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पति की मौत के बाद भी पत्नी को मिलेगा गुजारा भत्ता... इलाहाबाद HC ने बताया कौन उठाएगा ये जिम्मेदारी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पति की अपील को खारिज करते हुए कहा कि यह स्थिति इसलिए बनी क्योंकि पति-पत्नी अलग हो गए थे और पत्नी ने भरण-पोषण की मांग की है. यहां तक कि कानून के अनुसार पत्नी का भरण-पोषण करने का पति का यह दायित्व उसकी मृत्यु के बाद भी बना रहता है.

पति की मौत के बाद भी पत्नी को मिलेगा गुजारा भत्ता... इलाहाबाद HC ने बताया कौन उठाएगा ये जिम्मेदारी
allahabad high court on widow maintenance
  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पति की पत्नी के खिलाफ झूठी गवाही का मुकदमा चलाने की अपील को खारिज कर दिया है
  • कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति का पत्नी का भरण-पोषण करने का दायित्व उसकी मृत्यु के बाद भी समाप्त नहीं होता है
  • विधवा पत्नी अपने दिवंगत पति की या ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण की मांग कर सकती है
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प्रयागराज:

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक पति के अपनी पत्नी के खिलाफ झूठी गवाही (Perjury) का मुकदमा चलाने की अनुमति मांगने वाली फर्स्ट अपील याचिका को खारिज करते हुए अपने अहम फैसले में गंभीर टिप्पणी की है. हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पति का अपनी पत्नी के भरण-पोषण का कानूनी दायित्व उसकी मृत्यु के बाद भी खत्म नहीं होता है. कोर्ट ने कहा कि पत्नी अपने दिवंगत पति की संपत्ति से और यदि वह असमर्थ है तो अपने ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण की मांग कर सकती है. कोर्ट ने कहा कि यह बात पूरी तरह से स्थापित है कि पति का यह दायित्व है कि वह अपनी पत्नी का भरण-पोषण करे. 

पति के मौत के बाद भी पत्नी का भरण-पोषण करना होगा...

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पति की अपील को खारिज करते हुए कहा कि यह स्थिति इसलिए बनी क्योंकि पति-पत्नी अलग हो गए थे और पत्नी ने भरण-पोषण की मांग की है, चाहे वह आपराधिक मामलों के तहत हो या हिंदू कानून में भरण-पोषण संबंधी प्रावधानों के अंतर्गत. यहां तक कि कानून के अनुसार पत्नी का भरण-पोषण करने का पति का यह दायित्व उसकी मृत्यु के बाद भी बना रहता है जिससे विधवा को अपने ससुर से भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार मिल जाता है.कोर्ट ने यह भी कहा कि यह भी पूरी तरह से स्थापित है कि जब किसी दस्तावेज पर भरोसा किया जाता है तो उस पूरे दस्तावेज को ही विश्वसनीय माना जाना चाहिए.साक्ष्य कानून में यह स्वीकार्य नहीं है कि आरोप को पुष्ट करने के उद्देश्य से दस्तावेज के केवल एक हिस्से को स्वीकार कर लिया जाए और बाकी हिस्से को अस्वीकार कर दिया जाए.

कोर्ट ने रजिस्ट्री को आदेश दिया कि अपील खारिज होने की सूचना उस परिवार न्यायालय को देगी जिसने निर्णय पारित किया था.यह आदेश जस्टिस अरिंदम सिन्हा और जस्टिस सत्यवीर सिंह की डबल बेंच ने अपीलकर्ता अकुल रस्तोगी की फर्स्ट अपील डिफेक्टिव (First Appeal Defective) को खारिज करते हुए दिया है.

