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बांस की जैवलिन से ब्रॉन्ज तक, रोहित को अब 70 लाख और सरकारी नौकरी, पिता का संघर्ष लाया रंग

एशियन गेम्स 2026 में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर लौटे रोहित यादव के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने 70 लाख रुपये की इनामी राशि और सरकारी नौकरी देने की घोषणा की है.

बांस की जैवलिन से ब्रॉन्ज तक, रोहित को अब 70 लाख और सरकारी नौकरी, पिता का संघर्ष लाया रंग
रोहित यादव
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एशियन गेम्स 2026 में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर लौटे भारत के जैवलिन थ्रोअर रोहित यादव के लिए अच्छी खबर है. रोहित ने 84.35 मीटर के अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के साथ देश के लिए पदक जीता था. रोहित यादव के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने 70 लाख रुपये की इनाम राशि देने की घोषणा की है. साथ ही उन्हें सरकारी नौकरी भी मिलेगी. खेल एवं युवा कल्याण मंत्री गिरीश चंद्र यादव ने शुक्रवार को इसकी घोषणा की है.

जैवलिन पकड़ाने के लिए पिता का किया धन्यवाद

रोहित यादव ने घर पहुंचने पर 'आईएएनएस' के साथ बात करते हुए कहा, 'मैंने देश के लिए मैंने ब्रॉन्ज मेडल जीता है और यह मेरा पहला मेडल है. इसमें मेरे पिता का बहुत बड़ा योगदान रहा. उन्होंने ऐसी परिस्थितियों से मुझे यहां तक पहुंचाया. मुझे कुछ नहीं पता था कि जैवलिन क्या होता है और यह कैसे खेला जाता है. जैवलिन पकड़ाने के लिए उनका बहुत-बहुत धन्यवाद. इस यात्रा में मुझे काफी लोगों ने सपोर्ट किया है और मैं उन सभी को धन्यवाद देता हूं. अब अगला लक्ष्य लॉस एंजिल्स में होने वाले ओलंपिक गेम्स हैं और अब उसी की तैयारी है. अगले साल एशियन और वर्ल्ड चैंपियनशिप है और उसी की तैयारी है.'

तीसरे प्रयास में आया रोहित का बेस्ट थ्रो

रोहित यादव का प्रदर्शन एशियन गेम्स 2026 में शानदार रहा. रोहित का बेस्ट थ्रो उनके तीसरे प्रयास में आया. रोहित ने पहले प्रयास में 77.25 मीटर की दूरी तय की, जबकि वह दूसरे प्रयास में जैवलिन को 82.40 मीटर दूर फेंकने में सफल रहे. उन्होंने चौथे प्रयास में 82.16 और पांचवें और अंतिम प्रयास में जैवलिन को 82.15 मीटर दूर फेंका.

बांस की बनी जेवलिन से शुरू हुआ सफर

रोहित यादव ने जैवलिन में अपने करियर की शुरुआत बेहद कम और साधारण संसाधनों के साथ की. शुरुआती दिनों में पैसे की कमी के कारण उन्होंने बांस से बनी जैवलिन से प्रैक्टिस की. दिलचस्प बात ये है कि रोहित के पिता सभाजीत यादव खुद मैराथन धावक रह चुके हैं, बताते हैं कि आर्थिक तंगी के कारण परिवार के पास आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाएं नहीं थीं. ऐसे में उन्होंने अपने तीनों बेटों को खेतों में ही अभ्यास कराया.

कई बार बच्चों को चोटों का भी सामना करना पड़ा, लेकिन मजबूत इरादों के आगे हर मुश्किल छोटी साबित हुई. सभाजीत ने एक कोच की तरह अपने बेटों को निखारने में कोई कसर नहीं छोड़ी, और आज उनकी ये मेहनत रंग ला रही है.

पेड़ों पर चादर बांधकर की तैयारी

सभाजीत अपने बेटों को शहर भेजकर प्रशिक्षण दिलाने में सक्षम नहीं थे. उन्होंने घर के पास ही खेत को अभ्यास का मैदान बना लिया. पेड़ों पर मोटी चादर बांधकर लक्ष्य तैयार किया जाता था और बेटों से लगातार भाला फेंकने का अभ्यास कराया जाता था. मेहनत और लगन का नतीजा यह रहा कि रोहित यादव के नाम आज ब्रॉन्ज मेडल जुड़ गया है और उनका अगला लक्ष्य  ओलंपिक गेम्स में देश के लिए मेडल लाना है.

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