इन खेलों को हम किस नजरिए से देखें? क्या ये सफल रहे, असफल रहे या मिला-जुला अनुभव रहा? ज्यादातर लोग इसे मिला-जुला अनुभव कहेंगे, लेकिन LA28 के नजरिए से देखें तो असल में भारत के लिए ये हांगझोऊ से बेहतर प्रदर्शन रहा. हांगझोऊ में, भारत ने उन ओलंपिक खेलों और इवेंट्स में 12 गोल्ड मेडल जीते जो पेरिस 2024 प्रोग्राम का हिस्सा थे. नागोया में यह संख्या बढ़कर 17 हो गई है. इसे सही संदर्भ में समझने के लिए देखें तो, हांगझोऊ में भारत ने शूटिंग में ज्यादा गोल्ड मेडल जीते थे. हालांकि, उनमें से कई मेडल टीम इवेंट्स में मिले थे जो ओलंपिक खेलों का हिस्सा नहीं हैं. चूंकि वे इवेंट्स ओलंपिक का हिस्सा नहीं हैं, इसलिए उन्होंने पेरिस 2024 के लिए भारत की संभावनाओं को मजबूत करने में कोई खास मदद नहीं की.
एथलेटिक्स में भी ऐसा ही उदाहरण देखने को मिलता है. भारत ने हांगझोऊ में कई गोल्ड मेडल जीते, लेकिन उन चैंपियंस में से सिर्फ़ नीरज चोपड़ा में ही असल में पेरिस में मेडल जीतने की क्षमता थी. बाकी खिलाड़ी असल में ओलंपिक मेडल के दावेदार नहीं थे. नागोया में यह स्थिति बदल गई है.
भारत के गोल्ड मेडल जीतने वालों में से लगभग सभी - महिलाओं की 4x400 मीटर रिले टीम को छोड़कर - अगर अपनी क्षमता के अनुसार प्रदर्शन करें और लगातार सुधार करते रहें, तो LA28 में मेडल जीतने की असल उम्मीद रखते हैं. चाहे वह रेसलिंग में सुजीत और अमन हों, कोरिया को हराने वाली कुमकुम और रिकर्व टीम हो, या गोल्ड जीतने वाली चिकिता और कंपाउंड टीम हो - हर मेडल एक सच्ची उम्मीद जगाता है.
बॉक्सिंग में, तीनों गोल्ड मेडल विजेताओं ने गोल्ड मेडल के रास्ते में वर्ल्ड या एशियन चैंपियंस को हराया. लवलीना ने सेमीफाइनल में मौजूदा वर्ल्ड चैंपियन और फाइनल में मौजूदा एशियन चैंपियन को हराया. परवीन ने सेमीफाइनल में ज़्यादा मज़बूत मानी जाने वाली प्रतिद्वंद्वी को हराया, जबकि अंकुश ने अपने सेमीफाइनल के शुरुआती राउंड में पिछड़ने के बाद शानदार वापसी करते हुए एक बहुत मुश्किल मुकाबला जीता.
शूटिंग में, सुरुचि और कमलजीत चीन के वर्ल्ड रिकॉर्ड की बराबरी करने के करीब पहुंच गईं और इस दौरान एशियन रिकॉर्ड भी तोड़ दिया. सुरुचि का 245 का स्कोर असल में 244 (488 का 50 प्रतिशत) के प्रभावी वर्ल्ड-रिकॉर्ड बेंचमार्क से बेहतर था. ईशा, जिन्होंने पांच शूट-ऑफ के मैराथन दौर के दौरान बुखार और थकान का सामना किया, ने दिखाया कि वह अपनी कैटेगरी में वर्ल्ड नंबर 1 क्यों हैं. नीरू का प्रदर्शन भी असाधारण रहा और उन्होंने LA साइकिल के लिए सच्ची उम्मीदें जगाई हैं.
अगले महीने दोहा में होने वाली वर्ल्ड चैंपियनशिप में, जहां ओलंपिक कोटा स्थान दांव पर होंगे, उम्मीद है कि भारतीय शूटर्स का प्रदर्शन बहुत प्रभावशाली रहेगा.
आखिर में, महिला हॉकी में, भारत इस समय सबसे मज़बूत टीम लग रही है. नीदरलैंड्स और शायद अर्जेंटीना को छोड़कर, बहुत कम टीमें लगातार भारत के डिफेंस को भेद सकती हैं. अब जब क्वालिफिकेशन पक्का हो गया है, तो हेड कोच स्योर्ड मारिज्ने के पास अटैक को बेहतर बनाने के लिए काफी समय है. अगर सब कुछ योजना के अनुसार हुआ, तो लॉस एंजिल्स में भारतीय महिला टीम को पोडियम पर देखना कोई हैरानी की बात नहीं होगी.
अगर भारत स्पोर्ट्स साइंस, हाई-परफॉर्मेंस प्रोग्राम और मेंटल कंडीशनिंग के जरिए तेजी से अपना ध्यान ओलंपिक साइकल पर केंद्रित करता है, तो कोई वजह नहीं है कि LA28 भारतीय खेलों के लिए पेरिस 2024 से बेहतर गेम्स न हो. इसके सभी संकेत मौजूद हैं. ओलंपिक के नजरिए से देखें तो, असल में नागोया भारत के लिए हांगझोऊ से बेहतर गेम्स साबित हो सकता है.
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