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"ईस्ट इंडिया कंपनी जैसा साम्राज्य खड़ा कर रहे हैं AI दिग्गज", मशहूर इतिहासकार की चेतावनी!

इतिहासकार William Dalrymple ने चेतावनी दी है कि आज की बड़ी अमेरिकी Tech और AI कंपनियां ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह ही बेहद शक्तिशाली 'कंपनी-राज्य' बनती जा रही हैं.

"ईस्ट इंडिया कंपनी जैसा साम्राज्य खड़ा कर रहे हैं AI दिग्गज", मशहूर इतिहासकार की चेतावनी!
William Dalrymple की फाइल फोटो

AI पर अभी काफी बहस चल रही है. AI के खतरनाक हो जाने से लेकर इसको स्लो डाउन तक करने की बात टेक दिग्गज कर रहे हैं. लेकिन, AI कंपनियां अनकंट्रोल्ड पावर यानी अनियंत्रित शक्ति का एक ऐसा साम्राज्य खड़ा कर रही हैं जो 17वीं सदी की ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की याद दिलाता है.

ये बात हम नहीं कर रहे हैं. इसके बारे में प्रसिद्ध इतिहासकार William Dalrymple ने द न्यूयॉर्क टाइम्स में एक लेख लिख कर चेतावनी दी है. उनका कहना है कि ईस्ट इंडिया कंपनी वही व्यापारिक फर्म थी जिसने आगे चलकर भारत के एक बहुत बड़े हिस्से पर एक निजी और विशुद्ध रूप से मुनाफा कमाने वाली संप्रभु शक्ति के रूप में राज किया था. 

ईस्ट इंडिया कंपनी पर चार ऐतिहासिक किताबें लिख चुके डेलरिम्पल का तर्क है कि उस पुराने कॉर्पोरेट साम्राज्य और आज के टेक दिग्गजों के बीच की समानताएं इतनी अधिक हैं कि उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.

ईस्ट इंडिया कंपनी कैसे बनी 'कंपनी स्टेट'?

डेलरिम्पल अपने इस लेख में बताते हैं कि साल 1600 में एक व्यापारिक कंपनी के रूप में शुरू हुई ईस्ट इंडिया कंपनी आगे चलकर एक व्यापारिक उद्यम से कहीं ऊपर उठकर एक 'कंपनी-स्टेट' में बदल गई. यानी एक ऐसा कॉर्पोरेशन जो खुद एक संप्रभु शक्ति के रूप में काम करता था और केवल अपने शेयरधारकों के प्रति जवाबदेह था. 

अपने चरम पर, इस कंपनी के पास अपने खुद के सिक्के ढालने, टैक्स वसूलने, अदालतें चलाने और लगभग 2,600,000 (2.6 लाख) सैनिकों की एक बड़ी प्राइवेट सेना रखने का अधिकार था. ये सेना उस समय खुद ब्रिटेन की अपनी सेना के साइज से लगभग दोगुनी थी. वे सैनिक ब्रिटिश साम्राज्य या राजा के प्रति नहीं, बल्कि सीधे उस प्राइवेट कंपनी के प्रति वफादारी की शपथ लेते थे.बंगाल पर कंपनी का यह शासन वहां के आम लोगों के लिए बेहद विनाशकारी साबित हुआ. साल 1765 में बंगाल से टैक्स वसूलने का अधिकार हासिल करने के बाद, कंपनी ने 1769–70 में आए भीषण अकाल के दौरान भी टैक्स दरों को और बढ़ा दिया. ये एक ऐसी आपदा थी जिसमें कम से कम 10 लाख और कुछ अनुमानों के अनुसार लगभग 1 करोड़ लोगों की भूख से मौत हो गई थी.

ब्रिटेन के अपने राजनीतिक संस्थानों पर भी कंपनी का पूरा कब्जा था. 1770 के दशक तक, ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स के लगभग एक-चौथाई सदस्यों के पास या तो कंपनी के शेयर थे या वे कंपनी से वेतन पाते थे. विधायी प्रभाव के इसी रसूख के कारण ये कंपनी पीढ़ियों तक बिना किसी जवाबदेही के मनमर्जी से काम करती रही.

इस बेलगाम कॉर्पोरेट शक्ति को वापस सरकार के कंट्रोल में लाने में दशकों की राजनीतिक इच्छाशक्ति लग गई. डेलरिम्पल इशारा करते हैं 13 फरवरी 1788 की उस तारीख की ओर, जब ब्रिटिश संसद के बाहर भारी भीड़ इस बात की गवाह बनने के लिए जुटी थी कि हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने बंगाल के गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू की थी.

