- महोली विधानसभा सीट का गठन 2008 के परिसीमन के बाद हुआ था और अब तक तीन बार चुनाव हुए हैं
- 2012 में समाजवादी पार्टी के अनूप कुमार गुप्ता, 2017 और 2022 में भाजपा के शशांक त्रिवेदी ने चुनाव जीते हैं
- महोली की राजनीति में भाजपा और सपा के बीच सीधे मुकाबले के साथ बहुजन समाज पार्टी तीसरे स्थान पर है
महोली एक नई विधानसभा सीट है. इसका गठन 2008 के परिसीमन के बाद हुआ था. परिसीमन से पहले इस क्षेत्र का अधिकांश हिस्सा हरगांव विधानसभा के अंतर्गत आता था. इस सीट पर अब तक केवल तीन बार विधानसभा चुनाव हुए हैं. महोली की राजनीति मुख्य रूप से जातिगत समीकरणों और तीन प्रमुख पार्टियों के इर्द-गिर्द अब तक घूमती रही है.
कब कौन जीता चुनाव
- 2012 (पहला चुनाव): इस सीट पर पहला चुनाव समाजवादी पार्टी (SP) के अनूप कुमार गुप्ता ने जीता था. उन्होंने बसपा के महेश चंद्र मिश्रा को 22 हजार से अधिक वोटों से हराया था.
- 2017 का चुनाव: भारतीय जनता पार्टी (BJP) के शशांक त्रिवेदी ने यहां से जीत दर्ज की और सपा के अनूप गुप्ता को हराया. यह इस सीट पर भाजपा की पहली जीत थी.
- 2022 का चुनाव: भाजपा ने इस सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा और शशांक त्रिवेदी ने लगातार दूसरी बार सपा के अनूप गुप्ता को हराकर जीत हासिल की.
- पिछले दो चुनावों (2017 और 2022) से यहां का राजनीतिक परिदृश्य भाजपा और सपा के बीच सीधे मुकाबले का रहा है. दोनों बार भाजपा के शशांक त्रिवेदी और सपा के अनूप गुप्ता आमने-सामने रहे हैं. बहुजन समाज पार्टी (BSP) यहां एक मजबूत वोट बैंक के साथ तीसरे स्थान पर रहती है, लेकिन मुख्य लड़ाई में नहीं आ पाई है.
जातिगत समीकरण
यह सीट ब्राह्मण बाहुल्य मानी जाती है. ब्राह्मण मतदाताओं का झुकाव जिस ओर होता है, जीत उसी की पक्की मानी जाती है . 2017 और 2022 में भाजपा की जीत इसका प्रमाण है. ब्राह्मणों के अलावा यहां दलित, मुस्लिम और कुर्मी मतदाता भी बड़ी संख्या में हैं, जो किसी भी उम्मीदवार के राजनीतिक समीकरण बना या बिगाड़ सकते हैं. सपा यहां मुख्य रूप से मुस्लिम, यादव और कुछ अन्य पिछड़ी जातियों (OBC) के गठजोड़ पर निर्भर रहती है.
महोली में मुद्दे क्या हैं
यहां किसानों (विशेषकर गन्ना किसानों) की समस्याएं, सड़क व बुनियादी विकास और महोली की बंद पड़ी चीनी मिल को फिर से चालू कराने जैसे स्थानीय मुद्दे हर चुनाव में प्रमुखता से उठाए जाते हैं. 1932 में स्थापित महोली की श्री लक्ष्मी शुगर मिल अपने बेहतरीन और बड़े दाने की शक्कर के लिए कभी पूरे एशिया में प्रसिद्ध थी. लगभग दो दशक पहले इस मिल को घाटे में दिखाकर बंद कर दिया गया था. तब से लेकर आज तक हर चुनाव में नेता इसे दोबारा शुरू करवाने का वादा करते हैं, लेकिन यह वादा आज भी अधूरा है. मिल बंद होने से स्थानीय गन्ने की खेती और व्यापार सिमट गया है, जिससे किसानों को अपना गन्ना दूर की मिलों में भेजने के लिए मजबूर होना पड़ता है.
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