अक्सर कंपनियां AI के आते ही काम में तेजी की बातें करने लगती हैं. कई काम जैसे रिपोर्ट्स जल्दी तैयार होना, कोडिंग फटाफट हो जाना को तेजी से किया जा सकता है. मगर Anthropic की इंडिया मैनेजिंग डायरेक्टर Irina Ghose का सोचना थोड़ा अलग है. उनके मुताबिक, काम में तेजी लाना तो सिर्फ आधी कहानी है.
मुंबई में आयोजित ग्लोबल फिनटेक फेस्ट के दौरान NDTV Profit से खास बातचीत में इरीना ने कहा कि बिजनेस घरानों को सिर्फ इस बात से खुश नहीं होना चाहिए कि AI उनका काम कितना तेज कर रहा है. असली सवाल ये है कि AI जो समय बचा रहा है, कंपनियां उसका उपयोग किस नए काम में कर रही हैं. इरीना ने साफ शब्दों में कहा, "AI से जो समय बचता है, असल में वह आपको नए इनोवेशन और क्रिएटिव आइडियाज पर काम करने का मौका देता है."
AI से काम में मदद लेकिन ट्रैकिंग जरूरी
इरीना के अनुसार, जो कंपनियां इस समय AI का सबसे बेहतरीन इस्तेमाल कर रही हैं, वे सिर्फ एक आंकड़े पर नजर नहीं रखतीं. वे दो चीजों को ट्रैक करती हैं. पहली बात ये कि रोजाना के काम में AI से कितनी मदद मिल रही है. दूसरी बात ये कि उस बचे हुए समय और ऊर्जा को कंपनी के बड़े टारगेट की तरफ कैसे मोड़ा जा रहा है.
उन्होंने सुझाव दिया कि कंपनियों को अपने सबसे बड़े प्रोजेक्ट्स तय करने चाहिए और देखना चाहिए कि वहां कितनी प्रगति हो रही है. अभी हर कंपनी इस स्तर पर नहीं पहुंची है. कुछ कंपनियां AI को पूरी तरह अपना चुकी हैं. वहीं, कुछ अभी भी इसे समझने और सही समय का इंतजार करने में लगी हैं. जो लोग इसका इस्तेमाल कर रहे हैं, उनके लिए काम की स्पीड बढ़ना सबसे आसान पैमाना बन गया है.
मगर इरीना मानती हैं कि ज्यादातर लोग यहीं आकर रुक जाते हैं. वह सवाल उठाती हैं, "क्या आप वाकई इस बात को माप रहे हैं कि इस तकनीक से आपके काम में नयापन (इनोवेशन) कितना आया?" इसी बात को आगे बढ़ाते हुए न्यू स्ट्रीट टेक्नोलॉजीज के चीफ बिजनेस ऑफिसर श्रीश आनंद लाल ने एनडीटीवी से कहा, "काम की स्पीड बढ़ाने की भी एक लिमिट होती है. आप किसी पुराने तरीके को एक सीमा तक ही तेज कर सकते हैं. असली बदलाव तब आएगा जब कंपनियां AI का इस्तेमाल सिर्फ काम में मदद के लिए नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम को नए सिरे से डिजाइन करने के लिए करेंगी. तब AI सिर्फ खर्च का जरिया नहीं रहेगा, बल्कि उससे पूरा बिजनेस मॉडल ही बदल जाएगा."
"आखिर में सिर्फ नतीजे मायने रखते हैं"
इरीना ने उस बदलाव का भी जिक्र किया जो इस समय दफ्तरों के भीतर चुपचाप चल रहा है. वह ये कि AI अब बैकग्राउंड में गायब होता जा रहा है. उन्होंने कहा, "जब तक आप AI को अपने से अलग कोई चीज समझते रहेंगे, तब तक उसे अपनाने में थोड़ी हिचक और परेशानी बनी रहेगी."
उन्होंने एक सीधा सा उदाहरण दिया. अगर कोई व्यक्ति महीने के आखिर में कंपनी के अकाउंट्स का मिलान कर रहा है, तो उसे ये देखने की जरूरत नहीं है कि AI कैसे काम कर रहा है. उसे बस फाइनल रिपोर्ट से मतलब है, जिसके पीछे की सारी जांच AI पहले ही कर चुका है. एक डेटा एनालिस्ट के लिए भी यही बात लागू होती है. उसका ध्यान इस बात पर होता है कि डेटा से क्या नतीजा निकला, न कि इस बात पर कि उस प्रेजेंटेशन को बनाने में AI ने क्या-क्या कदम उठाए. इरीना कहती हैं, "आखिर में सिर्फ नतीजे मायने रखते हैं."
अच्छा AI मॉडल कामयाबी की गांरटी नहीं
इरीना ने यह भी साफ किया कि सिर्फ एक अच्छा AI मॉडल आ जाने से कामयाबी की गारंटी नहीं मिल जाती. कोई कंपनी उस मॉडल के इर्द-गिर्द क्या तैयार करती है, वह ज्यादा महत्वपूर्ण है. उन्होंने कहा, "मॉडल गेम चेंजर जरूर है, लेकिन उस मॉडल का इस्तेमाल करके नया प्रोडक्ट बनाने वाले डेवलपर की क्षमता ही बाजार की असली दिशा तय करती है." उन्होंने भारत के कुछ उदाहरण भी दिए. उन्होंने बताया कि कॉग्निजेंट ने अपने 3.5 लाख कर्मचारियों के लिए AI टूल पेश किए हैं. एक्सिस बैंक इसका इस्तेमाल इंजीनियरिंग के कामों में कर रहा है और इंडसइंड बैंक इस बात की संभावनाएं तलाश रहा है कि इससे कामकाज के पूरे तरीके को कैसे बदला जाए.
इरीना के मुताबिक, AI उन जगहों पर बहुत कारगर साबित होता है जहां कंपनियां पुराने और उलझे हुए सिस्टम्स से परेशान हैं, जो आपस में ठीक से कनेक्ट नहीं हो पाते. इंग्राम माइक्रो इंडिया के मार्केटिंग डायरेक्टर अंकेश कुमार ने एनडीटीवी को बताया, "AI का असर सिर्फ काम को आसान बनाने तक सीमित नहीं रहेगा. शुरुआत में भले ही कंपनियां इसे प्रोडक्टिविटी बढ़ाने के लिए अपना रही हों, लेकिन आगे चलकर यह पूरे बिजनेस मॉडल, कस्टमर एक्सपीरियंस और फैसले लेने के तरीके को पूरी तरह बदल देगा."
भारतीय बाजार है बड़ी चुनौती
भारत जैसा बड़ा बाजार किसी भी तकनीक के लिए आसान नहीं है. यहां एक अरब से ज्यादा की आबादी है, सैकड़ों भाषाएं हैं और शहरों व गांवों के बीच बहुत बड़ा अंतर है. इरीना मानती हैं कि यही वह चुनौती है जहां एआई अपनी असली ताकत साबित कर सकता है. उन्होंने बताया कि एंथ्रोपिक इस समय भारत की 10 से अधिक प्रमुख भाषाओं में AI की परफॉर्मेंस को बेहतर बनाने पर काम कर रही है. मकसद यही है कि ये तकनीक सिर्फ अंग्रेजी या बड़े शहरों तक ही सीमित न रहे.
उन्होंने खेती-किसानी, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्किल डेवलपमेंट जैसे क्षेत्रों का जिक्र करते हुए कहा कि इन जगहों पर AI बड़ा बदलाव ला सकता है. उन्होंने कहा, "असली फर्क तब पड़ता है जब आप इतनी बड़ी आबादी की समस्याओं को सुलझाने के लिए तकनीक को आखिरी छोर पर बैठे व्यक्ति तक पहुंचा देते हैं." इसके अलावा उन्होंने डेटा को स्थानीय स्तर पर स्टोर और प्रोसेस करने के बुनियादी ढांचे पर चल रहे काम का भी जिक्र किया. उनके अनुसार, इस बुनियादी ढांचे का भारत के पास होना यहां के पूरे टेक इकोसिस्टम के लिए नए रास्ते खोलेगा.
टॉप से होनी चाहिए शुरुआत
AI को लेकर जो कंपनियां अभी भी असमंजस में हैं, उनके लिए इरीना की सलाह है कि लीडरशिप को खुद आगे आकर रास्ता दिखाना होगा. उनका कहना है कि बड़े अधिकारियों को सिर्फ बजट पास करने के बजाय खुद इन टूल्स का इस्तेमाल करना चाहिए. साथ ही उन्हें ये सोचने से शुरुआत करनी चाहिए कि वे क्या नतीजा चाहते हैं, न कि सिर्फ AI के फीचर्स की लिस्ट देखने में समय गंवाना चाहिए.
इरीना ने कहा, "सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग यह नहीं पूछ रहे कि AI क्या कर सकता है, बल्कि उन्हें ये सोचना चाहिए कि एक बेहतर रिजल्ट कैसा दिखेगा." जब किसी कंपनी को अपना लक्ष्य साफ पता होता है, तो वहां AI का इस्तेमाल ज्यादा सटीक और असरदार हो जाता है. उनका मानना है कि इसी तरह काम करने का पूरा कल्चर बदलेगा.
इस मुद्दे को समझाते हुए एक्रो निस (Acronis) के जनरल मैनेजर राजेश छाबड़ा ने एनडीटीवी से कहा, "अब सवाल ये नहीं है कि कर्मचारियों के काम को कितना तेज किया जाए. असल बात यह है कि AI की मदद से जो समय और अतिरिक्त क्षमता बचेगी, उसका इस्तेमाल कंपनियां आगे किस नए काम को करने में करेंगी?"
उन्होंने आगे कहा, "उदाहरण के लिए, जब ग्राहकों के आम सवालों का जवाब AI खुद देने लगेगा, तो कर्मचारी अपना समय मुश्किल समस्याओं को सुलझाने और कस्टमर एक्सपीरियंस को बेहतर बनाने में लगा सकेंगे. इसी तरह जब डेवलपर्स को कोडिंग में AI की मदद मिलेगी, तो वे बिल्कुल नए और अनोखे प्रोडक्ट्स बनाने पर अपना ध्यान केंद्रित कर पाएंगे."
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