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AI में भी आ सकती है जीवों जैसी चेतना, दो वैज्ञानिकों की रिसर्च में सनसनीखेज दावा

यदि प्रत्येक अरब आकाशगंगाओं में से केवल एक में ही उन्नत सभ्यताएं विकसित होती हैं, तब भी समय और स्थान में 1,000 से अधिक सभ्यताएं बिखरी होंगी. जिन विविध वातावरणों में ये जीव पनप सकते हैं, उन्हें देखते हुए यह आश्चर्य की बात नहीं है कि इनमें से कई जीव हमसे बहुत अलग होंगे.

AI में भी आ सकती है जीवों जैसी चेतना, दो वैज्ञानिकों की रिसर्च में सनसनीखेज दावा
ब्रह्मांड में इंसानों की तरह कई चेतन जीव हो सकते हैं.
  • वैज्ञानिकों ने चेतना को केवल जैविक शरीर तक सीमित नहीं माना है, ये गैर-बायोलॉजिकल सिस्टम में भी पाया जा सकता है
  • शोध से पता चलता है कि ब्रह्मांड में अलग-अलग रासायनिक संरचनाओं वाले जीवन रूप भी सचेत और जागरूक हो सकते हैं
  • एक वैज्ञानिक AI में चेतना संभव मानते हैं, जबकि दूसरे AI में चेतना की संभावना कम मानते हैं

चेतना या महसूस करने की क्षमता केवल इंसानी दिमाग (मांस और खून) तक सीमित नहीं है, इसे कंप्यूटर और एआई (AI) के भीतर भी पैदा किया जा सकता है या हो सकता है कि आने वाले समय में पैदा हो जाए. वैज्ञानिकों ने अब तक माना था कि सुख, दुख, दर्द या जागरूकता महसूस करने के लिए जैविक शरीर (Biological Body) जरूरी है, लेकिन इस नई स्टडी ने इस सोच को पूरी तरह बदल दिया है.

किन वैज्ञानिकों की है ये रिपोर्ट

डेली मेल के अनुसार, यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, रिवरसाइड (UCR) के जाने-माने फिलॉसफर प्रोफेसर एरिक श्चविट्जगेबेल (Eric Schwitzgebel) और पुर्तगाल की यूनिवर्सिटी ऑफ लिस्बन के शोधकर्ता जेरेमी पोबर (Jeremy Pober) ने ये रिसर्च तैयार की है. इनका मानना है कि इंसानी चेतना प्रकृति की सबसे अजीब और आसानी से समझ न आने वाली चीजों में से एक है. इनके रिसर्च के मुताबिक चेतना मांस और खून पर निर्भर नहीं करती. उनके 'कोपरनिकन सिद्धांत' के अनुसार, चेतना कोई ऐसी खास खूबी नहीं है जो सिर्फ इंसानों और उनसे मिलती-जुलती बनावट वाले कुछ जीवों में ही पाई जाती है. इसका मतलब है कि ऐसे दिमाग और शरीर, जो हमसे बिल्कुल अलग हैं, वे भी ब्रह्मांड को वैसे ही महसूस कर सकते हैं, जैसे हम करते हैं.

तारों के बीच जीवन की हमारी खोज के लिए इसके बहुत बड़े मायने हैं, क्योंकि हो सकता है कि जागरूक जीव उस तरह के न हों जैसा जीवन हम जानते हैं. यह थ्योरी ऐसे जागरूक एलियंस के बारे में सोचने का रास्ता खोलती है, जिनकी बायोलॉजिकल केमिस्ट्री हमसे बिल्कुल अलग हो. इसका मतलब यह भी हो सकता है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के जागरूक होने में कोई रुकावट नहीं है. मतलब कल को AI हमारी तरह रिएक्ट करना शुरू कर दे. 
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Photo Credit: NDTV

मेज या कप होने का अनुभव कैसा होगा

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के को-ऑथर प्रोफेसर एरिक श्विट्जगेबेल कहते हैं, 'ब्रह्मांड में ऐसे दिमाग हो सकते हैं, जो हमारी कल्पना से भी ज्यादा अजीब हों.' बहुत मोटे तौर पर, हम चेतना को अस्तित्व के 'यह कैसा महसूस होता है' वाले पहलू के रूप में परिभाषित कर सकते हैं. उदाहरण के लिए, यह पूछना तो समझ में आता है कि इंसान या ऑक्टोपस होने का अनुभव कैसा होता है, लेकिन यह पूछना कि मेज या कप होने का अनुभव कैसा होता है, कोई मतलब नहीं रखता.

