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बांग्लादेश क्यों बना 'प्रगति' की प्रगति में रोड़ा? भारत के पहले बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास से दूरी के क्या हैं मायने

भारत के पहले बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास 'प्रगति' से बांग्लादेश की दूरी ने दोनों देशों के रिश्तों में बढ़ती खटास की चर्चा तेज कर दी है. चीन और पाकिस्तान के साथ ढाका की बढ़ती नजदीकियों तथा बदले क्षेत्रीय समीकरणों के बीच इस फैसले को अहम संकेत माना जा रहा है.

बांग्लादेश क्यों बना 'प्रगति' की प्रगति में रोड़ा? भारत के पहले बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास से दूरी के क्या हैं मायने

भारत में पहली बार आयोजित किए गए बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास 'प्रगति' (PRAGATI) में बांग्लादेश की गैरमौजूदगी ने दक्षिण एशिया की रणनीतिक राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है. मेघालय के उमरोई सैन्य प्रशिक्षण केंद्र में 18 मई से 31 मई तक आयोजित इस अभ्यास में हिंद महासागर क्षेत्र, दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के 12 से अधिक देशों ने हिस्सा लिया, लेकिन भारत का महत्वपूर्ण पड़ोसी बांग्लादेश इससे दूर रहा.

सतह पर देखें तो किसी सैन्य अभ्यास में हिस्सा न लेना एक सामान्य कूटनीतिक फैसला लग सकता है, लेकिन मौजूदा क्षेत्रीय परिस्थितियों में इसे भारत-बांग्लादेश संबंधों में बढ़ती दूरी के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है.

क्या है 'प्रगति' सैन्य अभ्यास?

'प्रगति' का पूरा नाम है Partnership of Regional Armies for Growth and Transformation in the Indian Ocean Region (PRAGATI). यह भारत का पहला बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास है, जिसका उद्देश्य आतंकवाद विरोधी अभियानों, जंगल और पहाड़ी इलाकों में सैन्य कार्रवाई तथा विभिन्न देशों की सेनाओं के बीच समन्वय बढ़ाना है.

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इस अभ्यास में भारत के अलावा भूटान, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, मालदीव, म्यांमार, नेपाल, फिलीपींस, सेशेल्स, श्रीलंका और वियतनाम की सेनाएं शामिल हुईं. अभ्यास के दौरान संयुक्त सैन्य प्रशिक्षण के साथ-साथ भारतीय रक्षा उद्योग द्वारा विकसित स्वदेशी सैन्य तकनीकों और उपकरणों का प्रदर्शन भी किया गया.

बांग्लादेश की गैरमौजूदगी क्यों अहम है?

बांग्लादेश की अनुपस्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि मेघालय की सीमा सीधे बांग्लादेश से लगती है. यही उमरोई सैन्य केंद्र वह स्थान है जहां भारत और बांग्लादेश के बीच वर्षों तक संयुक्त सैन्य अभ्यास 'सम्प्रीति' आयोजित किया जाता रहा है.

ऐसे में जब क्षेत्र के लगभग सभी प्रमुख साझेदार देश अभ्यास में शामिल हुए, तब बांग्लादेश का दूरी बनाना केवल सैन्य निर्णय से अधिक राजनीतिक और रणनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है.

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अगस्त 2024 के बाद बदलने लगे समीकरण

भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में तनाव की चर्चा अगस्त 2024 के राजनीतिक घटनाक्रम के बाद तेज हुई. बड़े जन आंदोलन के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता छोड़नी पड़ी और वह भारत आ गईं. इसके बाद दोनों देशों के संबंधों में नई जटिलताएं पैदा हुईं.

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इसके बाद मार्च 2025 में अंतरिम सरकार के प्रमुख सलाहकार मोहम्मद यूनुस के चीन दौरे के दौरान दिए गए एक बयान ने दोनों देशों के बीच तनाव को और बढ़ा दिया. यूनुस ने कहा था कि भारत के पूर्वोत्तर राज्य समुद्र से कटे हुए हैं और बांग्लादेश इस क्षेत्र के लिए समुद्री पहुंच का मुख्य माध्यम है. उन्होंने चीन को इस स्थिति को आर्थिक अवसर के रूप में देखने का सुझाव भी दिया था. भारत ने इस बयान को संवेदनशील और आपत्तिजनक माना.

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने क्षेत्रीय सहयोग को समग्र दृष्टिकोण से देखने की बात कही, जबकि असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने भी इस बयान की आलोचना की थी.

ट्रांसशिपमेंट सुविधा पर भी असर

तनाव बढ़ने के बाद भारत ने बांग्लादेश को दी गई ट्रांसशिपमेंट सुविधा वापस लेने का फैसला किया. इस व्यवस्था के तहत बांग्लादेश भारतीय बंदरगाहों और हवाई अड्डों का उपयोग कर तीसरे देशों को निर्यात कर सकता था. विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम दोनों देशों के रिश्तों में आए बदलाव का एक महत्वपूर्ण संकेत था.

चीन और पाकिस्तान की ओर बढ़ते कदम

हाल के महीनों में बांग्लादेश ने चीन और पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों को और मजबूत करने की कोशिश की है. विशेष रूप से तीस्ता नदी परियोजना में चीन की बढ़ती दिलचस्पी को भारत करीब से देख रहा है.

इसके साथ ही सुरक्षा और रक्षा सहयोग के क्षेत्र में भी बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच संपर्क बढ़ने की खबरें सामने आई हैं. रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह रुझान आगे भी जारी रहता है तो दक्षिण एशिया की रणनीतिक तस्वीर पर इसका असर पड़ सकता है.

कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि बांग्लादेश के कुछ सैन्य और प्रशासनिक अधिकारियों के प्रशिक्षण के लिए पाकिस्तान को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति बढ़ी है, हालांकि इस विषय पर आधिकारिक स्तर पर विस्तृत जानकारी सीमित है.

भारत भी बदल रहा है अपनी रणनीति

दूसरी ओर भारत भी पूर्वोत्तर राज्यों की कनेक्टिविटी को लेकर वैकल्पिक रणनीति पर काम कर रहा है. केंद्र सरकार शिलांग-सिलचर चार लेन राजमार्ग परियोजना समेत कई बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ा रही है. इन परियोजनाओं का उद्देश्य पूर्वोत्तर भारत को सीधे भारतीय बंदरगाहों और मुख्य भूमि से जोड़ना है ताकि किसी एक बाहरी मार्ग पर निर्भरता कम हो सके.

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आगे क्या?

इस बीच खबरें हैं कि बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान जून के अंत में चीन की यात्रा कर सकते हैं. नई सरकार बनने के बाद यह उनकी पहली प्रमुख विदेश यात्रा होगी. वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें और उनके परिवार को भारत आने का निमंत्रण भी दिया है, जिस पर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है.

सिर्फ सैन्य अभ्यास नहीं, एक राजनीतिक संदेश?

'प्रगति' सैन्य अभ्यास से बांग्लादेश की दूरी को केवल एक सैन्य निर्णय मानना शायद पर्याप्त नहीं होगा. यह ऐसे समय में हुआ है जब ढाका अपनी विदेश नीति में नए संतुलन तलाश रहा है और भारत, चीन तथा पाकिस्तान के बीच क्षेत्रीय समीकरण तेजी से बदल रहे हैं.

यही वजह है कि रणनीतिक मामलों के जानकार बांग्लादेश की गैरमौजूदगी को एक प्रतीकात्मक घटना से अधिक मान रहे हैं. यह दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीति और भारत-बांग्लादेश संबंधों के नए अध्याय का संकेत भी हो सकता है.

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