, 19 वर्षीय संजना इस्लाम मोदिना पिछले कई सप्ताह से अपने छह महीने के बेटे आयान को बचाने के लिए एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल का चक्कर लगा रही हैं. आयान के चेहरे और सिर पर खसरे के निशान अभी भी दिखाई दे रहे हैं. जुलाई में उसे निमोनिया के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया था. बाद में वह खसरे की चपेट में आ गया.
विशेष दूध दिया जा रहा
मध्य अगस्त में उसे ढाका के विशेष बाल अस्पताल में बिस्तर मिला. आयान ने 15 दिन गहन चिकित्सा इकाई (ICU) में बिताए. अब उसकी हालत में कुछ सुधार हुआ है, लेकिन वह अभी भी ऑक्सीजन सपोर्ट पर है. मोदिना ने कहा, 'निमोनिया की वजह से उसके फेफड़े पहले ही बहुत कमजोर हो चुके थे. खसरे ने उसकी सांस लेने की परेशानी और बढ़ा दी. पिछले पांच दिनों से उसे लगातार ऑक्सीजन दी जा रही है.' उन्होंने बताया कि डॉक्टरों ने आयान को कुपोषित बच्चों के लिए तैयार विशेष दूध भी देना शुरू किया है.

सबसे ज्यादा खतरे में छोटे बच्चे
डॉक्टरों के अनुसार मौजूदा प्रकोप में अधिकतर संक्रमित बच्चों की उम्र छह महीने से पांच साल के बीच है. अस्पताल पहुंचने वाले कई बच्चे गंभीर हालत में होते हैं. कुपोषण के कारण उनके शरीर में संक्रमण से लड़ने की क्षमता और कम हो जाती है. यही वजह है कि कई मामलों में बीमारी जानलेवा साबित हो रही है.
'विनाशकारी प्रकोप'; टीकाकरण में देरी बनी बड़ी वजह
प्रधानमंत्री तारिक रहमान के स्वास्थ्य मामलों के विशेष सहायक एस.एम. जियाउद्दीन हैदर ने इस प्रकोप को 'विनाशकारी' बताया है. उन्होंने कहा कि बांग्लादेश ने पहले संक्रामक बीमारियों के खिलाफ टीकाकरण अभियान में बड़ी सफलता हासिल की थी, लेकिन वर्ष 2024 में प्रस्तावित खसरा टीकाकरण अभियान राजनीतिक उथल-पुथल के कारण टल गया. इसके बाद 2025 में श्रमिक हड़तालों और राजनीतिक अस्थिरता ने भी टीकाकरण अभियान को प्रभावित किया. हैदर ने कहा, 'काफी संख्या में बच्चे टीकों की खुराक से वंचित रह गए थे. अब स्वास्थ्यकर्मी घर-घर जाकर इन बच्चों का टीकाकरण कर रहे हैं ताकि इस कमी को दूर किया जा सके.'
जागरूकता बढ़ाने पर जोर
इंस्टीट्यूट ऑफ एपिडेमियोलॉजी, डिजीज कंट्रोल एंड रिसर्च (IEDCR) के पूर्व निदेशक और महामारी विशेषज्ञ महमूदुर रहमान का मानना है कि मौजूदा संकट को नियंत्रित करने के लिए व्यापक टीकाकरण अभियान की जरूरत है. उन्होंने कहा कि संक्रमित बच्चों को अलग रखना, हाथों की नियमित सफाई और देखभाल करने वालों द्वारा मास्क का इस्तेमाल जैसे उपाय भी बेहद जरूरी हैं.
बांग्लादेश में खसरे का यह प्रकोप अब सिर्फ एक स्वास्थ्य आपदा नहीं रह गया है, बल्कि हजारों परिवारों के लिए दर्द, चिंता और अनिश्चितता की कहानी बन चुका है.
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