वैज्ञानिकों और दार्शनिकों के बीच बरसों से इस बात पर बहस चल रही है कि क्या यह गुण 'सब्सट्रेट-फ्लेक्सिबल' (अलग-अलग चीजों से बनने में सक्षम) है. इसका मतलब है कि इसे कई तरह की चीजों से 'हासिल' किया जा सकता है, ठीक वैसे ही जैसे 'कप होने' का गुण कांच या प्लास्टिक से बनी चीज में हो सकता है. हाल ही में, कुछ शोधकर्ताओं ने यह तर्क दिया है कि चेतना बिल्कुल भी 'सब्सट्रेट-फ्लेक्सिबल' नहीं है; यानी यह केवल बहुत खास तरह के बायोलॉजिकल सिस्टम में ही पैदा हो सकती है. हालांकि, इससे सचेत प्राणियों की संभावित श्रेणी बहुत सीमित हो जाती है, जिसमें पृथ्वी पर रहने वाले और पृथ्वी जैसी जीव-जंतुओं वाले प्राणी शामिल हैं. यह अनुमान भले ही हानिरहित लगे, लेकिन जब हम विशाल ब्रह्मांड में मौजूद जीवन की विस्मयकारी विविधता के बारे में सोचना शुरू करते हैं, तो बात कुछ और ही हो जाती है.

कम से कम 1,000 सभ्यताएं हर समय होंगी

लिस्बन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर श्वित्जगेबेल और उनके सह-लेखक डॉ. जेरेमी पोबर का सुझाव है कि यदि प्रत्येक अरब आकाशगंगाओं में से केवल एक में ही उन्नत सभ्यताएं विकसित होती हैं, तब भी समय और स्थान में 1,000 से अधिक सभ्यताएं बिखरी होंगी. जिन विविध वातावरणों में ये जीव पनप सकते हैं, उन्हें देखते हुए यह आश्चर्य की बात नहीं है कि इनमें से कई जीव हमसे बहुत अलग होंगे. डॉ. पोबर ने डेली मेल को बताया कि एलियंस की कार्यात्मक संरचना  (Functional Architecture) में 'उच्च स्तरीय' अंतर हो सकते हैं, लेकिन बेसिक बायोकेमेस्ट्री में भी वे 'लोअर लेवल' पर अलग हो सकते हैं. डॉ. पोबर कहते हैं, 'खगोल जीवविज्ञानी और जैव रसायनविदों ने दिखाया है कि कार्बन आधारित जीवन, जो जैव रासायनिक संरचना में हमसे काफी अलग है, संभव है.' उदाहरण के लिए, शुक्र ग्रह के सल्फ्यूरिक एसिड बादलों में विकसित जीवन में सिलिकॉन वह भूमिका निभा सकता है जो हमारे जैव रसायन में सल्फर निभाता है.

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हालांकि, ये जीव कितने भी उन्नत या बुद्धिमान क्यों न हों, कुछ सिद्धांतकारों का मानना ​​है कि इन अंतरों के कारण इन्हें सचेत नहीं माना जा सकता. डॉ. पोबर और प्रोफेसर श्वित्जगेबेल के अनुसार, यह एक बड़ी भूल है. इसके बजाय, वे 'चेतना का कोपरनिकस सिद्धांत' नामक एक सिद्धांत प्रस्तावित करते हैं. इसका मतलब यह है कि हमें यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि मनुष्य और हमारे विशेष प्रकार के सचेत अनुभव विशेष या अद्वितीय हैं. यह खगोल विज्ञान में 'कोपरनिकन क्रांति' से प्रेरित है, जिसमें खगोलशास्त्री निकोलस कोपरनिकस को पता चला कि पृथ्वी ब्रह्मांड के केंद्र में नहीं है.

