- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सहारनपुर की मस्जिद में अजान और लाउडस्पीकर के प्रयोग को नियमों के तहत अनुमति दी है.
- कोर्ट ने ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण नियम का पालन करते हुए अजान में किसी प्रकार का बाधा न डालने का निर्देश दिया.
- लाउडस्पीकर के उपयोग के लिए डेसिबल सीमा और समय-सीमा का कड़ाई से पालन करना होगा.
सहारनपुर की आयशा मस्जिद में पांच वक्त की अजान और लाउडस्पीकर के उपयोग को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम फैसला दिया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अजान की प्रक्रिया में किसी भी प्रकार का व्यवधान नहीं डाला जाएगा, लेकिन लाउडस्पीकर के प्रयोग को केवल नियमों और निर्धारित मानकों के अधीन ही अनुमति दी जा सकती है. जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस गरिमा प्रसाद की डिविजन बेंच ने शाहनवाज़ खान और अन्य पांच लोगों द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए याचिका को निस्तारित करते हुए यह आदेश पारित किया.
ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण नियम का करना होगा पालन
कोर्ट ने अपने फैसले में जिला प्रशासन और पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया है कि यदि याचिकाकर्ता ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण एवं नियमन नियम, 2000 और हाईकोर्ट के पूर्व में दिए गए फैसले का पूरी तरह से पालन करने का शपथ पत्र प्रस्तुत करते है तो उन्हें आयशा मस्जिद में दिन में पांच बार अज़ान देने से नहीं रोका जाएगा.
याचिका में कहा गया था- पुलिस लाउडस्पीकर यूज नहीं करते देती
यह पूरा मामला सहारनपुर जिले के थाना गागलहेड़ी अंतर्गत ग्राम पाथेड में प्लॉट संख्या 47 पर स्थित आयशा मस्जिद से जुड़ा हुआ है. याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं ने कोर्ट के समक्ष तर्क रखा कि स्थानीय पुलिस और जिला प्रशासन उन्हें मस्जिद में पांचों वक्त की अजान देने और इसके लिए ध्वनि विस्तारक यंत्रों यानी लाउडस्पीकर का उपयोग करने की अनुमति नहीं दे रहे है.
याचिका में कोर्ट से यह मांग की गई थी कि वह प्रतिवादी जिला प्रशासन और पुलिस अधिकारियों को निर्देशित करे ताकि याचिकाकर्ता बिना किसी बाधा के अपनी धार्मिक प्रार्थना और अज़ान की प्रक्रिया पूरी कर सकें. याचिका में आरोप लगाया गया था कि लाउडस्पीकर के प्रयोग को लेकर न्यायिक फैसलों की मौजूदगी के बावजूद स्थानीय प्रशासन और पुलिस उन्हें अजान के लिए लाउडस्पीकर बजाने से रोक रही है.

राज्य सरकार के वकील ने क्या कुछ कहा?
राज्य सरकार की ओर से पेश हुए राज्य विधि अधिकारी ने कोर्ट को पिछली सुनवाई पर प्रस्तुत किए गए निर्देशों और रिपोर्ट से अवगत कराया. राज्य सरकार के अधिवक्ता ने स्पष्ट किया कि प्रशासन द्वारा याचिकाकर्ताओं को अज़ान देने से कभी भी नहीं रोका गया है. हालांकि लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को लेकर राज्य सरकार ने स्टैंड लिया कि लाउडस्पीकर का उपयोग केवल 'ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000' में तय की गई डेसिबल सीमा के अंदर ही किया जा सकता है.
अफजल अंसारी केस में दिए फैसले का दिया उदाहरण
इसके अलावा अज़ान के दौरान लाउडस्पीकर के उपयोग के लिए समय-सीमा और मापदंड पहले से निर्धारित है जिनका पालन करना हर नागरिक और संस्था के लिए अनिवार्य है. राज्य सरकार के वकील ने इस दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2020 की जनहित याचिका संख्या 570/2020 (अफजल अंसारी व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य) में दिए गए डिविजन बेंच के फैसले का हवाला दिया.
उस फैसले में कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि अज़ान भले ही इस्लाम का एक अनिवार्य और अभिन्न अंग हो सकती है लेकिन लाउडस्पीकर या अन्य ध्वनि विस्तारक यंत्रों के माध्यम से अज़ान देना धर्म का अभिन्न हिस्सा नहीं माना जा सकता जो संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मौलिक अधिकार के रूप में पूर्ण सुरक्षा की मांग करता हो.

रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक लाउडस्पीकर नहीं बजेगा
संविधान के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन आता है. उस फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया था कि रात दस बजे से सुबह छह बजे के बीच किसी भी परिस्थिति में जिला प्रशासन द्वारा लाउडस्पीकर के उपयोग की अनुमति नहीं दी जा सकती.
समय सीमा और तेज आवाज के नियम का करना होगा पालन
मानव आवाज में मीनारों से अज़ान देने पर कोई रोक नहीं है लेकिन लाउडस्पीकर के लिए सक्षम अधिकारी से अनुमति लेना अनिवार्य है. हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने कोर्ट को आश्वस्त किया कि उनके मुवक्किल लाउडस्पीकर के इस्तेमाल में किसी भी नियम या अदालती दिशा-निर्देशों का उल्लंघन नहीं करेंगे. उन्होंने कहा कि अजान के समय ध्वनि की डेसिबल सीमा और समय-सीमा का कड़ाई से पालन किया जाएगा.
दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने याचिका का निस्तारण करते हुए प्रतिवादी प्रशासन और पुलिस को स्पष्ट निर्देश दिए. कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को आदेश दिया कि वो सबसे पहले सक्षम प्राधिकारी के समक्ष एक आवेदन दायर करें. इस आवेदन के साथ याचिकाकर्ताओं को एक नोटरीकृत हलफनामा भी संलग्न करना होगा जिस पर उनके हस्ताक्षर होंगे.
कोर्ट ने अपने आदेश में क्या कुछ कहा?
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि कि यदि याचिकाकर्ता ऐसा नोटरीकृत हलफनामा जमा कर देते है तो सहारनपुर के थाना गागलहेड़ी स्थित ग्राम पाथेड में प्लॉट नंबर 47 पर बनी आयशा मस्जिद में उन्हें दिन में पांच बार अज़ान देने के अधिकार में पुलिस और जिला प्रशासन कोई हस्तक्षेप या बाधा उत्पन्न नहीं करेगा.
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने पुलिस और जिला प्रशासन को यह जिम्मेदारी भी सौंपी है कि वो इस बात को सुनिश्चित करें कि याचिकाकर्ता अपने हलफनामे में दिए गए वचनों का पालन कर रहे है या नहीं. यदि याचिकाकर्ता हलफनामे के नियमों का उल्लंघन करते पाए जाते है तो पुलिस और प्रशासन को उनके खिलाफ कानून के मुताबिक उचित कानूनी कार्रवाई करने की पूरी छूट रहेगी.
यह भी पढ़ें - सहारनपुर कलेक्ट्रेट की मस्जिद 115 साल पुरानी, बुलडोजर एक्शन पर क्यों मचा बवाल? पूरी कहानी
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं