पूंछ, जम्मू और कश्मीर: सीमावर्ती जिले पूंछ से निकलकर इंटरनेशनल स्पोर्ट्स स्टेज तक पहुंचना आसान काम नहीं होता है. मगर खोरीनार मोहल्ले से ताल्लुक रखने वाली अभिलव कौर ने अपनी मेहनत और लगन से हर किसी को चौंका दिया है. हॉकी से अपने खेल करियर की आगाज करने वाली अभिलव मौजूदा समय में किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं. वह भारतीय महिला लैक्रॉस टीम की महत्वपूर्ण सदस्य हैं. जिन्होंने देश को इंटरनेशनल लेवल पर पदक दिलाया है.
अभिलव ने करीब एक दशक तक जम्मू-कश्मीर का किया है प्रतिनिधित्व
अभिलव ने पिछले एक दशक में जम्मू-कश्मीर का सब-जूनियर, जूनियर, सीनियर और इंटर-यूनिवर्सिटी स्तर पर प्रतिनिधित्व किया है. इस दौरान उन्होंने हरियाणा से लेकर झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, असम, उत्तराखंड, पंजाब और चंडीगढ़ सहित देश के कई राज्यों में राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया. जहां उनका प्रदर्शन सराहनीय रहा है.

लैक्रॉस को अपनाते ही बदल गई अभिलव की जिंदगी
हालांकि, अभिलव की जिंदगी में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब उन्होंने लैक्रॉस को अपनाया. साल 2025 में गोरखपुर में आयोजित ओपन नेशनल ट्रायल्स-कम-इंडिया कैंप में उनका प्रदर्शन शानदार रहा. जिसके बाद भारतीय टीम में दस्तक देने का उनका दरवाजा भी खुल गया.

अभिलव ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा!
भारतीय टीम में मौका मिलने के बाद उन्होंने सऊदी अरब के रियाद में खेले गए एशियन लैक्रॉस गेम्स में हिस्सा लिया. जहां वह टीम के साथ स्वर्ण पदक जीतने में कामयाब रहीं. यहीं नहीं वह 2026 में मलेशिया के कुआलालंपुर में खेले गई साउथईस्ट एशियन कप का भी हिस्सा रहीं. जहां टीम को कांस्य पदक मिला था.

अभिलव हिमाचल प्रदेश के सुंदरनगर में आयोजित फेडरेशन कप में भी जम्मू-कश्मीर का प्रतिनिधित्व करने में कामयाब रहीं. जहां उनकी टीम क्वार्टर फाइनल तक का सफर तय करने में कामयाब हुई थी. इस मुकाबले के बाद उन्हें कोलकाता में आयोजित इंडिया कैंप में भी शामिल किया गया था.

अभिलव को अब नोएडा में आयोजित भारतीय टीम के कैंप के लिए भी चुना गया है. जहां आगामी वर्ल्ड ओलंपिक क्वालिफायर प्रतियोगिताओं की तैयारियां चल रही हैं. इन प्रतियोगिताओं का आयोजन अमेरिका और हांगकांग जैसे देशों में होना है.

दो खेलों में बनाई पहचान
अभिलव की कहानी सिर्फ लैक्रॉस तक ही सीमित नहीं है. उन्होंने हॉकी में भी सीनियर महिला राष्ट्रीय चैंपियनशिप, जूनियर राष्ट्रीय चैंपियनशिप, सब-जूनियर राष्ट्रीय चैंपियनशिप, राष्ट्रीय स्कूल खेल और इंटर-यूनिवर्सिटी राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया है.

राष्ट्रीय स्तर पर उनकी जर्नी साल 2013 में अंडर 14 राष्ट्रीय स्कूल खेलों से शुरू हुई थी. तब से लेकर आज तक वह लगातार अपने खेल को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में जुटी हुई हैं.
क्या है लैक्रॉस?
लैक्रॉस की उत्पत्ति करीब 12वीं शताब्दी में उत्तरी अमेरिका के मूल निवासियों की तरफ से हुई थी, जो कि फुटबॉल, बास्केटबॉल और हॉकी का मिलाजुला रूप माना जाता है. क्योंकि इस खेल में भी इन्हीं खेलों की तरह गति, रणनीति और शारीरिक कौशल की आवश्यकता होती है. खेल के दौरान खिलाड़ी एक विशेष प्रकार की स्टिक (लैक्रोस स्टिक) के ऊपरी हिस्से पर बने नेट का उपयोग करके रबर की गेंद को पास करते हैं, दौड़ते हैं और विरोधी टीम के खिलाफ करते गोल करते हुए स्कोर करते हैं. मौजूदा समय में लैक्रॉस कनाडा और अमेरिका में बेहद लोकप्रिय खेल है. यही नहीं इसे कनाडा का राष्ट्रीय ग्रीष्मकालीन खेल भी माना जाता है.
खेल की खास बातें
- प्रत्येक टीम में आमतौर पर 10 खिलाड़ी होते हैं (फील्ड लैक्रॉस में).
- खिलाड़ी स्टिक के सिरे पर लगे जालीदार हिस्से से गेंद को नियंत्रित करते हैं.
- मैच चार क्वार्टर में खेला जाता है.
- सबसे अधिक गोल करने वाली टीम विजेता होती है.
ओलंपिक में लैक्रॉस
- लैक्रॉस की वापसी लॉस एंजिलिस 2028 ओलंपिक में होगी.
- वहां इसका छोटा और तेज प्रारूप 'Lacrosse Sixes' खेला जाएगा, जिसमें प्रत्येक टीम में 6 खिलाड़ी होते हैं.
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