इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रामपुर से समाजवादी पार्टी के सांसद मोहिबुल्लाह को बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ दायर चुनाव याचिका को खारिज कर दिया है. यह याचिका 2024 लोकसभा चुनाव में बीजेपी प्रत्याशी रहे घनश्याम सिंह लोधी ने दाखिल की थी, जिसमें सपा सांसद के निर्वाचन की वैधता को चुनौती दी गई थी.
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि चुनाव याचिका में किसी भी वाद-कारण (Cause of Action) का स्पष्ट खुलासा नहीं किया गया है. अदालत ने इसे कानूनन आधारहीन मानते हुए सुनवाई योग्य नहीं करार दिया.
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
याचिका खारिज करते समय कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी भी की. न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के टी. अरिवंदम बनाम टी. सत्यपाल मामले का हवाला देते हुए कहा कि जिस तरह से अदालत की प्रक्रिया का बार-बार और बिना पश्चाताप दुरुपयोग किया गया है, उसकी निंदा करने में कोर्ट को कोई हिचक नहीं है.
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कोर्ट ने कहा कि मुकदमों की अर्जियां स्वीकार करने में कानून की अत्यधिक उदारता का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए. इसी संदर्भ में अदालत ने नोबेल पुरस्कार विजेता साहित्यकार और प्रसिद्ध नाटककार जॉर्ज बर्नार्ड शॉ की वह टिप्पणी उद्धृत की, जो उन्होंने महात्मा गांधी की हत्या पर करते हुए कही थी, 'बहुत ज़्यादा अच्छा होना खतरनाक है'.
CPC के तहत याचिका खारिज
कोर्ट ने मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 7 नियम 11 के तहत प्रतिवादी सांसद की ओर से दायर आवेदन को स्वीकार कर लिया और याचिका को खारिज कर दिया. यह आदेश जस्टिस चंद्र कुमार राय ने पारित किया.
क्या था पूरा मामला
2024 लोकसभा चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार रहे घनश्याम सिंह लोधी ने रामपुर से सपा सांसद मोहिबुल्लाह के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनाव याचिका दाखिल की थी. याचिका में आरोप लगाया गया था कि सांसद मोहिबुल्लाह ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123(7) के तहत भ्रष्ट आचरण किया, उनका नामांकन पत्र गलत तरीके से स्वीकार किया गया और नामांकन प्रक्रिया में वैधानिक नियमों का उल्लंघन हुआ.
याचिकाकर्ता का दावा था कि मतदाता सूची में प्रतिवादी का नाम अलग था और रिटर्निंग ऑफिसर ने बिना उचित स्पष्टीकरण के नामांकन स्वीकार कर लिया, जो भ्रष्ट आचरण की श्रेणी में आता है.
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प्रतिवादी की दलील और कोर्ट का निष्कर्ष
सांसद मोहिबुल्लाह की ओर से अधिवक्ता नरेंद्र कुमार पांडे ने अदालत में कहा कि याचिका में लगाए गए आरोप पूरी तरह अस्पष्ट और सामान्य प्रकृति के हैं। उन्होंने दस्तावेजों के जरिए बताया कि निर्वाचन अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत शपथ-पत्र में नाम संबंधी विसंगतियों को स्पष्ट कर दिया गया था और चुनाव नियमों के अनुसार विधिवत सुधार की प्रक्रिया अपनाई गई थी.
कोर्ट ने माना कि भ्रष्ट आचरण के आरोपों को लेकर आवश्यक ‘भौतिक तथ्यों' (Material Facts) का अभाव है, जो कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 83 के तहत अनिवार्य है.
चुनाव कानून पर कोर्ट की अहम टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि चुनाव कानून एक विशेष क्षेत्राधिकार है, जहां याचिकाओं को कड़े वैधानिक मानकों पर खरा उतरना होता है. याचिका में यह भी नहीं बताया गया कि कथित विसंगतियों से चुनाव परिणाम पर कोई ठोस और भौतिक प्रभाव कैसे पड़ा. इन्हीं आधारों पर कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि निरर्थक और आधारहीन मुकदमेबाजी को शुरुआती स्तर पर ही समाप्त किया जाना न्याय के हित में है.
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