इस सप्ताहांत मुंबई में टाटा विवाद से जुड़े दोनों पक्षों के वकील टाटा संस के Articles of Association या कंपनी के नियमों के अनुच्छेद 121 को बहुत ध्यान से पढ़ रहे थे. लेकिन भारत में शायद ही किसी और ने इसे पढ़ा होगा. लाखों लोग ऐसे हैं जिन्होंने यह प्रावधान कभी नहीं देखा, लेकिन उन्होंने पहले ही यह राय बना ली है कि बॉम्बे हाउस के अंदर क्या हो रहा है. सुप्रीम कोर्ट आगे चलकर जो भी फैसला दे, लोगों की यह राय उससे भी ज्यादा लंबे समय तक बनी रह सकती है.यही इस विवाद का वह हिस्सा है, जिस पर सबसे कम ध्यान दिया जा रहा है, जबकि शायद इसका सबसे ज्यादा महत्व है.
टाटा जैसे ब्रांड केवल कानूनी समझौतों से नहीं, बल्कि लोगों के भरोसे से टिके रहते हैं.
भारत में टाटा की छवि
करीब एक सदी से टाटा समूह ने एक ऐसी छवि बनाई जिसे भारतीयों ने बिना किसी औपचारिक शिक्षा के अपने मन में स्वीकार किया. लोगों को लगता रहा कि यह ऐसा कारोबारी घराना है, जहां मालिकाना हक का इस्तेमाल समाज के हित में होता है, जहां व्यक्ति से ज्यादा संस्था महत्वपूर्ण है और जहां काम सही तरीके से किया जाता है. यह भरोसा एक-एक करके, बहुत लंबे समय में बनाया गया है. लेकिन इसे खत्म होने में ज्यादा समय नहीं लगता.
कानूनी विवाद का दायरा सीमित है.टाटा संस में करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि 17 सितंबर को एन चंद्रशेखरन को पांच साल का एक और कार्यकाल देने का बोर्ड का फैसला कंपनी के अपने नियमों की कसौटी पर खरा नहीं उतरता. ट्रस्ट्स के मुताबिक, इस प्रस्ताव के लिए ट्रस्ट्स द्वारा नामित निदेशकों के बहुमत का समर्थन जरूरी था. नोएल टाटा ने इसके खिलाफ वोट किया, जबकि वेणु श्रीनिवासन ने समर्थन में वोट दिया. ट्रस्ट्स का तर्क है कि दो निदेशकों में बहुमत का मतलब दोनों का समर्थन है. इसके बावजूद टाटा संस ने चंद्रशेखरन के पुनर्नियुक्ति के फैसले को आगे बढ़ाया. अब ट्रस्ट्स का कहना है कि यह नियुक्ति शुरू से ही अमान्य है. लेकिन जनता के बीच यह विवाद कहीं बड़ा है, क्योंकि यहां टाटा को लेकर दो अलग-अलग कहानियां सामने आ रही हैं.
पहली कहानी में टाटा ट्रस्ट्स खुद को संस्था के संरक्षक के रूप में देखते हैं. उनके पास करीब एक सदी पुरानी हिस्सेदारी है और उनके गठन के समय से ही समाजसेवा का उद्देश्य जुड़ा हुआ है. कंपनी के नियमों में कुछ अधिकार जानबूझकर इस तरह रखे गए थे ताकि ऐसे मामलों में ट्रस्ट्स की भूमिका सुरक्षित रहे.

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टाटा ट्रस्ट्स ने क्या दलील दी है
ट्रस्ट्स का कहना है कि बोर्ड ने मालिकों की इच्छा को नजरअंदाज किया है. अगर ऐसा फैसला कायम रहता है तो भारत की कंपनियों में प्रमोटरों को दिए गए लिखित अधिकारों की सुरक्षा पर सवाल खड़ा होगा. ट्रस्ट्स की ओर से अब वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी पैरवी कर रहे हैं. उन्होंने इसे भारत की सैकड़ों कंपनियों में कॉरपोरेट गवर्नेंस के लिए महत्वपूर्ण मामला बताया है.
दूसरी कहानी में टाटा संस एक ऐसी संस्था है, जो समय के साथ बहुत बड़ी हो चुकी है. करीब दो लाख करोड़ रुपये की संपत्ति वाले समूह को कुछ ट्रस्टियों के बीच मतभेदों के कारण ठप नहीं किया जा सकता. टाटा को वैश्विक कंपनी बनाने में पेशेवर प्रबंधन, पारदर्शिता और ऐसे नियमों की भूमिका रही है, जो किसी व्यक्ति पर निर्भर नहीं होते. टाटा संस और चंद्रशेखरन की ओर से सलाह दे रहे वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने सार्वजनिक रूप से इस तर्क को कई बार रखा है.
दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क को टाटा की पुरानी परंपरा से जोड़ते हैं. लेकिन पिछले पांच हफ्तों में जो घटनाएं हुई हैं, उन्हें देखते हुए इनमें से एक कहानी ज्यादा आसानी से घटनाक्रम से मेल खाती है.
एन चंद्रशेखरन ने कब दिया था इस्तीफा
12 अगस्त को एन चंद्रशेखरन ने बोर्ड को पत्र लिखकर कहा था कि फरवरी 2027 में उनका मौजूदा कार्यकाल खत्म होने के बाद वह नया कार्यकाल नहीं मांगेंगे. टाटा ट्रस्ट्स ने उनके इस फैसले को स्वीकार कर लिया और कंपनी के नियमों के मुताबिक नया अध्यक्ष चुनने के लिए एक चयन समिति बनाने को कहा. लेकिन इसके करीब पांच सप्ताह बाद बोर्ड ने चंद्रशेखरन को अगले पांच साल के लिए फिर से नियुक्त कर दिया.
इस तरह कंपनी में करीब दो-तिहाई हिस्सेदारी रखने वाले मालिक खुद को ऐसे फैसले में अल्पमत में पाए, जिसके बारे में उन्हें लगा था कि मामला पहले ही तय हो चुका है.
टाटा संस का अपना जवाब है.कंपनी का कहना है कि उसकी नॉमिनेशन और रेम्यूनरेशन कमिटी ने सर्वसम्मति से चंद्रशेखरन से अपना फैसला बदलने को कहा था और वह इसके लिए तैयार हो गए.
कानूनी प्रक्रिया के लिहाज से यह तर्क सही साबित हो सकता है. लेकिन जनता के सामने यह समझाना मुश्किल है कि कंपनी के अध्यक्ष का खुद पद छोड़ने का फैसला, जिसे सबसे बड़े मालिक ने स्वीकार कर लिया था, बाद में उसी मालिक की सहमति के बिना कैसे बदला जा सकता है.
नामित निदेशक किसके प्रति जिम्मेदार है
बोर्ड का एक महत्वपूर्ण तर्क भी है. कंपनी कानून के तहत किसी नामित निदेशक की जिम्मेदारी पूरी कंपनी के प्रति होती है, न कि केवल उस व्यक्ति या संस्था के प्रति जिसने उसे नामित किया है. हालांकि इस बात पर भी विवाद हो सकता है कि नामित निदेशक की जिम्मेदारी कंपनी के प्रति ज्यादा है या उसे नामित करने वाली संस्था के प्रति भी उसकी कुछ जिम्मेदारी होती है.
वेणु श्रीनिवासन ने खुद भी पहले कंपनी के प्रति अपनी जिम्मेदारी की बात कही थी. यह उस समय भी हुआ था जब सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट ने उन्हें टाटा संस की लिस्टिंग से जुड़े मामले में वोट करने से रोकने की कोशिश की थी. श्रीनिवासन ने उस निर्देश को सार्वजनिक रूप से गैरकानूनी बताया था.
अब सवाल यह है कि दो नामित निदेशकों का अलग-अलग तरीके से वोट करना इस व्यवस्था के सही तरीके से काम करने का उदाहरण है या इसके कमजोर पड़ने का?
यह एक वास्तविक कानूनी तर्क है. लेकिन इसमें एक बड़ी समस्या भी है. जिन मामलों में विशेष रूप से 'अफरमेटिव वोट' या खास समर्थन की शर्त रखी गई है, उनका उद्देश्य ही यह है कि कुछ महत्वपूर्ण फैसले सामान्य बोर्ड बहुमत के आधार पर न लिए जा सकें. अगर कोई एक नामित निदेशक बोर्ड के साथ वोट कर दे और इससे यह विशेष सुरक्षा खत्म हो जाए तो फिर इन सुरक्षा प्रावधानों का मतलब ही क्या रह जाएगा?
इस मामले में टाटा ट्रस्ट्स का पक्ष ज्यादा मजबूत है. हालांकि असल में इन नियमों की कानूनी व्याख्या क्या होगी, इसका फैसला अदालत ही करेगी.
टाटा संस के सामने बड़ा सवाल क्या है
टाटा संस के सामने एक और महत्वपूर्ण सवाल है, जिसे ट्रस्ट्स लगातार उठा रहे हैं. आज जिन सुरक्षा प्रावधानों को कमजोर बताया जा रहा है, कभी टाटा संस खुद इन्हीं प्रावधानों का बचाव कर चुकी है. सायरस मिस्त्री विवाद के दौरान नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (एनसीएलएटी) ने इन प्रावधानों को दमनकारी बताया था. लेकिन टाटा संस का तर्क था कि ये प्रावधान सही और वैध सुरक्षा उपाय हैं, जो कंपनी में बहुमत हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट्स की स्थिति से जुड़े हैं. मार्च 2021 में सुप्रीम कोर्ट में टाटा संस इस मामले में जीत गई थी.