कोपरनिकस सिद्धांत क्या है

कोपरनिकस से पहले, लोग सोचते थे कि ब्रह्मांड में पृथ्वी की स्थिति खास या विशेषाधिकार प्राप्त है. हालांकि, बेहतर वैज्ञानिक समझ से यह पता चला है कि जब तक इसके विपरीत कोई सबूत न मिले, तब तक यह मान लेना बेहतर है कि पृथ्वी या इंसानों में कुछ भी खास नहीं है. डॉ. पोबर कहते हैं, 'कोपरनिकन सिद्धांत की भावना यह है: हमें यह तब मानना ​​चाहिए कि हम इंसान खास हैं जब हमारे पास ऐसा कहने के लिए सबूत हों, न कि तब जब हमारे पास ऐसे सबूत न हों.'

उदाहरण के लिए, हमारे पास इस बात के बहुत सारे सबूत हैं कि इंसान पृथ्वी पर सबसे बुद्धिमान प्रजाति हैं, लेकिन ऐसा सोचने का कोई कारण नहीं है कि हम ब्रह्मांड में भी सबसे बुद्धिमान प्रजातियों में से एक हैं. जब हम इस विचार को चेतना पर लागू करते हैं, तो डॉ. पोबर कहते हैं कि ऐसा सोचने का कोई कारण नहीं है कि चेतना को मांस और रक्त पर निर्भर रहने की आवश्यकता है. इस विचार का बड़ा नतीजा यह है कि यह उन जीवन-रूपों की संभावित सीमा को बहुत बढ़ा देता है जो विशाल ब्रह्मांड में सचेत अनुभव कर सकते हैं. शोधकर्ताओं को संदेह है कि सिलिकॉन-आधारित जीवन-रूप, जैसे कि 'स्टार ट्रेक' के रॉकी या होर्टा, जैविक रूप से जीवित रहने में सक्षम हो सकते हैं. लेकिन अगर वे सच में मौजूद होते, तो यह मानने का कोई कारण नहीं है कि वे सचेत नहीं होंगे.

AI पर दोनों वैज्ञानिकों की सोच में फर्क 

हालांकि, डॉ. पोबर और प्रोफेसर श्वित्जगेबेल में इस बात पर मतभेद है कि AI में भी चेतना आ सकती है. डॉ. पोबर कहते हैं कि हमें चेनता की परिभाषा को लेकर इतना लचीला रुख नहीं अपनाना चाहिए. वे कहते हैं, 'यह मानने के अच्छे कारण हैं कि कुछ एलियंस जिनकी जैव रासायनिक संरचना सचेत है, वे सचेत हो सकते हैं.' मगर ये AI तक नहीं पहुंचता, जो हमसे बहुत अलग हैं.' हालांकि, प्रोफेसर श्विट्जगेबेल का तर्क है कि किन सिस्टम को चेतन माना जा सकता है, इस बारे में हमें और भी लचीला होना चाहिए.

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उनका कहना है कि एक बार जब यह सोच छोड़ दी जाती है कि चेतना के लिए इंसानी बायोलॉजी जरूरी है, तो सिलिकॉन चिप्स आधारित सिस्टम मतलब AI को सिर्फ इसलिए बाहर रखना मुश्किल हो जाता है क्योंकि वे सिलिकॉन से बने हैं. प्रोफेसर श्विट्जगेबेल आगे कहते हैं कि दार्शनिकों ने 'इस बात पर बहुत ज्यादा ध्यान दिया है कि क्या सिलिकॉन इंसानी दिमाग की नकल कर सकता है, और इस बड़े सवाल पर कभी ध्यान नहीं दिया है कि किस तरह के सिस्टम चेतन हो सकते हैं.'

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लेखक के बारे में
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विजय शंकर पांडेय
चीफ सब एडिटर
देश और दुनिया देखने और समझने का कौतूहल बचपन से रहा. हिन्दी और संस्कृत से मेलजोल पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण हुआ. युवा होते ही राजनीति दिलचस्प लगने लगी... और पढ़ें
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