- UP में अगले साल विधानसभा चुनाव से पहले ब्राह्मण समुदाय को लेकर चार महीने में करीब दस विवाद सामने आए हैं
- ब्राह्मण विधायकों की बैठक, घूसखोर पंडित फिल्म और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के मामले ने राजनीतिक माहौल गर्म किया
- पुलिस भर्ती परीक्षा और परिषदीय स्कूल के पेपर में पंडित शब्द के इस्तेमाल को लेकर भी ब्राह्मणों में असंतोष
उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा के चुनाव होने हैं. चुनाव से पहले एक एक कर ब्राह्मणों से जुड़ा विवाद सामने आ रहा है. बीते चार महीनों में एक के बाद एक करके लगभग 10 विवाद ब्राह्मणों को लेकर सामने आए हैं. इनमें कुछ विवाद ऐसे हैं, जिसे परिस्थितियों की वजह से उपजा हुआ माना जा सकता है, लेकिन कुछ ऐसे हैं, जिन्हें देखकर सवाल उठता है कि ये महज़ संयोग है या फिर इसके पीछे कोई गहरी साजिश.
कौन कौन से विवाद सामने आए?
ब्राह्मण विवाद की शुरुआत पिछले साल तब शुरू हुई जब विधानसभा सत्र के दौरान ब्राह्मण विधायकों की बैठक हुई. इसके बाद घूसखोर पंडित नाम की फ़िल्म ने सियासी गलियारों में हंगामा खड़ा कर दिया. फिर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर ब्राह्मणों ने इसे अपना अपमान बताने की कोशिश की. इस विवाद के बीच डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने बटुक पूजा करके माहौल गरमा दिया. रही सही कसर यूजीसी की गाइडलाइंस ने की. इसके बाद पुलिस भर्ती परीक्षा और परिषदीय स्कूल के पेपर में पंडित से जुड़े सवाल से भी बवाल शुरू हो गया.
ब्राह्मण विधायकों की बैठक
यूपी विधानसभा सत्र के दौरान बीजेपी के 40 से ज़्यादा विधायक एक साथ बैठे. बैठक की तस्वीर सामने आई. इसको लेकर हंगामा शुरू हो गया. ब्राह्मण विधायकों में इसे “बैठकी” बताया लेकिन विपक्ष में कहा ये ब्राह्मणों की नाराज़गी का प्रतीक है. विवाद ख़त्म होता, उससे पहले ही बीजेपी के नए नवेले प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने इस तरह की बैठकों पर आपत्ति दर्ज करा दी. इस आपत्ति पर सवाल उठा कि जब क्षत्रिय विधायक बैठे तब क्यों नहीं नोटिस जारी किया गया?
घूसखोर पंडत विवाद क्या था
बॉलीवुड एक्टर मनोज बाजपेयी और निर्माता नीरज पांडे की नेटफ़्लिक्स पर फ़िल्म आने वाली थी. फ़िल्म का टीज़र लांच हुआ और नाम सामने आया “घूसखोर पंडत”. इस नाम को ब्राह्मण अस्मिता से जोड़ते हुए कई ब्राह्मण विधायकों ने आपत्ति दर्ज कराई. ख़ुद सीएम के निर्देश पर लखनऊ में फ़िल्म के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज की गई. ब्राह्मण संगठन सड़क पर आ गए. नतीजा ये हुए कि फ़िल्म निर्माता को नाम बदलने की घोषणा करनी पड़ी.
अविमुक्तेश्वरानंद विवाद क्या है?
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद माघ मेले में मौनी अमावस्या के मौके पर रथ पर सवार होकर संगम जाकर स्नान करना चाहते थे. प्रशासन ने भीड़ का हवाला देकर रथ को रोक दिया. अविमुक्तेश्वरानंद ने इसे शंकराचार्य का अपमान बताते हुए धरने पर बैठने की घोषणा कर दी. प्रशासन ने उन्हें दो नोटिस थमा दिए. इस बीच एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें एक पुलिसकर्मी किसी बटुक की शिखा (चोटी) खींचता हुआ दिख रहा था. नतीजा ये हुए कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के अपमान को ब्राह्मणों का अपमान बताकर माहौल बनाने की कोशिश हुई.

