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माघ मेला: बसंत पंचमी पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के स्नान पर सस्पेंस, मौनी अमावस्या पर रोका तो मचा था बवाल

बसंत पंचमी माघ मेले का एक और महत्वपूर्ण स्नान पर्व है. ऐसे में सवाल यह है कि क्या सहमति बन पाएगी और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद संगम स्नान करेंगे या उनका धरना आगे भी जारी रहेगा. फिलहाल प्रशासन की ओर से नियमों का पालन अनिवार्य बताए जाने और संत पक्ष से सम्मानजनक समाधान की मांग के बीच निगाहें आज के घटनाक्रम पर टिकी हैं.

माघ मेला: बसंत पंचमी पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के स्नान पर सस्पेंस, मौनी अमावस्या पर रोका तो मचा था बवाल
  • माघ मेले में मौनी अमावस्या को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के पालकी से संगम स्नान रोकने पर विवाद उत्पन्न हुआ था.
  • प्रशासन ने भीड़ नियंत्रण के लिए नियम बनाए थे और पालकी से आगे बढ़ने पर रोक लगाई थी जिससे भगदड़ का खतरा था.
  • स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने रोक को परंपराओं में हस्तक्षेप बताया और धरना शुरू कर दिया था.

माघ मेले में बसंत पंचमी के पावन स्नान पर्व पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद संगम में स्नान करेंगे या उनका धरना जारी रहेगा, इसको लेकर स्थिति अब भी स्पष्ट नहीं है. इसकी जड़ें मौनी अमावस्या के दिन हुए उस विवाद से जुड़ी हैं, जिसने मेला प्रशासन और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बीच टकराव को जन्म दिया.

मौनी अमावस्या के दिन क्या हुआ था?

दरअसल 18 जनवरी को मौनी अमावस्या के अवसर पर माघ मेले में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी हुई थी. भीड़ नियंत्रण और सुरक्षा कारणों से मेला प्रशासन ने कुछ क्षेत्रों में केवल पैदल आवागमन की अनुमति दी थी. प्रशासन के अनुसार, इसी दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने समर्थकों के साथ पालकी/रथ जैसे साधन से संगम स्नान के लिए आगे बढ़े, जिसे रोक दिया गया.

प्रशासन का दावा है कि निर्धारित नियमों के उल्लंघन और बैरिकेड तोड़े जाने से भगदड़ जैसी स्थिति उत्पन्न होने का खतरा था, इसलिए एहतियातन उन्हें आगे बढ़ने से रोका गया.

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धरने की शुरुआत और आरोप-प्रत्यारोप

स्नान रोके जाने के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इसे परंपराओं में हस्तक्षेप बताते हुए अपने शिविर के बाहर धरना शुरू कर दिया. उनकी ओर से आरोप लगाया गया कि प्रशासन ने सम्मानजनक ढंग से मार्ग नहीं दिया और उनके साथ भेदभाव किया गया. वहीं मेला प्रशासन का कहना है कि नियम सभी के लिए समान हैं और लाखों श्रद्धालुओं की सुरक्षा सर्वोपरि है.

नोटिस और कानूनी पेच

विवाद बढ़ने पर प्रयागराज मेला प्राधिकरण ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को कारण बताओ नोटिस जारी किया. नोटिस में मौनी अमावस्या के दिन की कथित अव्यवस्था के साथ‑साथ उनके द्वारा ‘शंकराचार्य' पदनाम के प्रयोग पर भी सवाल उठाया गया, जिसका संदर्भ सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामले से जोड़ा गया है.  

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नोटिस में लिखा गया कि आपने खुद को शंकराचार्य बताते हुए मेले में जगह-जगह बोर्ड लगाए गए हैं, जबकि आधिकारिक रूप से आपके शंकराचार्य होने पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई है. ये सुप्रीम कोर्ट की अवमानना है. इसमें पूछा गया है कि आपके इस कृत्य के कारण आपकी संस्था को दी जा रही भूमि और सुविधाओं को निरस्त कर आपको हमेशा के लिए मेले में आने से प्रतिबंधित क्यों न कर दिया जाए?

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मुक्तेश्वरानंद ने जवाब में क्या कहा?

मेला प्रशासन ने 24 घंटे के भीतर इस पर जवाब मांगा था. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से इस नोटिस का जवाब दिया गया. इसमें कहा गया कि बग्घी एक ऐसी गाड़ी को कहते हैं, जिसे कम से कम दो घोड़े खींचते हैं और उसमें 3-4 फुट व्यास वाले चार पहिए लगे होते हैं. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के पास न तो मेला क्षेत्र में और न ही आश्रम में कोई बग्घी है और न कभी थी. इसलिए ये आरोप निराधार, मनगढ़ंत और बेबुनियाद हैं.

जवाब में कहा गया है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पालकी से 18 जनवरी को त्रिवेणी संगम जा रहे थे, जिसे भक्तगण अपने कंधों पर उठाते हुए धकेल रहे थे. पालकी से चलना उनके धार्मिक कृत्य का अभिन्न अंग है, जो आदि शंकराचार्य के काल से 2,500 साल से भी ज्यादा समय से चला आ रहा है. उस पालकी में 6 इंच के व्यास वाले स्टील के पहिए लगे हैं. उसमें घोड़े और मोटर नहीं है. 

शंकराचार्य के पद पर क्या कहा?

मेला प्रशासन ने अपने नोटिस में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य होने पर भी सवाल उठाए हैं. इस पर जवाब देते हुए कहा गया है कि इसका जवाब सुप्रीम कोर्ट में अविमुक्तेश्वरानंद के वकील डॉ. पीएन मिश्र ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में और वकील अंजनी कुमार मिश्र ने आपको भेज दिया है. इस जवाब में अलग-अलग अदालती आदेश के आधार पर दावा किया है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जगद्गुरु शंकराचार्य हैं और इस पर सवाल उठाना आप जैसे प्रशासनिक अधिकारी के अधिकार क्षेत्र से परे है.

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स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के पक्ष का कहना है कि नोटिस पक्षपातपूर्ण है और उन्होंने तय परंपराओं के अनुसार ही स्नान की मांग की थी. उनके प्रतिनिधियों ने प्रशासनिक कार्रवाई को चुनौती देने की बात भी कही है.

अब बसंत पंचमी पर क्या होगा?

बसंत पंचमी माघ मेले का एक और महत्वपूर्ण स्नान पर्व है. ऐसे में सवाल यह है कि क्या सहमति बन पाएगी और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद संगम स्नान करेंगे या उनका धरना आगे भी जारी रहेगा. फिलहाल प्रशासन की ओर से नियमों का पालन अनिवार्य बताए जाने और संत पक्ष से सम्मानजनक समाधान की मांग के बीच निगाहें आज के घटनाक्रम पर टिकी हैं.

माघ मेले में चल रहा यह विवाद अब सिर्फ स्नान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था, परंपरा और कानून तीनों के टकराव का विषय बन गया है.

लेखक के बारे में
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सत्यम बघेल
chief sub editor
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