किस मामले में कोर्ट ने सुनाया यह फैसला

दरअसल अपीलकर्ता अकुल रस्तोगी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में फर्स्ट अपील याचिका दाखिल की थी.अपीलकर्ता पति की ओर से अधिवक्ता ने कोर्ट में दलील दी कि उनके मुवक्किल रामपुर फैमिली कोर्ट के 6 फरवरी 2026 के उस फैसले से दुखी है जिसमें उनकी पत्नी के खिलाफ झूठी गवाही (Perjury) के लिए मुकदमा चलाने की अनुमति के लिए उनके आवेदन को फैमिली कोर्ट की ओर से खारिज कर दिया गया था.अपीलकर्ता के वकील ने कोर्ट में मांग की कि ऐसे कई आधार हैं जिन पर प्रतिवादी पत्नी ने भरण-पोषण के अपने दावे के संबंध में अपनी लिखित दलीलों में झूठे बयान दिए थे. कहा गया कि पत्नी ने यह खुलासा नहीं किया कि वह एक कामकाजी महिला है बल्कि इसके विपरीत उसने कहा कि वह एक गृहिणी है. दूसरा पत्नी ने अपील की ब्रीफ में यह दर्शाया कि बैंक ऑफ बड़ौदा और HDFC बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट रसीदों (FDR) के रूप में उसके पास कुल 20 लाख रुपये से अधिक की राशि जमा थी. पूछे जाने पर पत्नी ने बताया कि ये जमा राशियां उसके पिता ने उसके पक्ष में जमा की थी.

अपीलकर्ता के वकील ने आगे कहा कि वर्तमान में उनके मुवक्किल की जांच से पता चला है कि FDR में लगभग चार लाख रुपए जमा है.शेष राशि पत्नी ने भुना ली है इसलिए अपील को स्वीकार किए जाने की मांग करते है क्योंकि फैमिली कोर्ट ने तथ्यों और कानून के मामले में गलती करते हुए आवेदन को खारिज किया है.

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विधवा महिला ससुर से करे भरण-पोषण की मांग 

कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद कहा कि यह बात पूरी तरह से तय है कि पति का यह फर्ज है कि वह अपनी पत्नी का भरण-पोषण करे.यह स्थिति उन हालात से सामने आई है जहां पति-पत्नी अलग हो गए है और पत्नी ने भरण-पोषण की मांग की है चाहे वह आपराधिक मामलों के तहत हो या हिंदू कानून में भरण-पोषण से जुड़े प्रावधानों के तहत. बात तो यहां तक है कि कानून के अनुसार पत्नी का भरण-पोषण करने का पति का यह फर्ज उसकी मृत्यु के बाद भी बना रहता है जिससे विधवा को अपने ससुर से भरण-पोषण की मांग करने का अधिकार मिल जाता है.

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि फैमिली कोर्ट का यह स्पष्ट निष्कर्ष है कि अपीलकर्ता पति ने यह साबित करने के लिए कोई दस्तावेज पेश नहीं किया कि प्रतिवादी पत्नी नौकरी करती है. यह कहते हुए कि वह नौकरी नहीं करती उसे किसी नकारात्मक बात को साबित करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. यह साबित करने का दायित्व आवेदक पर था कि वह नौकरी में है.जहां तक FDRs (फिक्स्ड डिपॉजिट रसीदों) का सवाल है वो उसके पिता ने बनवाए थे जिनकी शादी के बाद उसका भरण-पोषण करने की कोई जिम्मेदारी नहीं है, सिवाय इसके कि वह विधवा हो जाए.

कोर्ट ने कहा कि अब प्रतिवादी पत्नी के पास केवल चार लाख रुपए बचे हैं. यह इस बात का प्रमाण है कि आवेदक की ओर से कोई भरण-पोषण न दिए जाने की स्थिति में प्रतिवादी पत्नी को अपना गुजारा करने के लिए पैसों की जरूरत है. 

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कोर्ट ने अपील को खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (Code of Civil Procedure) के ऑर्डर 41 के रूल 11 में यह प्रावधान है कि ट्रायल कोर्ट को नोटिस भेजे बिना ही अपील खारिज की जा सकती है इसलिए अपील को स्वीकार (एडमिट) करने की आवश्यकता होती है.कोर्ट ने कहा कि इन बातों को ध्यान में रखते हुए अपील को स्वीकार करने के चरण पर ही खारिज करने की शक्ति का प्रयोग करते हैं. कोर्ट ने माना कि अपीलकर्ता के वकील की तरफ से कोर्ट में पेश की गई दलीलें अपील स्वीकार करने के लिए कोई ठोस आधार या सबूत प्रदान नहीं करती है जिससे यह साबित हो सके कि प्रतिवादी पत्नी ने परिवार न्यायालय के समक्ष कोई झूठा बयान दिया था. कोर्ट ने कहा कि किसी जानकारी को छिपाना (Suppression) झूठा बयान देना नहीं कहा जा सकता और न ही इसे ऐसा माना जाना चाहिए.

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