मनीषा भनवाला ने शुक्रवार को इतिहास रच दिया है. वह कुश्ती विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बन गईं है. सुशील कुमार, जिन्होंने 2010 में पुरुषों के 66 किग्रा वर्ग में खिताब जीता था, उनके बाद वह ऐसा करने वाली देश की दूसरी पहलवान हैं. मनीषा ने फाइनल में अमेरिकी पहलवान एबिगेल नेट को 8-6 से हराया. एक समय वह पीछे चल रही थीं, लेकिन शानदार वापसी करते हुए उन्होंने जीत हासिल की.
मनीषा 0-6 से पीछे थीं, लेकिन उन्होंने गजब का जज्बा दिखाया और पैन अमेरिकन चैंपियन को हराकर कुश्ती में भारत के लिए पहली महिला विश्व चैंपियन बनने का सपना सच कर दिया. उनकी यह जीत भारतीय महिला कुश्ती के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि रही. विश्व चैंपियनशिप के इस संस्करण में पहली बार तीन भारतीय महिलाएं स्वर्ण पदक के मुकाबले तक पहुंचीं.
गुरुवार को नीलम सिरोही (50 किग्रा) और काजल ढोचक (76 किग्रा) अपने-अपने फाइनल मुकाबले हार गईं और उन्हें रजत पदक से संतोष करना पड़ा, जबकि तन्मू शर्मा ने कांस्य पदक जीता. मनीषा ने कजाकिस्तान की अल्तिन शागायेवा के खिलाफ सेमीफाइनल में शानदार प्रदर्शन करते हुए फाइनल में जगह बनाई थी.
कौन हैं मनीषा भनवाला
29 साल की भनवाला एक अनुभवी खिलाड़ी हैं और पिछले एक दशक से इस खेल से जुड़ी हुई हैं. वह हरियाणा के जींद जिले के सिवाहा गंवा की रहने वाली हैं. मनीषा रोहतक के छोटू राम अखाड़े में ट्रेनिंग लेती हैं और फिलहाल उन्हें 'इंस्पायर इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स' से भी सहयोग मिल रहा है.
कुश्ती में उनका सफर 2013 में शुरू हुआ था. उनके पिता सुरेश ने इसमें अहम भूमिका निभाई. दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने शुरुआत में यह खेल अपनी फिटनेस सुधारने और वजन कम करने के मकसद से चुना था. बाद में, उनके बड़े भाई रिंकू, जो खुद एक पूर्व कबड्डी खिलाड़ी हैं, ने उन्हें 'सर छोटू राम अकादमी' में दाखिला दिला दिया.
2016 में उन्होंने पेशेवर खेलों में अपनी छाप छोड़ी, जब उन्होंने 'कैडेट वर्ल्ड चैंपियनशिप' और 'दक्षिण एशियाई खेलों' (साउथ एशियन गेम्स) में स्वर्ण पदक जीता. इसके बाद, उन्होंने 'कॉमनवेल्थ कुश्ती चैंपियनशिप' में कांस्य पदक जीता और अगले साल उसी प्रतियोगिता में रजत पदक हासिल किया.
इस कामयाबी की बदौलत उन्हें पैरामिलिट्री में नौकरी मिल गई, और उन्होंने 2018 के 'वर्ल्ड मिलिट्री गेम्स' में स्वर्ण पदक भी जीता. हालांकि, कोविड-19 महामारी के दौरान अपने पिता से चर्चा करने के बाद उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी, क्योंकि उन्हें वहां ट्रेनिंग के लिए पर्याप्त मौके नहीं मिल पा रहे थे.
साल 2022 में मनीषा ने तब सबका ध्यान अपनी ओर खींचा, जब उन्होंने 2016 रियो डी जनेरियो ओलंपिक की कांस्य पदक विजेता साक्षी मलिक को तीन बार हराया. इनमें से एक जीत 2022 के 'नेशनल गेम्स' में मिली, जहां उन्होंने स्वर्ण पदक जीता. एक साल बाद, उन्होंने अपने इस खिताब का सफलतापूर्वक बचाव किया.
तब से, उन्होंने महाद्वीपीय स्तर (कॉन्टिनेंटल लेवल) पर भी शानदार प्रदर्शन किया है. उन्होंने तीन कांस्य पदक (2022, 2023 और 2024 में) और 2025 में एक स्वर्ण पदक जीता है.
2022 में उनका पहला पदक एक गहरे दुखद घटना के बाद आया था. उन्हें रास्ते में ही पता चला कि उनके पिता का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया है- जबकि कुछ ही घंटे पहले उन्होंने ही मनीषा को नई दिल्ली हवाई अड्डे पर छोड़ा था.
हालांकि, इस साल की शुरुआत में 2026 एशियाई खेलों में उन्हें निराशा हाथ लगी. नागोया में क्वार्टर फाइनल मुकाबले में उन्हें जापान की अकारी फुजिनामी (जो पेरिस ओलंपिक की स्वर्ण पदक विजेता हैं) से हार का सामना करना पड़ा, जिस वजह से वे पोडियम तक नहीं पहुंच सकीं.
दिलचस्प बात यह है कि एशियाई खेलों में उन्होंने महिलाओं के 57 किलोग्राम वर्ग में हिस्सा लिया था, लेकिन विश्व चैंपियनशिप के लिए वे 59 किलोग्राम वर्ग में चली गईं. इससे पहले, एशियाई चैंपियनशिप में उन्होंने जो पदक जीते थे, वे 62 और 65 किलोग्राम वर्ग में थे. मनीषा अब 2028 ओलिंपिक के लिए 57 किग्रा में शिफ्ट कर रही हैं, क्योंकि उनका कहना है कि 62 किग्रा में यूरोप के लंबे रेसलरों के सामने उनकी छोटी ऊंचाई की परेशानी है.
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