ये एक ऐसा ऐतिहासिक पल था जब ब्रिटिश सरकार आखिरकार अपने दौर के सबसे बड़े कॉर्पोरेट एकाधिकारवादी के खिलाफ खड़ी हुई थी. हालांकि, कंपनी के इस साम्राज्य को पूरी तरह से केवल 1857 के भारतीय विद्रोह के बाद ही तोड़ा जा सका, जब ब्रिटिश सरकार ने इसके सभी क्षेत्रों, सेना और प्रशासन का सीधे राष्ट्रीयकरण कर दिया.

आज के टेक जायंट: नए तरीके के कंपनी स्टटे?

डेलरिम्पल साफ करते हैं कि आज की कोई भी AI कंपनी ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह अपनी खुद की कोई निजी सेना नहीं रखती है. यूक्रेन जैसे आधुनिक युद्धों में ड्रोन्स के बढ़ते दबदबे को देखते हुए वे कहते हैं कि शायद आज के दौर में उन्हें इसकी जरूरत भी नहीं है. लेकिन उनका तर्क है कि ये टेक इंडस्ट्री खुद को अमेरिकी सेना और राजनीतिक ढांचे के भीतर कुछ उसी तरह से स्थापित कर रही है जैसा कभी ईस्ट इंडिया कंपनी ने किया था.

वे डिफेंस फील्ड की कंपनी Anduril Industries के साथ OpenAI की पार्टनरशिप का उदाहरण देते हैं. जिसका उद्देश्य दुश्मन के ड्रोन्स का मुकाबला करना है, साथ ही पिछले साल पेंटागन से मिला 200 मिलियन डॉलर का कॉन्ट्रैक्ट भी इसका प्रमाण है.  वे जून 2025 के उस प्रतीकात्मक पल का भी जिक्र करते हैं, जब अमेरिकी सेना ने Palantir और Meta के CTOs और OpenAI के CPO को सेना की एक नई रिजर्व यूनिट में सीधे 'लेफ्टिनेंट कर्नल' की मानद रैंक दी.ये निजी टेक अधिकारियों और सैन्य रैंकों के बीच की सीमाओं को धुंधला करने वाला एक ऐसा कदम था जिसका आधुनिक इतिहास में कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता.

राजनीतिक प्रभाव के मोर्चे पर, डेलरिम्पल खोजी पत्रकार डेविड मूर की द नेशन में छपी एक रिपोर्ट का हवाला देते हैं. जिसमें बताया गया है कि क्रिप्टोकरेंसी, AI और अन्य बड़े दानवीर सपोर्टेड Super PACs 2026 के मध्यावधि चुनावों में सबसे ज्यादा खर्च करने वालों में शामिल थे. फेडरल इलेक्शन कमीशन के रिकॉर्ड के अनुसार, इन्होंने चुनावी विज्ञापनों और राजनीतिक खर्चों में कुल मिलाकर 180 मिलियन डॉलर से अधिक बहाए.

डेलरिम्पल न्यूयॉर्क के मेयर पद के प्राइमरी चुनावों में हाल ही में हुए एक विवाद का भी जिक्र करते हैं, जिसे वे सार्वजनिक रूप से सामने आई AI इंडस्ट्री की सत्ता की जंग बताते हैं. चुनाव जीतने वाले उम्मीदवार को न्यूयॉर्क के पूर्व मेयर और ब्लूमबर्ग एलपी के संस्थापक माइकल ब्लूमबर्ग का समर्थन प्राप्त था. उस उम्मीदवार ने राज्य की विधानसभा में एक AI सेफ्टी बिल का को-स्पांसर किया था. जिसका AI इंडस्ट्री ने कड़ा विरोध किया था. 

डेलरिम्पल इस चुनाव परिणाम को AI इंडस्ट्री के लिए एक मिला-जुला नतीजा बताते हैं. लेकिन यह पूरी दुनिया को एक साफ संदेश देता है कि आज की टेक इंडस्ट्री उन राजनेताओं के खिलाफ भारी-भरकम पैसा खर्च करने के लिए पूरी तरह तैयार है जिन्हें वे अपने हितों के खिलाफ मानते हैं.

दिखाना होगा राजनीतिक साहस  

डेलरिम्पल का मुख्य तर्क यही है कि इस मजबूत कॉर्पोरेट एकाधिकार को नियंत्रित करने के लिए जरूरी हथियार जैसे एंटी-ट्रस्ट कानून, मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और सख्त सरकारी नियम आज भी पूरी तरह से मौजूद हैं. ये बिल्कुल वैसे ही हैं जैसे वे 18वीं सदी के ब्रिटेन में मौजूद थे. लेकिन कमी केवल इतनी है कि आज की सरकारों के पास इनका उपयोग करने के लिए जरूरी राजनीतिक साहस दिखाई नहीं दे रहा है.

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