अधिकारी भी मैदान में कूद पड़े
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद मामले में अजब स्थिति तब पैदा हो गई जब बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने ब्राह्मण अस्मिता का अपमान बताकर नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया. खुलकर सरकार के ख़िलाफ़ बयानबाज़ी करने लगे. इसी बीच अयोध्या के जीएसटी विभाग के डिप्टी कमिश्नर ने सरकार के पक्ष में खड़े होकर इस्तीफे की पेशकश कर दी. हालांकि बाद में उन्होंने अपना इस्तीफ़ा वापस ले लिए लेकिन अलंकार अग्निहोत्री ने अपनी राजनैतिक पार्टी बनाने की घोषणा कर दिया.
डिप्टी सीएम की बटुक पूजा
यूपी में डिप्टी सीएम और बीजेपी के ब्राह्मण चेहरे ब्रजेश पाठक ने बटुक विवाद के बीच अपने सरकार घर पर बटुकों का सम्मान किया. 101 बटुक ब्रजेश पाठक के घर पहुंचे. उन पर फूलों की वर्षा कराई गई, अंगवस्त्रम दिया गया, उन्हें जलपान हुआ और डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने अपनी पत्नी के साथ सभी बटुकों के पास जाकर हाथ जोड़कर उनका अभिवादन किया. तस्वीरें सामने आयीं तो कहा गया कि डिप्टी सीएम डैमेज कंट्रोल कर रहे हैं.

यूजीसी गाइडलाइन से हुआ बखेड़ा
यूजीसी ने जनवरी में नई गाइडलाइन जारी की. इस गाइडलाइन को लेकर सवर्ण समाज के लोग सड़कों पर आ गए. यूं तो इस गाइडलाइन का विरोध पूरा सवर्ण समाज कर रहा था लेकिन इसमें ब्राह्मणों ने आगे बढ़कर अपना विरोध दर्ज कराया. ब्राह्मणों ने कहा कि ये साजिशन हुआ है ताकि आरक्षित वर्ग का वोट बटोरा जा सके. हालांकि मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया और उस पर सुनवाई जारी है लेकिन इसको लेकर विरोध दर्ज कराने की कोशिश लगातार जारी है.
पुलिस भर्ती बोर्ड का विवादित सवाल
यूपी पुलिस की भर्ती की परीक्षा में आए एक सवाल के विवादित विकल्प ने तो अजब स्थिति पैदा कर दी. मौके के हिसाब से बदल जाने वाले को क्या कहते हैं? इस सवाल के जवाब के लिए विकल्प में तीसरा विकल्प “पंडित” दिया गया. पेपर ख़त्म होते होते पेपर वायरल हो गया. लोगों ने कहा कि क्या ब्राह्मण अवसरवादी है? जम कर हो-हल्ला मचा. डिप्टी सीएम से लेकर मंत्री विधायकों और विपक्ष ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई तो सरकार को अधिकारियों को चेतावनी देनी पड़ी.
स्कूल के पेपर में भी विवाद
पुलिस भर्ती परीक्षा का विवाद अभी चल ही रहा था तभी यूपी के परिषदीय स्कूलों की सालाना परीक्षा में क्लास 7 के पेपर में एक सवाल पूछा गया. इसमें भी “पंडित” शब्द का इस्तेमाल हुआ. सोशल मीडिया में विवाद शुरू हुआ तो इसको लेकर जिम्मेदार लोगों ने अपनी आवाज़ उठानी शुरू कर दी. इस विवाद पर सवाल ये पूछा गया कि आख़िर “पंडित” से जुड़ा सवाल या विकल्प देना आख़िर ज़रूरी क्यों है?

ये सब संयोग या साज़िश?
सवाल यही है कि क्या ये सब महज़ संयोग है या फिर कोई साज़िश. विधायकों की बैठक हुई तो उसकी तस्वीर बाहर कैसे आई? अविमुक्तेश्वरानंद के विवाद को सोशल मीडिया और ह्वाट्सऐप से किसने गहराने की कोशिश की. 13 जनवरी को आए यूजीसी गाइडलाइन को जनवरी के तीसरे हफ़्ते के बाद मुद्दा बनाया गया. अलंकार अग्निहोत्री को किसने बैकअप दिया. पुलिस भर्ती और परिषदीय स्कूल मामले में किसने “पंडित” के नाम पर विवाद कराने की कोशिश की? ये सब सच में साजिश है, ये तो नहीं कहा जा सकता लेकिन कहीं ना कहीं साज़िश की आशंका ज़रूर पैदा होती है.
