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एशियन गेम्स 2026: शूटिंग से बैडमिंटन तक, इन खेलों में भारत को मिली सबसे बड़ी निराशा

आइची-नागोया ने तस्वीर के दोनों पहलू दिखाए - भारत के पास बेहतरीन खिलाड़ियों को चुनौती देने का हुनर ​​है, लेकिन खेलों में उसकी तरक्की आखिरकार इस बात पर निर्भर करेगी कि वह कितनी निरंतरता के साथ अपनी क्षमता को मेडल में बदल पाता है.

एशियन गेम्स 2026: शूटिंग से बैडमिंटन तक, इन खेलों में भारत को मिली सबसे बड़ी निराशा
एशियाड में बैडमिंटन से लेकर शूटिंग तक भारत को मिली निराशा

आइची-नागोया एशियाई खेलों में भारत की खेल महत्वाकांक्षाओं को हकीकत का सामना करना पड़ा. उम्मीद थी कि भारतीय अभियान रिकॉर्ड पदकों के साथ खत्म होगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं और भारतीय अभियान हांगझोऊ में मिले रिकॉर्ड-तोड़ पदकों की तुलना में काफी कम पदकों के साथ खत्म हुआ. भारत कुल रैंकिंग में चौथे स्थान पर तो रहा, लेकिन उसने 85 पदक जीते - 21 गोल्ड, 27 सिल्वर और 37 ब्रॉन्ज. यह पिछले खेलों में जीते गए 106 पदकों की तुलना में 21 पदक और सात गोल्ड कम थे.  2036 तक टॉप-10 और 2047 तक टॉप-5 रैंकिंग पाने की कोशिश कर रहे देश के लिए ये आंकड़े याद दिलाते हैं कि शानदार खेल आयोजन करने की तुलना में तरक्की को बनाए रखना कहीं ज़्यादा मुश्किल होगा.

एशियन गेम्स में टॉप पर चीन का दबदबा कायम रहा और उसने 341 पदक जीते, जिनमें 169 गोल्ड शामिल थे. जापान 83 गोल्ड और 269 पदकों के साथ दूसरे स्थान पर रहा, जबकि दक्षिण कोरिया 39 गोल्ड और 150 पदकों के साथ तीसरे स्थान पर रहा. चौथे स्थान पर रहने के बावजूद भारत एशिया के प्रमुख खेल देशों में बना हुआ है. यह उपलब्धि मायने रखती है. चौथे स्थान का मतलब है कि भारत महाद्वीप के प्रमुख खेल देशों में मजबूती से बना हुआ है, लेकिन टॉप पर मौजूद देशों के साथ अंतर अभी भी बहुत बड़ा है.

अगर आखिरी दो दिनों में गोल्ड जीतने का शानदार सिलसिला न चला होता - जब भारत ने 11 गोल्ड मेडल जीते - तो टॉप-5 में जगह बनाना मुमकिन नहीं होता. इस कमी का सबसे बड़ा कारण दो पारंपरिक पदक-आधारित खेलों - शूटिंग और एथलेटिक्स - का खराब प्रदर्शन था. दोनों खेलों में बड़ी उम्मीदें थीं, लेकिन भारत को हांगझोऊ की तुलना में कम पदक मिले, जिससे निरंतरता, दबाव को संभालने और तैयारी में कमियां उजागर हुईं.

शूटिंग में लड़खड़ाए चैंपियन

पिछली बार शानदार सात गोल्ड, नौ सिल्वर और छह ब्रॉन्ज़ मेडल जीतने के बाद, भारत की 30 सदस्यीय टीम जापान से 15 पदकों - तीन गोल्ड, आठ सिल्वर और चार ब्रॉन्ज़ - के साथ लौटी. अभियान की शुरुआत चूके हुए मौकों और पसंदीदा खिलाड़ियों के लड़खड़ाने के साथ हुई. 

