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'गौहत्या कोई आम हिंसक अपराध नहीं'... शामली मामले में NSA पर इलाहाबाद HC ने ऐसा क्यों कहा?

UP News: याचिकाकर्ता की इस दलील को कोर्ट  ने अस्वीकार कर दिया कि यह एक सामान्य आपराधिक कृत्य था. कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए माना कि जिला मजिस्ट्रेट द्वारा NSA के तहत हिरासत का आदेश परिस्थितियों के अनुरूप और विधिसम्मत है.

'गौहत्या कोई आम हिंसक अपराध नहीं'... शामली मामले में NSA पर इलाहाबाद HC ने ऐसा क्यों कहा?
गौहत्या के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी.
  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गौहत्या मामले में NSA के तहत हिरासत को लेकर याचिका पर तल्ख टिप्पणी की है
  • कोर्ट ने कहा कि समाज में धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचने के कारण बड़े पैमाने पर हिंसा फैलने का खतरा रहता है
  • शामली जिले में गोवंश के अवशेष मिलने के बाद सांप्रदायिक तनाव और अशांति फैलने पर NSA के तहत हिरासत जारी की गई थी
लखनऊ:

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गौहत्या के मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत एक व्यक्ति की हिरासत को लेकर दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए तल्ख टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि कुछ मुद्दे ऐसे है जिनके बारे में समाज इतना संवेदनशील है कि अगर ये सामने आते है तो समाज में बड़े पैमाने पर असर पड़ने की गुंजाइश है,जिससे जिंदगी की रफ़्तार पर असर पड़ सकता है. उनमें से एक है गौहत्या. जब भी गौहत्या की खबर मिलती है या उसका पता चलता है तो समाज के एक बड़े हिस्से की धार्मिक मान्यताओं को साफ तौर पर चोट पहुंचाने के लिए अचानक बहुत ज़्यादा भावनाएं और हिंसक प्रतिक्रिया पैदा होती है.

समाज पर बड़े पैमाने पर होता है गौहत्या का असर

 कोर्ट ने माना है कि गौहत्या का समाज पर तुरंत और बड़े पैमाने पर असर पड़ता है, जिससे लगभग हमेशा बड़े पैमाने पर हिंसा होती है. जो एक शांत समाज पर भारी पड़ती है और ज़िंदगी अस्त-व्यस्त कर देती है. यह टिप्पणी जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस संजीव कुमार की डिविजन बेंच ने शामली निवासी समीर व अन्य की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को खारिज करते हुए की और कोर्ट ने उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत को बरकरार रखा. 

दरअसल याचिकाकर्ता समीर ने हेबियस कॉर्पस याचिका अपने पिता शमशाद के ज़रिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में दायर की थी. यह याचिका नेशनल सिक्योरिटी एक्ट, 1980 की धारा 3(3) के तहत शामली के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के 15 मई 2025 के आदेश के ज़रिए उसकी हिरासत के खिलाफ दाखिल की गई थी.  जिसे सरकार ने एक्ट की धारा 12(1) के तहत 12 जून 2025 के आदेश के ज़रिए कन्फर्म किया था.

गोवंश के अवशेष मिलने से फैला सांप्रदायिक तनाव

 मामला मार्च 2025 का है, जब शामली जिले के झिंझाना क्षेत्र में गोवंश के अवशेष मिलने के बाद सांप्रदायिक तनाव फैल गया था. मामले में एफआईआर दर्ज हुई. FIR में कहा गया था कि होली आस-पास थी और इस घटना से हिंदू आबादी में अशांति फैल गई थी, जिससे शांति बनाए रखने के लिए फोर्स की ज़रूरत पड़ी. FIR में यह भी कहा गया कि मौके पर ही रिकवरी का एक मेमो तैयार किया गया था और पुलिस पार्टी के सदस्यों ने उस पर साइन किए थे. असल में गाय के गोवंश के बचे हुए हिस्सों की रिकवरी से जुड़ा यही मेमो FIR के तौर पर दर्ज किया गया था जिससे यह क्राइम हुआ.

विरोध प्रदर्शन और चक्काजाम की वजह से जनजीवन बाधित हुआ था. स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस बल तैनात करना पड़ा था. जांच के दौरान समीर और उसके सहयोगियों की कथित संलिप्तता सामने आई, जिसके बाद जिला प्रशासन ने संभावित खतरे को देखते हुए NSA के तहत हिरासत का आदेश जारी किया. याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में कहा कि डिटेंशन ऑर्डर के सपोर्ट में डिटेंशन के आधार यह दिखाते हैं कि याचिकाकर्ता को NSA की धारा 3(3) के तहत अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए डिटेनिंग अथॉरिटी ने बिना सोचे-समझे डिटेन किया है.

गौहत्या कोई आम हिंसक अपराध नहीं

याचिकाकर्ता पर आरोप लगाया गया कि यह एक छोटा-मोटा अपराध है. जिस पर मजिस्ट्रेट ट्रायल कर सकता है. अगर यह साबित भी हो जाता है कि उसने यह अपराध किया है तो यह कानून और व्यवस्था का उल्लंघन से ज़्यादा कुछ नहीं होगा. कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि जब भी गौहत्या की खबर मिलती है या उसका पता चलता है तो समाज के एक बड़े हिस्से की धार्मिक मान्यताओं को साफ तौर पर चोट पहुंचाने के लिए अचानक बहुत ज़्यादा भावनाएं और हिंसक प्रतिक्रिया पैदा होती है. कोर्ट ने कहा कि यह ध्यान में रखना होगा कि याचिकाकर्ता ने जो अपराध किया वह कोई आम हिंसक अपराध नहीं था जिससे किसी एक इंसान या उनके ग्रुप की ज़िंदगी पर असर पड़ा हो और उसे समाज की स्थिर ज़िंदगी की कोई परवाह न हो जो उसके कामों से बिना किसी रुकावट के चलती रहे.

उसने ऐसा काम किया था जिससे उस इलाके की आबादी के एक बड़े हिस्से में गुस्सा फैल गया और उनकी धार्मिक भावनाएं आहत हुईं. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “कानून-व्यवस्था” और “सार्वजनिक व्यवस्था” के बीच अंतर घटना के प्रभाव की व्यापकता और गंभीरता से निर्धारित होता है. याचिकाकर्ता की इस दलील को कोर्ट  ने अस्वीकार कर दिया कि यह एक सामान्य आपराधिक कृत्य था. कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए माना कि जिला मजिस्ट्रेट द्वारा NSA के तहत हिरासत का आदेश परिस्थितियों के अनुरूप और विधिसम्मत है.

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