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लोन का पेपर साइन करने से पहले KFS में जरूर देखें ये 4 बातें, तो नहीं चलेगी बैंक की चालाकी

बैंक या किसी लोन ऐप से लोन लेने से पहले दस्तावेज साइन करने की जल्दबाजी न करें. जानिए KFS क्या है और लोन लेने से पहले इसमें किन बातों को जांचना बेहद जरूरी है.

लोन का पेपर साइन करने से पहले KFS में जरूर देखें ये 4 बातें, तो नहीं चलेगी बैंक की चालाकी
बिना KFS देखे साइन न करें लोन पेपर्स, वरना होगा भारी नुकसान !
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  • RBI ने वित्तीय धोखाधड़ी से बचाने के लिए लोन लेने से पहले Key Facts Statement देना अनिवार्य किया है.
  • Key Facts Statement में ईएमआई, ब्याज दर, प्रोसेसिंग फीस और छिपे हुए खर्चों की पारदर्शी जानकारी होती है.
  • KFS एक संक्षिप्त दस्तावेज़ है जो लोन की पूरी समय सारणी और वार्षिक प्रतिशत दर सरल भाषा में बताता है.

Loan Rules Update : वित्तीय जरूरतों के लिए लोन लेना अब कुछ ही मिनटों का काम हो गया है. डिजिटल लेंडिंग ऐप और बैंकों की त्वरित प्रक्रिया की वजह से लोग अक्सर जल्दबाजी में बिना नियम पढ़े एग्रीमेंट पर साइन कर देते हैं, लेकिन बाद में प्रोसेसिंग फीस, प्रीपेमेंट पेनल्टी या हिडन चार्जेस के नाम पर भारी रकम वसूल की जाती है.

इसी वित्तीय धोखाधड़ी और गैरजरूरी खर्चों से ग्राहकों को बचाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने Key Facts Statement (KFS) को अनिवार्य बनाया है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नए दिशानिर्देशों के मुताबिक, लोन स्वीकृत करने से पहले ग्राहकों को Key Facts Statement (KFS) देना जरूरी है. दरअसल, इसमें ईएमआई (EMI), ब्याज दर, प्रोसेसिंग फीस और छिपे हुए खर्चों की पारदर्शी जानकारी होती है. लिहाजा, लोन के पेपर पर साइन करने से पहले  KFS को अच्छे से पढ़ने से बैंकों या वित्तीय संस्थानों के छुपे हुए नियमों को समझकर हजारों रुपये की बचत की जा सकती है. 

KFS क्या है और यह क्यों जरूरी है?

KFS यानी की फैक्ट्स स्टेटमेंट एक सरल और संक्षिप्त दस्तावेज़ होता है, जिसे बैंक या एनबीएफसी (NBFC) लोन देने से पहले ग्राहक को उपलब्ध कराते हैं. इसका मुख्य उद्देश्य लोन से जुड़ी तमाम जटिल और तकनीकी शर्तों को आसान भाषा में ग्राहक के सामने रखना होता है. KFS में लोन की राशि, ब्याज दर, वार्षिक प्रतिशत दर (APR) और भुगतान की पूरी समय सारणी स्पष्ट रूप से दर्ज होती है, जिससे लोन एग्रीमेंट के बारीक अक्षरों में छिपे किसी भी अतिरिक्त शुल्क को उजागर करता है.

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KFS में इन 4 मुख्य बातों की जांच करना सबसे जरूरी है

  • वार्षिक प्रतिशत दर: यह आपके लोन की वास्तविक कुल लागत दर्शाती है. इसमें न केवल मूल ब्याज दर, बल्कि प्रोसेसिंग फीस, डॉक्युमेंटेशन चार्ज और अन्य सभी प्रशासनिक खर्च शामिल होते हैं.
  • ईएमआई और पुनर्भुगतान की समय सारणी: इसमें यह स्पष्ट होना चाहिए कि हर महीने कितनी किस्त देनी होगी और कुल कितनी किस्तें बनेंगी.
  • पेनल्टी और लेट फीस: यदि किसी महीने ईएमआई में देरी होती है, तो कितना जुर्माना लगेगा और क्या लोन का प्रीपेमेंट (समय से पहले बंद) करने पर कोई चार्ज देना होगा, इसकी जांच कर लें.
  • कूलिंग ऑफ या लुकअप पीरियड: RBI नियमों के मुताबिक, डिजिटल लोन के मामले में ग्राहकों को एक कूलिंग ऑफ पीरियड मिलता है. अगर लोन लेने के तुरंत बाद आप अपना इरादा बदलते हैं, तो बिना किसी भारी जुर्माने के लोन वापस किया जा सकता है.

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