दो बार की ओलंपिक पदक विजेता मनु भाकर के लिए खेल निराशाजनक रहे और भारतीय महिला खिलाड़ी 10 मीटर एयर पिस्टल में कोई पदक नहीं जीत सकीं. कमलजीत, आकाश भारद्वाज और केदारलिंग उचागनवे की पुरुषों की 10 मीटर एयर पिस्टल टीम भी कोई खास कमाल नहीं कर पाई, जिससे उस इवेंट में चिंता और बढ़ गई जिसमें भारत पारंपरिक रूप से मेडल का मजबूत दावेदार रहा है.

आखिरकार 10 मीटर एयर पिस्टल मिक्स्ड टीम इवेंट में सफलता मिली, जहां सुरुचि सिंह और कमलजीत ने गोल्ड जीता। लेकिन जिस शूटर ने कैंप का माहौल बदल दिया, वह थीं नीरू ढांडा. 27 साल की नीरू ट्रैप शूटिंग में व्यक्तिगत एशियाई खेलों का गोल्ड जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। उन्होंने महिलाओं की टीम इवेंट में सिल्वर और कायन चेनाई के साथ मिक्स्ड टीम कॉम्पिटिशन में एक और गोल्ड जीता. फिर भी, नीरू का शानदार प्रदर्शन बड़ी चिंताओं को छिपा नहीं सका.

कई भारतीय शूटर अच्छी शुरुआत के बाद लड़खड़ा गए, खासकर चीन और दक्षिण कोरिया के खिलाफ, और अहम मौकों पर जीत की स्थिति गंवा बैठे. इस पैटर्न ने बेहतर मानसिक तैयारी और हाई-प्रेशर कॉम्पिटिशन को जीतने की क्षमता की जरूरत को उजागर किया.

एथलेटिक्स में मिली निराशा

एथलेटिक्स से भी एक और बड़ी निराशा हाथ लगी. कॉम्पिटिशन शुरू होने से पहले ही भारत ने गोल्ड मेडल के अपने सबसे बड़े दावेदारों में से एक को खो दिया, जब जैवलिन स्टार नीरज चोपड़ा चोट के कारण हट गए. समस्याएं सिर्फ जैवलिन तक ही सीमित नहीं थीं. तजिंदरपाल सिंह तूर एशियाई खेलों में गोल्ड की हैट्रिक नहीं लगा सके, जबकि लॉन्ग जम्पर मुरली श्रीशंकर और हाई जम्पर सर्वेश कुशारे को भी सिल्वर से ही संतोष करना पड़ा. उनके प्रदर्शन से पता चला कि भारत कॉम्पिटिशन में बना हुआ था, लेकिन एक बार फिर जीत की दावेदारी और टॉप पर रहने के बीच का अंतर भारी पड़ा.

चोटों ने मुश्किलों को और बढ़ा दिया, क्योंकि ज्योति याराजी वार्म-अप के दौरान घुटने में दर्द और परेशानी महसूस होने के बाद महिलाओं की 100 मीटर हर्डल्स की शुरुआती हीट से हट गईं. घुटने की गंभीर चोट से उबरकर वापसी कर रहे अविनाश साबले पुरुषों की 3000 मीटर स्टीपलचेज में चौथे स्थान पर रहे. 

किरण पहल, एम पूवम्मा, प्राची चौधरी और विथ्या रामराज की महिलाओं की 4x400 मीटर रिले टीम ने एथलेटिक्स में एकमात्र गोल्ड मेडल जीता, लेकिन यह प्रदर्शन हांगझोऊ के प्रदर्शन से काफी पीछे रहा, जहां भारत ने छह गोल्ड मेडल जीते थे. खराब तैयारियों ने निराशा को और बढ़ा दिया. रहने की जगह की समस्या, गेम्स विलेज का न होना और लगातार ट्रांसपोर्ट की दिक्कतों ने रूटीन को खराब कर दिया. वेन्यू तक लंबी यात्रा, बसों में देरी और रिकवरी के लिए कम समय ने बोझ और बढ़ा दिया. ये बातें मेडल कम मिलने की पूरी वजह तो नहीं बतातीं, लेकिन इन्होंने यहां एथलीट-सपोर्ट सिस्टम की कमियों को उजागर किया. 

