यूपी चुनाव के लिए भले ही अभी कई महीने बाकी हों लेकिन राजनीतिक दल मैदान में उतर चुके हैं. बीजेपी की ओर से जहां योगी आदित्यनाथ अलग-अलग जिलों का दौरा कर विकास की सौगातें बांटते हुए विपक्षी राज की खामियां गिना रहे हैं, वहीं समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव अपनी पीडीए रथयात्रा के जरिए वोटरों को संदेश देने निकल चुके हैं.
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में भारतीय जनता पार्टी पिछले दस साल से सत्ता में है और तीसरे टर्म के लिए पार्टी स्तर पर चुनावी रणनीति को अंतिम रूप देने के काम जारी है. ऐसे में चुनौती मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ-साथ राज्य में पार्टी की कमान संभाले पंकज चौधरी के लिए भी होगी कि वो जिस तरह महाराजगंज में अपनी सीट पर हर तरह की एंटी इंकम्बेंसी को मात देते आए हैं, वैसा ही कुछ पूरे राज्य में भी कर पाएं.
महाराजगंज सीट के बेताज महाराज ही हैं पंकज
पंकज चौधरी महाराजगंज लोकसभा सीट से सांसद हैं. इस सीट पर उनकी जीत का एक लंबा सिलसिला रहा है.
पंकज चौधरी यहां से 10वीं, 11वीं, 12वीं, 14वीं, 16वीं, 17वीं और 18वीं लोकसभा के लिए सांसद चुने गए हैं. तीन दशक से ज्यादा समय तक एक ही सीट पर एंटी-इंकम्बेंसी के बीच भी चुनाव निकालना, पूर्वांचल की राजनीति में एक अलग केस स्टडी है.
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि ऐसा सिर्फ समीकरणों के भरोसे नहीं बल्कि ग्राउंड पर लगातार सक्रियता से वोटरों से सीधे कनेक्ट होने से ही संभव है.
संसदीय रिकॉर्ड देखें तो पंकज चौधरी अलग-अलग समय पर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, रेलवे, ग्रामीण विकास समेत कई संसदीय समितियों का हिस्सा रहे हैं.
स्थानीय स्तर पर उनकी सक्रियता का फोकस मुख्य रूप से तीन चीजों पर रहा है. पहला- बुनियादी ढांचे के प्रोजेक्ट्स की मॉनिटरिंग, दूसरा- सीमावर्ती इलाकों में कनेक्टिविटी और तीसरा- केंद्र की योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन पर फॉलो-अप.
उनकी राजनीतिक शुरुआत गोरखपुर नगर निगम में पार्षद और उपमहापौर के तौर पर 1989-91 में हुई थी. उसी दौर से उनके कामकाज का तरीका ग्रामीण शिकायतों को सीधे जिला प्रशासन तक पहुंचाने और उस पर लगातार फॉलो-अप करने का रहा है, चाहे मामला कृषि ऋण का हो या ब्लॉक स्तर की सुविधाओं का.
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2027 के लिहाज से चर्चा क्यों?
चूंकि भारतीय जनता पार्टी पंकज चौधरी की अध्यक्षता में ही यूपी में 27 की चुनावी जंग में उतरी है तो महाराजगंज में अपनाए गए उनके मॉडल की चर्चा संगठन के स्तर पर हो रही है. इनमें तीन बातें प्रमुख हैंः-
- पहला है बूथ स्तर तक सूक्ष्म प्रबंधन. महाराजगंज मॉडल को प्रदेश स्तर पर लागू करने का अर्थ बूथ स्तर तक जमीनी फीडबैक व्यवस्था को और मजबूत करना है.
- दूसरा नंबर नीति को जनहित के परिणामों से जोड़ने का आता है. केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री के रूप में काम करने के अनुभव के कारण पंकज चौधरी वित्तीय आवंटन और योजनाओं के क्रियान्वयन की प्रक्रिया से परिचित हैं. यह अनुभव उत्तर प्रदेश के ग्रामीण समुदायों तक केंद्र की कल्याणकारी योजनाओं का प्रभावी और सत्यापन योग्य लाभ पहुंचाने में उपयोगी हो सकता है.
- इसके अलावा एक प्रतिस्पर्धी निर्वाचन क्षेत्र में दशकों तक लगातार चुनावी सफलता का उनका अनुभव मौजूदा विधानसभा सीटों के लिए एक संचालनात्मक मॉडल प्रस्तुत करता है. प्रत्यक्ष जनसंपर्क, प्रशासनिक स्तर पर त्वरित फॉलो-अप और ग्रामीण आर्थिक स्थिरता को प्राथमिकता देकर संगठनात्मक प्रदर्शन को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में काम किया जा सकता है.
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