चार महीने में दस विवाद
अगर ब्राह्मण विधायकों की बैठक को ब्राह्मण विवाद की शुरुआत मानें तो दिसंबर से लेकर अबतक यानी मार्च तक कुल चार महीने होते हैं. इन चार महीनों में एक एक करके लगभग दस विवाद सामने आ चुके हैं. क्या एक के बाद एक इतने विवाद संयोग हो सकते हैं? ये बड़ा सवाल है. अगर ये साज़िश है तो इससे भी बड़ा सवाल है कि आख़िर इस साज़िश के पीछे कौन है और इस साज़िश की मंशा क्या है?
ब्राह्मण इतना ज़रूरी क्यों
यूपी में ब्राह्मणों की आबादी 10 से 12 फीसदी मानी जाती है. ये संख्या किसी भी दल के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. ब्राह्मण को दिशा देने वाला माना जाता है. कहा जाता है कि एक ब्राह्मण दूसरी जाति का कम से कम एक वोटों को अपने प्रभाव में रखता है. यानी ब्राह्मण माहौल बनाने में माहिर माना जाता है. इसी वजह से कोई भी राजनैतिक दल ब्राह्मणों को साधने में कोई कोर कसर छोड़ना नहीं चाहता. अगले साल के विधानसभा चुनाव की बिसात बिछ चुकी है और जातीय वोटबैंक को साधने की चाल चली जा रही है.
ब्राह्मण किसके साथ?
यूपी की राजनीति में 1989 के बाद अब तक कोई ब्राह्मण सीएम की कुर्सी पर नहीं बैठ पाया है. 37 साल पहले नारायण दत्त तिवारी कांग्रेस की सरकार में यूपी के सीएम थे. 90 का दशक शुरू होते होते मंडल-कमंडल की राजनीति ने यूपी की राजनीति की दिशा को मोड़ दिया. ब्राह्मण पहले कांग्रेस के पक्ष में माना जाता था. राम मंदिर आंदोलन के साथ ब्राह्मण बीजेपी के साथ खड़ा होता दिखाई दिया. साल 2007 में मायावती के दलित-ब्राह्मण फ़ॉर्मूले ने ब्राह्मणों को बीएसपी की तरफ़ मोड़ दिया. साल 2014 से फिर से ब्राह्मण बीजेपी के पक्ष में माना जा रहा है.
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यूपी की मंडल-कमंडल की राजनीति
उत्तर प्रदेश की राजनीति मंडल-कमंडल के बीच घूमती रही है. वीपी सिंह की सरकार में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कर पिछड़ा आरक्षण देने के बाद यूपी में त्रिकोणीय लड़ाई देखने को मिली. बीजेपी, सपा और बसपा हमेशा मुख्य लड़ाई में दिखे. पिछले एक दशक में जातीय आधार पर खड़े हुए क्षेत्रीय दलों का भी बड़ा उदय देखने को मिला है. निषादों, राजभरों या कुर्मियों की तरह ब्राह्मणों के पास कोई राजनैतिक विकल्प नहीं है. ऐसा लगता है कि ब्राह्मण एक नया राजनैतिक विकल्प खड़ा करने की कोशिश कर रहा है.
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चुनावों पर असर पड़ेगा?
अगले साल होने वाले यूपी विधानसभा चुनाव में ब्राह्मण कितना वड़ा फैक्टर है? इस सवाल का जवाब थोड़ी बहुत राजनीति की समझ रखने वाला दे सकता है और जवाब होगा कि बड़ा असर हो सकता है. ब्राह्मण अगर एकजुट होकर किसी दल के साथ खड़ा हो जाये तो जिस राजनैतिक दल के साथ वो जाएगा, वो मुख्य लड़ाई में तो ज़रूर रहेगा. अगर जातीय समीकरण में कुछ और जातियां जुड़ जायें तो वो दल सत्ता के शिखर तक भी जा सकता है. ऐसे में ब्राह्मण किसके साथ रहेगा, ये देखना दिलचस्प होगा.
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