नागोया में एशियाई पैरा गेम्स के खत्म हुए एक हफ्ता हो चुका है. भारत का प्रदर्शन इतिहास में अब तक का सबसे बेहतरीन रहा है. जिसमें 30 स्वर्ण पदकों के साथ कुल 114 पदक जीते गए, इसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या यह पैरा स्पोर्ट्स को मुख्यधारा में लाने और पैरा स्पोर्ट्स स्टार्स के साथ होने वाले भेदभाव के मुद्दे को सुलझाने का एक मौका है? क्या इस सकारात्मकता को बनाए रखा जा सकता है, और अगर हां, तो कैसे? क्या दो दिन बाद, जब भारत और न्यूजीलैंड के बीच वनडे सीरीज शुरू होगी, तो देश का ध्यान फिर से क्रिकेट की ओर चला जाएगा और इन स्टार्स को भुला दिया जाएगा? क्या हम 'या तो यह, या वह' वाली सोच से आगे बढ़कर 'यह और वह' यानी सभी खेलों को साथ लेकर चलने वाली सोच अपना सकते हैं और कई तरह के खेलों का जश्न मना सकते हैं?
सबसे पहले, यह एशियाई पैरा गेम्स एक खास वजह से अब तक के सबसे बेहतरीन गेम्स रहे हैं. साल 2023 में हांगझोऊ में, भारत ने 303 एथलीटों की एक टीम भेजी थी और 108 मेडल जीते थे. शुरुआत में यह संख्या 111 थी, लेकिन डोपिंग नियमों के उल्लंघन के कारण 3 पदक छिन जाने के बाद यह 108 रह गई थीं.
इन 108 पदकों में से 29 स्वर्ण पदक थे. नागोया में, भारत ने 167 एथलीटों की टीम भेजी और 30 स्वर्ण पदकों के साथ कुल 114 पदक जीतकर लौटा. साफ तौर पर, यह तरक्की बहुत तेजी से हुई है और यह प्रगति वाकई हैरान करने वाली है. पैरा स्पोर्ट्स में, LA28 (2028 लॉस एंजिल्स गेम्स) तक दुनिया के टॉप 15 देशों में शामिल होने का सपना अब काफी हद तक सच होता दिख रहा है.
प्रदीप कुमार
अब कुछ कहानियों पर नजर डालें, तो आपको समझ आएगा कि इन एथलीटों का और ज्यादा जश्न क्यों मनाया जाना चाहिए. उदाहरण के लिए, प्रदीप कुमार का ही मामला ले लीजिए. 2003-04 के आसपास प्रदीप की शादी हुई थी और वह अपनी पत्नी के साथ अपने गांव में थे, तभी उन्होंने देखा कि कुछ बदमाश गांव की महिलाओं के साथ छेड़छाड़ कर रहे हैं. उन्होंने इसका विरोध किया, जिसके जवाब में उन पर 3 गोलियां चलाई गईं. इस घटना के बाद से वह व्हीलचेयर तक ही सीमित रह गए हैं.
शुरुआती 10 सालों तक, लोग उनका मजाक उड़ाते थे या उन पर तरस खाते थे. कुछ लोगों ने तो यहां तक कह दिया कि उनका जीवन बेकार है और बेहतर होगा कि वह सब कुछ छोड़ दें. साल 2015 में उन्होंने पहली बार टीवी पर व्हीलचेयर रग्बी देखा और पैरा-स्पोर्ट्स के बारे में जाना. इसी से प्रेरित होकर उन्होंने खेलों में हाथ आजमाया और आज 2026 में वे एशियन पैरा गेम्स के सिल्वर मेडलिस्ट हैं.