40 साल बाद खाली हाथ लौटा टेनिस दल

पहले टेनिस टीम को लेकर काफी उथल-पुथल पहले ही मची हुई थी और टीम 1986 के बाद पहली बार बिना कोई मेडल जीते लौटी. भारत दो इवेंट्स में क्वार्टर-फ़ाइनल तक तो पहुंचा, लेकिन दोनों में हार गया. पुरुष सिंगल्स में सुमित नागल बाहर हो गए और टॉप सीडेड जोड़ी अनिरुद्ध चंद्रशेखर और एन श्रीराम बालाजी पुरुष डबल्स में हार गए. भारत की टेनिस की नई उम्मीद दक्षिनेश्वर पुरुष सिंगल्स के तीसरे राउंड में हार गए. नागल क्वार्टर फाइनल में हार गए और रामकुमार रामनाथन तीसरे राउंड में बाहर हो गए.

बैडमिंटन ने किया सबसे अधिक निराश

हांग्जो में जहां भारत ने एक स्वर्ण सहित तीन पदक जीते थे, इस बार दल केवल एक कांस्य ही हासिल कर सका, जो पुरुषों की टीम स्पर्धा में आया था. सबसे निराशाजनक परिणाम गत चैंपियन सात्विकसाईराज रंकीरेड्डी और चिराग शेट्टी का रहा, जिन्हें अपने से 36 स्थान नीचे रैंकिंग वाली जोड़ी के खिलाफ शुरुआती दौर में हार का सामना करना पड़ा. 

महिला सिंगल्स के क्वार्टर-फ़ाइनल में पीवी सिंधु और उन्नति हुड्डा को कड़े मुक़ाबले के बाद हार का सामना करना पड़ा. जकार्ता 2018 में सिल्वर मेडल जीतने के बाद पीवी सिंधु को एशियाई खेलों में व्यक्तिगत मेडल का इंतजार है. आइची-नागोया 2026 में बैडमिंटन के पांचों व्यक्तिगत इवेंट्स में भारत को कोई मेडल नहीं मिला. उन्नति हुड्डा, ट्रेसा जॉली-गायत्री गोपीचंद और ध्रुव कपिला-तनीषा क्रास्टो अपने-अपने क्वार्टर-फ़ाइनल मैच हारकर टूर्नामेंट से बाहर हो गए. 

इन हार का मतलब यह था कि पीवी सिंधु और लक्ष्य सेन की अगुवाई वाली स्टार खिलाड़ियों से सजी टीम 12 साल में पहली बार कोई व्यक्तिगत मेडल नहीं जीत पाई. पिछली बार भारत बिना किसी व्यक्तिगत मेडल के 2014 में लौटा था. उस अभियान में किदांबी श्रीकांत, पारुपल्ली कश्यप और साइना नेहवाल जैसे बड़े नाम शामिल थे.

अलग होती तस्वीर...

कई बड़ी सफलताएं और ऐतिहासिक गोल्ड मेडल मिले, और ऐसे प्रदर्शन देखने को मिले जिनसे भारत के मेडल जीतने का दायरा बढ़ा. लेकिन शूटिंग और एथलेटिक्स में मिली हार ने उन कमियों को उजागर किया जिन्हें नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता. आइची-नागोया ने तस्वीर के दोनों पहलू दिखाए - भारत के पास बेहतरीन खिलाड़ियों को चुनौती देने का हुनर ​​है, लेकिन खेलों में उसकी तरक्की आखिरकार इस बात पर निर्भर करेगी कि वह कितनी निरंतरता के साथ अपनी क्षमता को मेडल में बदल पाता है. अगर इन खेलों में अच्छा प्रदर्शन हुआ होता तो भारत के मेडल की संख्या 100 के करीब होती या उसे पार कर जाती.

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