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'तारीख पे तारीख' के लिए केवल जज नहीं, सरकार और पुलिस भी जिम्मेदार: इलाहाबाद हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी

Tarikh Pe Tarikh Allahabad High Court: फतेहपुर के मेवालाल प्रजापति की जमानत खारिज करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार और पुलिस को आईना दिखाया है. हाईकोर्ट ने यूपी के पुलिस सिस्टम की जो 'कुंडली' खोली है, वो हैरान करने वाली है. इस रिपोर्ट में जानिए कोर्ट ने क्यों कहा कि 'तारीख पे तारीख' के पीछे असली हाथ सरकार और पुलिस का है.

'तारीख पे तारीख' के लिए केवल जज नहीं, सरकार और पुलिस भी जिम्मेदार: इलाहाबाद हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी
  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी की न्यायिक व्यवस्था में देरी के लिए पुलिस और सरकार को भी जिम्मेदार ठहराया है
  • कोर्ट ने जिला पुलिस प्रमुखों की मासिक मॉनिटरिंग बैठकों में गैरहाजिरी पर कड़ी नाराजगी जताई है
  • न्यायालयों में स्टाफ की कमी, पुलिस गवाहों का समय पर न आना तथा फॉरेंसिक रिपोर्ट में देरी पर उठाए सवाल
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Allahabad High Court slams up police: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फतेहपुर से जुड़ी एक जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था पर चिंता जताई है और बेहद कड़ी टिप्पणी की है. जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की सिंगल बेंच ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि अदालती मामलों में होने वाली देरी के लिए केवल न्यायिक अधिकारी जिम्मेदार नहीं हैं. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार, पुलिस तंत्र और कमजोर जांच प्रणाली इस देरी के बड़े कारण हैं. अध्ययन का हवाला देते हुए कोर्ट ने माना कि जिला न्यायालयों में आपराधिक मामलों के लंबित रहने की मुख्य वजह मिनिस्टीरियल स्टाफ, स्टेनोग्राफर और बयान लिखने वालों की भारी कमी है. इसके साथ ही पुलिस द्वारा अदालती प्रक्रियाओं का सही पालन न करना और फॉरेंसिक रिपोर्ट मिलने में होने वाली देरी न्याय की गति को धीमा कर देती है.

पुलिस और मॉनिटरिंग सिस्टम पर उठाए सवाल

कोर्ट ने पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि उनके पास अदालती प्रक्रियाओं को लागू करने के लिए कोई असरदार मॉनिटरिंग सिस्टम नहीं है. हाईकोर्ट ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि जिला जज की अध्यक्षता में होने वाली मासिक मॉनिटरिंग सेल की बैठकों में जिला पुलिस प्रमुख और पुलिस कमिश्नर खुद शामिल नहीं होते, बल्कि अपने प्रतिनिधियों को भेज देते हैं. कोर्ट के अनुसार, जिला अदालतों में क्रिमिनल केस लंबित रहने की सबसे बड़ी वजह अदालती प्रक्रिया का पूरा न होना और पुलिस गवाहों का समय पर पेश न होना है. कोर्ट ने चिंता जताई कि देरी का फायदा उठाकर अपराधी बिना किसी डर के बार-बार जुर्म करते हैं और कई तो विधायक, सांसद और मंत्री तक बन जाते हैं.

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राजनीति के अपराधीकरण और स्टाफ की कमी पर चिंता

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि आज की तारीख में उत्तर प्रदेश सरकार के 49 प्रतिशत मंत्रियों पर क्रिमिनल केस दर्ज हैं, जिनमें से 44 प्रतिशत पर संगीन मामले हैं.

कोर्ट का मानना है कि अगर जिला न्यायपालिका को पर्याप्त स्टाफ और पुलिस का सही सहयोग मिले, तो मामलों का निपटारा तेजी से होगा. इससे अपराधी सलाखों के पीछे होंगे, बेगुनाहों को क्लीन चिट मिलेगी और साफ छवि वाले लोग राजनीति में आगे आएंगे.

