- राजस्थान हाईकोर्ट ने जेन जी, अल्फा और बीटा के भविष्य और शिक्षा पर केंद्र और राज्य सरकार से रिपोर्ट मांगी है
- अदालत ने शिक्षा में एआई, स्क्रीन और तकनीक के उपयोग पर भी चेतावनी दी है
- अदालत ने ग्रामीण स्कूलों में व्यवस्थान और बुनियादी सुविधाओं में सुधार के निर्देश दिए हैं
राजस्थान हाईकोर्ट ने जेन जी, जेन अल्फा और जेन बीटा के कल्याण और भविष्य पर स्वतः संज्ञान लेते हुए केंद्र और राजस्थान सरकार से रिपोर्ट सौंपने के लिए कहा है. जस्टिस अनूप कुमार ढंड की अदालत ने 24 अगस्त 2026 को इस संबंध में आदेश जारी किया है. अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ रही पीढ़ियां ही आने वाले भारत की कार्यशक्ति, नेतृत्व और जिम्मेदारी को संभालेंगी. ऐसे में उन्हें किस तरह की शिक्षा, वातावरण और अवसर दिए जा रहे हैं, वही देश के भविष्य को तय करेगा. जेन जी (1997-2012 के बीच जन्मे), जेन-अल्फा (2013-2024 के बीच जन्मे) और जेन-बीटा (2025-2039 के बीच जन्म लेने वाले) युवाओं और बच्चों के बारे में हाई कोर्ट के इस आदेश को बहुत महत्वपूर्ण समझा जा रहा है.
हाईकोर्ट ने मौजूदा शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़ी चुनौतियों को केवल स्कूलों की चारदीवारी तक सीमित नहीं रखा. अदालत ने ग्रामीण और सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी, तेजी से बढ़ती तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) पर निर्भरता, हाथ से लिखने और किताब पढ़ने की घटती आदत, स्क्रीन टाइम (स्क्रीन देखने की अवधि), पेपर लीक, मानसिक स्वास्थ्य, बेरोजगारी, साइबर सुरक्षा और पोषण जैसे मुद्दों को बच्चों के भविष्य से जोड़ते हुए केंद्र और राजस्थान सरकार से स्थिति रिपोर्ट (स्टेटस रिपोर्ट) और कार्य योजना (एक्शन प्लान) मांगा है.
एआई के बारे में किया सावधान
अदालत ने तकनीक के बढ़ते प्रभाव के बीच एक महत्वपूर्ण चेतावनी भी दी है. उसका कहना है कि शिक्षा में एआई, डिजिटल लर्निंग (डिजिटल पढ़ाई) और आधुनिक तकनीक को अपनाना समय की जरूरत है, लेकिन तकनीक पर अनियंत्रित और पूरी तरह निर्भरता बच्चों की बुनियादी क्षमताओं को प्रभावित कर सकती है. अदालत ने हाथ से लिखने, किताब पढ़ने, नोट्स बनाने और लिखित परीक्षा जैसी परंपराओं को मजबूत बनाए रखने की आवश्यकता जताई है.कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तकनीक शिक्षा में मददगार हो सकती है, लेकिन मानव बुद्धि का विकल्प नहीं.

जस्टिस अनूप कुमार ढंड की अदालत ने स्वतः संज्ञान लेते हुए आदेश दिया
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पेपर लीक और बेरोजगारी पर चिंता
जेन-जेड के सामने बार-बार होने वाले पेपर लीक को अदालत ने गंभीर चुनौती माना है. कोर्ट के अनुसार इससे विद्यार्थियों की पढ़ाई, मानसिक स्वास्थ्य, करियर और सार्वजनिक मूल्यांकन व्यवस्था पर भरोसा प्रभावित होता है और सरकार को पेपर लीक रोकने के लिए मजबूत एवं अचूक व्यवस्था तैयार करनी होगी.
इसके साथ ही अदालत ने शिक्षा और रोजगार के बीच के अंतर (एजुकेशन-टू-एम्प्लॉयमेंट गैप) पर भी सरकार से जवाब मांगा है. आदेश में एआई, डेटा और हरित कौशल (ग्रीन स्किल्स) आधारित पाठ्यक्रम, कौशल-आधारित डिग्रियों, व्यावहारिक प्रशिक्षण (अप्रेंटिसशिप) और कॉलेज के पहले वर्ष से उद्योग-जुड़े इंटर्नशिप को बढ़ावा देने की जरूरत बताई गई है. अस्थायी व स्वतंत्र रूप से काम करने वाली अर्थव्यवस्था (गिग इकोनॉमी) में काम करने वाले युवाओं की सामाजिक सुरक्षा और नए व्यवसायों (स्टार्टअप) के लिए आसान ऋण प्रक्रिया जैसे मुद्दे भी सामने रखे गए हैं.
स्क्रीन टाइम को लेकर चिंता
हाईकोर्ट ने बच्चों में बढ़ते स्क्रीन टाइम को भी गंभीरता से लिया है. आदेश में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के दिशानिर्देशों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है. अदालत ने सरकार से इन पीढ़ियों के लिए स्क्रीन टाइम सीमित करने की नीति (स्क्रीन टाइम लिमिटिंग पॉलिसी) तैयार करने को कहा है.
अदालत की चिंता केवल मोबाइल तक सीमित नहीं है. आदेश में कहा गया है कि अत्यधिक डिजिटल निर्भरता से बच्चे पढ़ने, सीखने और लिखने की आदत खो रहे हैं और संवाद भी बोलने के बजाय संदेश (टेक्स्टिंग) भेजने की ओर बढ़ रहा है.
गांव के स्कूलों की स्थिति पर चिंता
हाईकोर्ट ने ग्रामीण और गांवों के सरकारी स्कूलों की स्थिति को विशेष चिंता का विषय माना है. अदालत ने शिक्षकों, प्राचार्यों और वार्डन के रिक्त पद भरने, शारीरिक शिक्षकों (पीटीआई), कंप्यूटर शिक्षकों और काउंसलरों की विशेष भर्ती, स्मार्ट क्लासरूम (डिजिटल कक्षाओं), कंप्यूटर, इंटरनेट और डिजिटल साक्षरता की सुविधा तथा शिक्षकों को जन-जेड, अल्फा और बीटा के अनुरूप आधुनिक शिक्षण पद्धति में प्रशिक्षित करने के निर्देशात्मक बिंदु सरकार के सामने रखे हैं.
साथ ही स्कूलों में नियमित स्वास्थ्य जांच, प्राथमिक उपचार, नजदीकी प्राथमिक या सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी/सीएचसी) से संपर्क, मिड-डे मील (मध्याह्न भोजन) की गुणवत्ता की निगरानी, छात्राओं की सुरक्षा के लिए सीसीटीवी कैमरे और महिला स्टाफ की उपलब्धता पर भी जोर दिया गया है. गांवों के सरकारी स्कूलों में लड़के-लड़कियों के लिए अलग और कार्यशील शौचालय, पेयजल, बिजली, पावर बैकअप, चारदीवारी, खेल मैदान और खेल सामग्री उपलब्ध कराने की जरूरत भी बताई गई है.
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