हरीश साल्वे ने संकेत दिया कि अगर टाटा संस सार्वजनिक कंपनी बनती है यानी उसकी लिस्टिंग होती है तो ये प्रतिबंध खत्म हो सकते हैं.
कानून के लिहाज से यह तर्क सही हो सकता है. लेकिन आम लोगों के नजरिए से यह सवाल जरूर उठता है कि जिन सुरक्षा प्रावधानों का टाटा संस ने कभी बचाव किया था, आज कंपनी उन्हीं को किस नजर से देख रही है. इससे टाटा संस की संभावित लिस्टिंग का विवाद और चंद्रशेखरन के कार्यकाल का विवाद भी आपस में जुड़ता दिखाई देता है.
लोग इस विवाद को किस नजर से देख रहे हैं?
इस पूरी कहानी को अलग-अलग लोग अलग नजरिए से देख रहे हैं. टाटा समूह के कर्मचारी यह जानना चाहते हैं कि क्या समूह अब भी अपनी पुरानी पहचान और मूल भावना को समझता है. टाटा की लिस्टेड कंपनियों के निवेशक यह देख रहे हैं कि क्या कॉरपोरेट गवर्नेंस का जोखिम अब सिर्फ एक कंपनी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे समूह के ढांचे तक पहुंच गया है.
युवा भारतीय, जिनमें से बहुत से लोगों को रतन टाटा की सक्रिय भूमिका की केवल धुंधली याद है, टाटा समूह को एक राष्ट्रीय संस्था के बजाय एक कॉरपोरेट विवाद के रूप में देख रहे हैं.
रेगुलेटर भी इस पर नजर रखे हुए हैं, क्योंकि रिज़र्व बैंक पहले ही टाटा संस की रजिस्ट्रेशन खत्म करने की कोशिश को नामंजूर कर चुका है और संभावित लिस्टिंग पर अपनी स्थिति को सुरक्षित रखने के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट में कैविएट भी दाखिल कर चुका है.
कैसे कायम होता है किसी कारोबार पर भरोसा
जिस कारोबारी घराने ने एक सदी तक इस सवाल का जवाब देने की कोशिश की कि भारतीय कारोबार पर भरोसा कैसे किया जा सकता है, उसके लिए शेयरधारकों के विवाद का उदाहरण बन जाना एक महंगा बदलाव हो सकता है.
भरोसा वापस पाना आसान नहीं होगा. किसी संस्था पर लोगों का भरोसा शेयर की कीमत की तरह तेजी से वापस नहीं आता.
एक बार लोग जब यह पूछना शुरू कर दें कि टाटा की असली आवाज किस पक्ष के पास है, तो अदालत का फैसला आने के बाद भी यह सवाल खत्म नहीं होगा.
नोएल टाटा की स्थिति को समझाना अपेक्षाकृत आसान है. वह किसी व्यक्तिगत अधिकार की बात करने के बजाय कंपनी के लिखित नियमों में मौजूद सुरक्षा प्रावधानों की बात कर रहे हैं. उनका कहना है कि वही प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए जो कंपनी के नियमों में लिखी हुई है. अदालत में उनका तर्क स्वीकार किया जाएगा या नहीं, यह अभी तय नहीं है. लेकिन आम लोगों के बीच टाटा की जो छवि रही है, उस नजरिए से देखें तो यह तर्क उस टाटा की छवि से ज्यादा मेल खाता हुआ दिखाई देता है, जिसे लोग लंबे समय से जानते आए हैं.
वकील यह तय कर देंगे कि कंपनी के नियमों के तहत क्या किया जा सकता है और क्या नहीं. लेकिन वे यह तय नहीं कर सकते कि टाटा आखिर किस चीज का प्रतीक है. यह सवाल अब एक ऐसी अदालत में पहुंच चुका है, जहां फैसला धीरे-धीरे आता है, उसका कोई औपचारिक ऐलान नहीं होता और उसके खिलाफ अपील करना लगभग असंभव होता है.
यह अदालत जनता की धारणा और भरोसे की अदालत है.
(डिस्क्लेमर: लेखक एक बिजनेस लीडर और कॉलमिस्ट हैं. उन्होंने रॉयल एनफील्ड, टाटा मोटर्स, डियाजियो, वीजा और हिंदुस्तान यूनिलीवर जैसी कंपनियों में उच्च पदों पर काम किया है. अभी वो न्यूयॉर्क के 'एफीज लायन फाउंडेशन' में ग्लोबल बोर्ड मेंबर के रूप में सेवाएं दे रहे हैं. लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)