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सर्दियों में क्यों सुलग रहे उत्तराखंड के जंगल, अब बारिश और बर्फबारी पर ही टिकी उम्मीद

उत्तराखंड में लगातार दो महीनों से बारिश और बर्फबारी न होने की वजह से जंगलों में आग की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं. नंदा देवी बायोस्फीयर से लेकर चमोली और उत्तरकाशी तक कई क्षेत्रों में जंगल सुलग रहे हैं. सूखे जंगल, नमी की कमी और बढ़ते तापमान ने स्थिति और गंभीर बना दी है.

सर्दियों में क्यों सुलग रहे उत्तराखंड के जंगल, अब बारिश और बर्फबारी पर ही टिकी उम्मीद
  • उत्तराखंड में इस सर्दी मौसम में बारिश और बर्फबारी लगभग नहीं हुई, जिससे जंगलों में आग लग रही है
  • राज्य के कई क्षेत्रों में दो महीने तक बारिश न होने के कारण जंगल सूख गए और आग की घटनाएं बढ़ीं
  • वनाग्नि से वन्य जीवों, कीटों और पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है, साथ ही ग्लेशियरों की पिघलन तेज हो रही है
देहरादून:

उत्तराखंड में इस बार सर्दियों में बारिश और बर्फबारी लगभग ना के बराबर हुई है, जिसका सीधा असर प्रदेश की बहुमूल्य वन संपदा पर दिख रहा है. लगातार 2 महीनों तक 100% बारिश न होने की वजह से राज्य के कई क्षेत्रों में जंगल सुलग रहे हैं. हाल ही में विश्व धरोहर स्थल नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व के फूलों की घाटी से सटे जंगलों में आग लगी थी. इसके साथ ही चमोली के तपोवन, उत्तरकाशी के वर्णावत और बड़कोट क्षेत्रों में भी जंगल आग की चपेट में हैं.

उत्तराखंड बदलते मौसम का सबसे बड़ा शिकार

उत्तराखंड में भरपूर वन संपदा है, राज्य में 67% फॉरेस्ट कवर और लगभग 45.54% डेंस फॉरेस्ट क्षेत्र मौजूद है. मगर बदकिस्मती देखिए कि पिछले कुछ वर्षों में बदलते मौसम और बढ़ते तापमान ने वनाग्नि की स्थिति और गंभीर बना दी है. आमतौर पर फॉरेस्ट फायर सीजन 15 फरवरी से शुरू होता है, लेकिन इस बार जंगल पहले से ही सुलग रहे हैं और जगह‑जगह आग की घटनाएं सामने आ रही हैं.

वन्य जीव, पर्यावरण और ग्लेशियर, तीनों पर बड़ा खतरा

जंगलों में लगने वाली आग से जहां बहुमूल्य वन संपदा को नुकसान होता है, वहीं छोटे‑बड़े जीव‑जंतु, जमीन के भीतर रहने वाले कीट और अन्य वन्य जीव भी बुरी तरह प्रभावित होते हैं. आग से उठने वाली राख और धुआं हिमालयी ग्लेशियरों पर जमकर ब्लैक कार्बन बनता है, जिससे उनकी पिघलने की प्रक्रिया तेज हो जाती है. धुआं न सिर्फ वायु को गर्म करता है बल्कि आसपास के क्षेत्रों में ऑक्सीजन लेवल भी कम करता है.

1 नवंबर 2025 से 17 जनवरी 2026 तक 41 घटनाएं दर्ज हुई. जिसमें 17 हेक्टेयर जंगल प्रभावित हुआ. इस अवधि में राज्य में 41 वनाग्नि घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें लगभग 16.99 हेक्टेयर जंगल प्रभावित हुआ. सीसीएफ सुशांत कुमार पटनायक, नोडल अधिकारी (वनाग्नि एवं आपदा प्रबंधन), ने NDTV को बताया अब तक 1724 टोटल फायर अलर्ट मिले.

गढ़वाल रीजन: 1064
कुमाऊं रीजन: 440
वाइल्डलाइफ जोन: 220

इनमें से फॉरेस्ट फायर अलर्ट

गढ़वाल: 76
कुमाऊं: 8
वाइल्डलाइफ: 35

कंट्रोल बर्निंग की गई

गढ़वाल: 196
कुमाऊं: 46
वाइल्डलाइफ: 18
कुल = 260 कंट्रोल बर्निंग

कई अलर्ट फॉल्स अलर्ट भी थे

गढ़वाल: 357
कुमाऊं: 204
वाइल्डलाइफ़: 94

आग फैलने की बड़ी वजह

सीसीएफ पटनायक ने बताया कि प्रदेश में न बारिश हुई है और न बर्फबारी, जिससे जंगल पूरी तरह सूख चुके हैं. पहाड़ों पर घास भी सूख गई है, और पहाड़ों के टूटने या अन्य कारणों से छोटी चिंगारी भी बड़े फायर में बदल रही है. अधिकारियों का कहना है कि वन विभाग और अन्य एजेंसियों की टीमें लगातार आग बुझाने में जुटी हैं.

वैज्ञानिक का क्या कुछ कहना

प्रोफेसर एमपीएस बिष्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के चलते जमीन और वातावरण दोनों गर्म हैं, नमी पूरी तरह खत्म हो चुकी है, इससे आग तेजी से फैलती है. उत्तराखंड मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक सीएस तोमर के मुताबिक दिसंबर और जनवरी में 100% वर्षा घाटा रिकॉर्ड किया गया है. मौसम केंद्र ने 21 जनवरी तक उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़ के 3200 मीटर ऊंचाई वाले क्षेत्रों में हल्की बारिश और बर्फबारी का अलर्ट जारी किया है.

5 वर्षों के बारिश आंकड़े भी चिंताजनक

  • 2020‑21: दिसंबर −55%, जनवरी −35%
  • 2021‑22: दिसंबर −14%, जनवरी +57%
  • 2022‑23: दिसंबर −99%, जनवरी −27%
  • 2023‑24: दिसंबर −75%, जनवरी −99%
  • 2024‑25: दिसंबर −88%, जनवरी −100%

लगातार घटती बारिश और कमजोर बर्फबारी से यह साफ है कि उत्तराखंड लंबे समय से सूखे के दबाव में है.

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