कोर्ट ने जोर देकर कहा कि एक स्वतंत्र और पारदर्शी न्याय व्यवस्था लोकतंत्र की रीढ़ है, लेकिन यदि न्याय व्यवस्था बुनियादी जरूरतों और इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए राज्य सरकार की दया पर निर्भर रहेगी, तो यह किसी संघर्ष करते हुए सरकारी विभाग जैसी बनकर रह जाएगी.
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न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा और 'दामिनी' का जिक्र

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों की व्यक्तिगत सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया. कोर्ट ने कहा कि यूपी में जिला न्यायाधीशों और सीजेएम को छोड़कर अन्य न्यायिक अधिकारियों को पीएसओ (PSO) उपलब्ध नहीं कराए जाते, जबकि पंजाब और हरियाणा में यह सुविधा सभी को मिलती है. अपराधियों द्वारा कोर्ट और सार्वजनिक स्थानों पर जजों को दी जाने वाली धमकियों पर चिंता जताते हुए कोर्ट ने कहा कि इससे न्यायिक कामकाज पर असर पड़ता है. इसी संदर्भ में कोर्ट ने 1993 की फिल्म 'दामिनी' के मशहूर डायलॉग "तारीख पे तारीख" का जिक्र करते हुए कहा कि यह डायलॉग इसलिए लोकप्रिय हुआ क्योंकि यह एक आम आदमी की सोच थी. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इसका कारण केवल जज नहीं बल्कि राज्य और उसकी पुलिस है, क्योंकि गवाहों और फॉरेंसिक रिपोर्ट के बिना कोई भी जज फैसला नहीं सुना सकता.
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क्या था मुख्य मामला और क्यों खारिज हुई जमानत?

दरअसल आवेदक मेवालाल प्रजापति ने फतेहपुर के हुसेनगंज थाने में दर्ज मामले में खुद को जमानत पर रिहा करने की इलाहाबाद हाईकोर्ट से गुहार लगाई थी. उसके खिलाफ हत्या समेत कई संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज हुआ था. कोर्ट में आवेदक के वकील की तरफ से कहा गया कि आवेदक 19 अक्टूबर 2025 से जेल में बंद है. जमानत पर रिहा होने के बाद वो ट्रायल में पूरी तरीके से सहयोग करेगा.

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि आवेदक के पास से खून से सना एक स्क्रू ड्राइवर भी बरामद किया गया था जिसे FSL जांच के लिए भेजा गया और FSL रिपोर्ट के अनुसार उस पर इंसान का खून पाया गया. सभी पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने आवेदक की जमानत याचिका को खारिज कर दिया.

हाईकोर्ट के 11 महत्वपूर्ण निर्देश और सरकार को आदेश

कोर्ट ने अपने आदेश में डायरेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस, सेक्रेटरी (होम) और डायरेक्टर FSL के सुझावों पर विचार करने के बाद 11 महत्वपूर्ण बिंदुओं पर निर्देश दिया है. कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार मामलों के भारी काम के बोझ को देखते हुए डिस्ट्रिक्ट कोर्ट को अतिरिक्त कर्मचारी और इंफ्रास्ट्रक्चर देने के मुद्दे पर विचार करेगी. राज्य सरकार एक साल के अंदर यूपी की फोरेंसिक साइंस लैबोरेटरीज में खाली जगहों को भरने के साथ-साथ हाई-एंड इंस्ट्रूमेंट्स देने की कोशिश करेगी. इसके अलावा DGP सभी जांच अधिकारियों को निर्देश देंगे कि वो खून से सने हथियार और कपड़े पर मिले खून के DNA का मिलान आरोपी और मृतक के DNA से करने के बारे में FSL से पूछताछ करें और ब्लड सैंपल FSL को भेजें. कोर्ट ने ज्यूडिशियल अधिकारियों को BNSS रूल्स, 2024 के साथ-साथ E-प्रोसेस रूल्स, 2026 के अनुसार e-समन, e-वारंट भेजने और e-FIR व e-चार्जशीट का इस्तेमाल करने का भी निर्देश दिया है. कोर्ट ने रजिस्ट्रार (कम्प्लायंस) को निर्देश दिया है कि वो इस आदेश की कॉपी एडिशनल चीफ सेक्रेटरी (होम) और डायरेक्टर JTRI, लखनऊ समेत संबंधित विभागों को भेजें. कोर्ट ने प्रिंसिपल सेक्रेटरी (कानून) को यह आदेश मुख्यमंत्री के सामने उनके अवलोकन के लिए भी रखने का निर्देश दिया है.

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