- बांग्लादेश के विदेश मंत्री का भारत दौरा नई सरकार के बाद दोनों देशों के बीच पहला उच्चस्तरीय संपर्क होगा
- जल विवाद खासकर तीस्ता नदी के पानी के बंटवारे और सीमा पार मौतों के मामले इस बातचीत का मुख्य एजेंडा होंगे
- ऊर्जा सहयोग में स्थिर बिजली आपूर्ति, ईंधन और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर द्विपक्षीय सहयोग की उम्मीद
शेख हसीना की सरकार के सत्ता से बाहर होने के बाद भारत‑बांग्लादेश संबंधों में कुछ तल्खियां और असहजता देखने को मिली थी. बदले राजनीतिक समीकरणों के बीच अब दोनों देश रिश्तों को नए सिरे से संतुलित करने की दिशा में कोशिश होती दिखने लगी है. इसी क्रम में बांग्लादेश के विदेश मंत्री डॉ. खलीलुर रहमान 7 से 9 अप्रैल तक भारत के दौरे पर हैं. तारीक रहमान के नेतृत्व वाली नई सरकार के गठन के बाद यह दोनों देशों के बीच पहला उच्चस्तरीय आधिकारिक संपर्क होगा, जिस पर नई दिल्ली और ढाका दोनों की नजरें टिकी हुई हैं. तीन दिन की इस यात्रा को भारत‑बांग्लादेश संबंधों में संभावित ‘रीसेट' के रूप में देखा जा रहा है. ढाका में नई राजनीतिक नेतृत्व के आने के बाद दोनों पक्षों से यह उम्मीद की जा रही है कि वे बीते तनावों को दरकिनार करते हुए आगे बढ़ेंगे और भरोसा बहाल करने, लंबे समय से लंबित मुद्दों पर संवाद तेज करने और रिश्तों को स्थिर व व्यावहारिक दिशा देने की कोशिश करेंगे.
पानी और सीमा के मुद्दे पर बात
बांग्लादेश की ओर से बातचीत में सबसे अहम मुद्दा जल‑विवाद रहने की संभावना है, खासकर सीमा पार बहने वाली नदियों को लेकर. तीस्ता नदी का मामला लंबे समय से लंबित है और ढाका लगातार जल के बंटवारे की मांग करता रहा है. ऐसे में नई सरकार से यह अपेक्षा की जा रही है कि वह इस मुद्दे पर ठोस प्रगति के लिए भारत से स्पष्ट रुख और पहल की मांग करेगी. भारत‑बांग्लादेश सीमा पर होने वाली मौतों का मामला भी बातचीत में संवेदनशील मुद्दा रहेगा. बांग्लादेश पहले भी तस्करी‑रोधी अभियानों के दौरान सीमा पर नागरिकों की मौतों पर चिंता जताता रहा है. इस बार भी ढाका की ओर से इन घटनाओं पर रोक लगाने और मानवीय सीमा प्रबंधन सुनिश्चित करने की मांग प्रमुखता से रखी जा सकती है.
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ऊर्जा सहयोग रहेगा एजेंडे में अहम
ऊर्जा सहयोग भी इस यात्रा के दौरान चर्चा का बड़ा विषय रहेगा. बांग्लादेश भारत से स्थिर ऊर्जा आपूर्ति को लेकर आश्वासन चाहता है, जिसमें बिजली निर्यात के साथ‑साथ ईंधन और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में संभावित सहयोग शामिल है. बांग्लादेश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों के मद्देनजर यह क्षेत्र द्विपक्षीय रिश्तों का एक महत्वपूर्ण स्तंभ माना जा रहा है. हालिया समय में प्रभावित हुई वीजा सेवाएं भी बांग्लादेश की चिंताओं में शामिल हैं. ढाका की ओर से छात्रों, मरीजों और व्यापारियों के लिए वीजा सुविधाओं को फिर से खोलने और विस्तार देने की मांग उठाई जा सकती है, ताकि लोगों के बीच संपर्क और आवाजाही को सामान्य किया जा सके.
संयुक्त राष्ट्र में समर्थन की उम्मीद
इसके अलावा बांग्लादेश संयुक्त राष्ट्र महासभा (PGA) के अध्यक्ष पद के लिए अपनी उम्मीदवारी के समर्थन को लेकर भी भारत से सहयोग चाहता है. यह उसकी वैश्विक कूटनीतिक भूमिका को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है. गौर करने वाली बात ये कि इस यात्रा में सबसे ज्यादा राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण का हो सकता है. बांग्लादेश में नई सरकार औपचारिक रूप से इस पर भारत से सहयोग का अनुरोध कर सकती है, जो नई दिल्ली के लिए एक जटिल कूटनीतिक चुनौती पेश कर सकता है.
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भारत की रणनीति: संयम और भरोसा‑निर्माण
भारतीय पक्ष इस यात्रा को द्विपक्षीय रिश्तों में नई शुरुआत के मौके के तौर पर देख रहा है. नई दिल्ली का फोकस नए नेतृत्व के साथ विश्वास‑निर्माण, संवाद बनाए रखने और रिश्तों को स्थिर रखने पर फोकस रहेगा. भारत की ओर से यह भी दोहराया जा सकता है कि वह बांग्लादेश के साथ रचनात्मक और सहयोगी साझेदारी का इच्छुक है. भारत की ओर से सीमा‑पार सुरक्षा, आतंकवाद‑रोधी सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर भी जोर दिए जाने की संभावना है. साथ ही, भारत यह संदेश देना चाहता है कि रिश्तों में सामान्य और व्यावहारिक कामकाजी तालमेल बना रहे, जिसमें उसकी रणनीतिक और सुरक्षा चिंताओं का भी ध्यान रखा जाए.
नए दौर की दिशा तय करेगी यह यात्रा
कुल मिलाकर देखा जाए तो बांग्लादेश के विदेश मंत्री की यह यात्रा शेख हसीना सरकार के बाद बदले हालात में भारत‑बांग्लादेश संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करने की दिशा में पहला अहम कदम मानी जा रही है. हालांकि कई मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं, लेकिन दोनों देश टकराव से बचते हुए साझा हितों और संवाद के रास्ते पर आगे बढ़ने के इच्छुक नजर आ रहे हैं. अब यह यात्रा यह संकेत देगी कि दोनों पड़ोसी देश इस नए चरण में रिश्तों को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं.
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