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क्या प्रयागराज में नहीं उठेगा ऐतिहासिक बड़ा ताजिया? हाईकोर्ट ने कहा- प्रशासन को आपत्ति नहीं, खुद सुलझाएं

प्रयागराज में मोहर्रम पर ऐतिहासिक बड़ा ताजिया उठाने के विवाद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने कहा कि जब प्रशासन को कोई आपत्ति नहीं है, तो यह मुस्लिम समुदाय का आपसी मामला है और इसमें कोर्ट या सरकार दखल नहीं देगी.

क्या प्रयागराज में नहीं उठेगा ऐतिहासिक बड़ा ताजिया? हाईकोर्ट ने कहा- प्रशासन को आपत्ति नहीं, खुद सुलझाएं

संगम नगरी प्रयागराज में इस साल मोहर्रम पर ऐतिहासिक 'बड़ा ताजिया' उठाया जाएगा या नहीं, इस कानूनी विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपना रुख साफ कर दिया है. अदालत ने इस मामले में किसी भी तरह का हस्तक्षेप करने से इंकार करते हुए याचिका को निस्तारित कर दिया है. जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस अरुण कुमार की डिवीजन बेंच ने साफ किया है कि यह पूरी तरह से मुस्लिम समुदाय का आंतरिक मामला है और इससे उत्तर प्रदेश सरकार या स्थानीय प्रशासन का कोई लेना-देना नहीं है. जाहिर है कि कोर्ट के इस फैसले से याचिकाकर्ता ऐतिहासिक मोहर्रम कमेटी को बड़ा झटका लगा है.

आखिर क्या है बड़ा ताजिया को लेकर पूरा विवाद?

बता दें कि यह पूरा मामला 'इलाहाबाद ऐतिहासिक मोहर्रम कमेटी' की एक जनहित याचिका से जुड़ा है. असल में, सालों पुरानी परंपरा के मुताबिक इस ऐतिहासिक बड़ा ताजिया को उठाने की मुख्य जिम्मेदारी एक दूसरी संस्था यानि वक्फ ताजिया कलां के अध्यक्ष रेहान खान की थी. लेकिन इस बार अध्यक्ष रेहान खान ने बिना किसी ठोस वजह के ताजिया उठाने से इंकार कर दिया.

उनके इस फैसले से ऐतिहासिक परंपरा टूटने का खतरा पैदा हो गया. इसी को देखते हुए मोहर्रम कमेटी ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और गुहार लगाई कि अगर मौजूदा अध्यक्ष सक्षम नहीं हैं, तो जिला प्रशासन को दखल देना चाहिए. कमेटी चाहती थी कि प्रशासन खुद आगे आकर समाज के दूसरे सदस्यों को इस काम के लिए नॉमिनेट करे, ताकि मोहर्रम की 9वीं और 10वीं तारीख को यह ऐतिहासिक ताजिया हर साल की तरह उठाया जा सके और सालों पुरानी परंपरा भी न टूटे.  

हाई कोर्ट में क्या हुआ और प्रशासन ने क्या कहा?

इस मामले पर सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने प्रयागराज जिला प्रशासन से पूछा था कि क्या सरकारी स्तर पर ताजिया उठाने पर कोई रोक है? इस पर सरकारी वकील ने कोर्ट में साफ कर दिया कि सरकार या स्थानीय पुलिस-प्रशासन को मोहर्रम का जुलूस निकालने पर कोई आपत्ति नहीं है और न ही कोई रोक-टोक लगाई गई है. इसी सुनवाई के दौरान एक और दिलचस्प मोड़ आया. कोर्ट को पता चला कि मोहर्रम पर बड़ा ताजिया न उठाने का फैसला असल में 'वक्फ ताजिया कलां' नाम की उस संस्था ने लिया है जिसके पास इसकी जिम्मेदारी है, जबकि हाई कोर्ट में केस किसी दूसरी कमेटी (ऐतिहासिक मोहर्रम कमेटी) ने दर्ज कराया था.
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कोर्ट ने अपने फैसले में क्या टिप्पणी की?

प्रशासन का जवाब और दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया. अदालत ने साफ कहा कि जब सरकारी या प्रशासनिक स्तर पर ताजिया उठाने पर कोई पाबंदी ही नहीं है, तो फिर इसमें कोर्ट या सरकार के दखल देने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता. कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि ताजिया उठाना और जुलूस निकालना पूरी तरह से समाज का अपना पारंपरिक मामला है. यह याचिकाकर्ता और मुस्लिम समुदाय के अन्य लोगों के बीच का आपसी तालमेल का विषय है कि वे इसे कैसे सुलझाते हैं? इन टिप्पणियों के साथ हाई कोर्ट ने इस मामले में कोई भी नया आदेश देने से मना कर दिया और केस को बंद कर दिया.
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