मोना अग्रवाल
मोना अग्रवाल की कहानी भी बहुत शानदार है, उन्होंने नागोया में दो गोल्ड मेडल जीते, जिनमें एक वर्ल्ड रिकॉर्ड और कई एशियन रिकॉर्ड शामिल हैं, साल 2021 से पहले मोना ने कभी बंदूक नहीं उठाई थी. उन्हें राइफल शूटिंग के बारे में कुछ नहीं पता था, लेकिन जब उनके पति को एक न्यूरोलॉजिकल समस्या का पता चला, तो उन्होंने परिवार का खर्च चलाने के लिए खेलों में कुछ करने का फैसला किया. उन्होंने बताया, "मुझे परिवार के लिए कुछ करना था, मेरे पति भी एक पैरा-एथलीट थे, लेकिन इस न्यूरोलॉजिकल समस्या की वजह से वे खेल जारी नहीं रख सके, मेरे ससुराल वाले बहुत मददगार हैं. वे मेरे दो छोटे बच्चों की देखभाल करते हैं, और परिवार का सारा पैसा मेरे पति के इलाज में खर्च हो जाता है."
इसका मतलब यह था कि उनके अपने प्रयासों के लिए कोई पैसा नहीं बचा था, और अगर उन्हें खेलों में आगे बढ़ना था, तो उन्हें सब कुछ खुद ही करना पड़ता. उन्होंने कहा, "मैंने दोस्तों से पैसे उधार लेकर सारा जरूरी सामान खरीदा. मुझे पता था कि यह एक बहुत बड़ा रिस्क है, लेकिन मैंने ठान लिया था कि मैं इसे सफल बनाऊंगी और कुछ ऐसा करूंगी जिस पर मेरे परिवार को गर्व हो. मुझे उम्मीद है कि अब मैं अपना कर्ज चुका पाऊंगी."
तब से, मोना ने न केवल अपना कर्ज चुकाया है, बल्कि एक लंबा सफर भी तय किया है. LA28 के लिए क्वालीफाई करने वाली पहली भारतीय शूटर बनने से लेकर नागोया में कई गोल्ड मेडल जीतने तक, उनका सफर वाकई प्रेरणादायक रहा .
विराट-रोहित के साथ प्रदीप और मोना का भी जश्न मनाइए, तभी पूरी होगी भारत की खेल क्रांति
असल बात यह है कि नागोया में मेडल जीतने वाले हर एथलीट और यहां तक कि वे भी जिन्होंने मेडल नहीं जीता. प्रेरणा की एक बेहतरीन मिसाल हैं. वे भारत की 15 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं, फिर भी उन्हें अक्सर मुख्यधारा से दूर रखा गया है. उन्हें हमारी सहानुभूति की जरूरत नहीं है. बल्कि हमें उनके साथ संवेदनशीलता और सम्मान से पेश आना चाहिए और उन्हें ऐसे एथलीटों के रूप में सेलिब्रेट करना चाहिए जिन्होंने देश का नाम रोशन किया है.
नागोया ने एक मंच तैयार कर दिया है, भारत अब एक बड़े बदलाव की दहलीज पर खड़ा है. प्रधानमंत्री ने पैरा स्पोर्ट्स की सफलता के बारे में बात की है और पूरे देश में इन खिलाड़ियों का जश्न मनाया जा रहा है, उन्हें सम्मानित किया जा रहा है. यह बिल्कुल सही समय है और हम देख सकते हैं कि एक क्रांति आ रही है. यहां हम सभी की एक भूमिका है. हमें इन खिलाड़ियों का जश्न मनाना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि यह उत्साह बना रहे.
ऐसा नहीं हो सकता कि भारत सिर्फ एक खेल वाला देश बना रहे. यह 'या तो यह, या वह' वाली बात नहीं है. बल्कि, जैसा कि पहले बताया गया है, यह 'यह और वह' दोनों है. जब आप विराट और रोहित को देखते हैं और उनका जश्न मनाते हैं, तो प्रदीप और मोना का भी जश्न मनाएं. वे भी भारत की कहानी का उतना ही हिस्सा हैं जितने कि क्रिकेटर. और अगर भारत सच में आने वाले समय में 'विकसित' बनना चाहता है, तो पैरा स्पोर्ट्स के सितारों के प्रति हमारे बर्ताव में हमेशा के लिए बदलाव आना चाहिए.
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