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राजस्थान पंचायत चुनाव: BSP का 'एकला चलो' दांव, किसका बिगड़ेगा सियासी गणित और किसे मिलेगा फायदा?

राजस्थान पंचायत चुनाव से पहले बहुजन समाज पार्टी ने ऐसा दांव चल दिया है, जो बीजेपी और कांग्रेस दोनों की नींद उड़ा सकता है.

राजस्थान पंचायत चुनाव: BSP का 'एकला चलो' दांव, किसका बिगड़ेगा सियासी गणित और किसे मिलेगा फायदा?
बसपा प्रमुख मायावती
ANI
  • राजस्थान पंचायत चुनाव में BSP सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने का फैसला किया.
  • बसपा की रणनीति ‘एकला चलो’ पर आधारित है, जिसका असर खासकर SC-ST आरक्षित सीटों पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
  • पंचायत चुनाव में आरक्षित SC-ST पदों की संख्या कुल 46630 है, जहां बसपा सहित कई दल उम्मीदवार मैदान में उतारेंगे.
जयपुर:

राजस्थान के पंचायत चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने इस बार किसी भी दल के साथ गठबंधन नहीं करने का फैसला किया है. पार्टी सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है. जयपुर में राज्यसभा सांसद और बसपा के राष्ट्रीय सेक्टर प्रभारी इंजीनियर रामजी गौतम ने पार्टी की रणनीति का ऐलान करते हुए कहा कि बसपा ‘एकला चलो' की नीति पर चुनाव लड़ेगी और गांवों की सरकार में अपनी भागीदारी बढ़ाएगी. बसपा की इस रणनीति का सबसे बड़ा असरउन सीटों पर देखने को मिल सकता है, जहां बीजेपी और कांग्रेस के बीच मुकाबला बेहद करीबी रहता है. खास तौर पर दलित वोटों का बंटवारा चुनावी गणित बदल सकता है.

बसपा के इस फैसले का सबसे अहम असर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिएआरक्षित सीटों पर देखने को मिल सकता है. पंचायत चुनाव में सिर्फ सरपंच और वार्ड पंच के स्तर पर ही 5,551 सरपंच पद SC-ST के लिए आरक्षित हैं. इनमें 2,493 सीटें SC और 3,058 सीटें ST के लिए हैं. वार्ड पंच के कुल 1,30,589 पदों में 21,962 SC और 19,117 ST, यानी कुल 41,079 पद आरक्षित हैं. इस तरह सरपंच और वार्ड पंच के स्तर पर कुल 46,630 पद SC-ST के लिए आरक्षित हैं. ये आंकड़े इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि आरक्षित सीटों पर SC-ST वर्ग के उम्मीदवार ही चुनाव लड़ सकते हैं. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि ये सीटें बसपा की हैं. बीजेपी, कांग्रेस, बसपा और निर्दलीय सभी दलों के उम्मीदवार यहां मैदान में उतर सकते हैं. ऐसे में असली मुकाबला उम्मीदवार की पकड़, स्थानीय संगठन और वोटों के बंटवारे का होगा. यही वजह है कि आरक्षण का फायदा उठाने के लिए बसपा को सिर्फ सामाजिक समीकरण पर निर्भर नहीं रहना होगा. मजबूत स्थानीय उम्मीदवार, बूथ स्तर का संगठन और गांव में व्यक्तिगत पकड़ भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी.

राजनीतिक विश्लेषक ने क्या बताया? 

राजनीतिक विश्लेषक अरविंद चोटिया का मानना है कि बसपा के चुनावी मैदान में उतरने से जाहिर सी बात है कि दलित वोट के बंटने से नुकसान कांग्रेस को होगा. लेकिन बीजेपी को हर सीट पर सीधे तौर पर फायदा होगा, ऐसा कहना भी सही नहीं होगा. भाजपा के लिए फायदा तभी बनता है जब बसपा कांग्रेस के दलित वोट बैंक में ज्यादा सेंध लगाए. अगर किसी पंचायत या पंचायत समिति क्षेत्र में बीजेपी और कांग्रेस के बीच मुकाबला करीबी है और बसपा को मिलने वाले वोट मुख्य रूप से कांग्रेस के खाते से निकलते हैं तो इसका फायदा बीजेपी के उम्मीदवार को मिल सकता है. लेकिन अगर बसपा की वजह से बीजेपी के वोट भी प्रभावित होते हैं. मजबूत स्थानीय उम्मीदवार खड़ा होता है या त्रिकोणीय मुकाबले में समीकरण अलग बनते हैं तो फायदा किसी एक दल को तय नहीं माना जा सकता.

पंचायत चुनाव में BSP का इतिहास

राजस्थान में पंचायत चुनावों में बसपा का प्रदर्शन सीमित रहा है. लेकिन पार्टी लगातार अपनी मौजूदगी दर्ज कराती रही है. 2005 के पंचायत समिति चुनाव में बसपा ने 32 सीटें जीती थीं. 2015 में पंचायत समिति और जिला परिषद स्तर पर भी बसपा के उम्मीदवारों ने सीटें हासिल की. 2020-21 के पंचायत चुनावों में भी पार्टी ने कई पंचायत समिति और जिला परिषद सीटों पर जीत दर्ज की. यानी बसपा के पास कुछ इलाकों में स्थानीय आधार है. लेकिन उसे राज्य व्यापी राजनीतिक ताकत में बदलना बड़ी चुनौती है.

दो बार जीते BSP के छह-छह विधायक कांग्रेस में गए

राजस्थान की राजनीति में कांग्रेस और बसपा के रिश्ते को लेकर पुराना विवाद भी इस चुनाव में मुद्दा है. 2008 के विधानसभा चुनाव में बसपा के छह विधायक जीते थे. 2009 में ये सभी छह विधायक कांग्रेस में शामिल हो गए थे. इसके बाद 2018 के विधानसभा चुनाव में भी बसपा के छह विधायक जीते और सितंबर 2019 में सभी छह विधायक कांग्रेस में शामिल हो गए. रामजी गौतम ने इसी पुराने घटनाक्रम को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर निशाना साधा. बसपा का आरोप है कि उसके विधायकों को कांग्रेस में शामिल कर पार्टी के जनाधार को नुकसान पहुंचाया गया.

सीनियर जर्नलिस्ट गोपाल झा के मुताबिक बसपा के अकेले चुनाव लड़ने से कांग्रेस का गणित प्रभावित हो सकता है. खास तौर पर उन इलाकों में जहां कांग्रेस और बसपा के सामाजिक आधार में ओवरलैप है. लेकिन अगर बसपा अपने उम्मीदवारों और संगठन के दम पर वोट को सीट में बदलने में सफल होती है, तो यह उसके लिए सिर्फ कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने वाला चुनाव नहीं होगा, बल्कि अपना जनाधार बढ़ाने का मौका भी बनेगा.

दरअसल, पंचायत चुनाव में वोट का असर सीधे गांव की स्थानीय राजनीति पर पड़ता है. इसलिए बसपा का ‘एकला चलो' अभियान सिर्फ बीजेपी और कांग्रेस के वोट काटने की रणनीति है या राजस्थान में तीसरी राजनीतिक ताकत बनने की कोशिश, इसका जवाब चुनाव परिणाम में मिलेगा. फिलहाल इतना तय है कि करीबी मुकाबले वाली सीटों पर बसपा की मौजूदगी बीजेपी और कांग्रेस दोनों के चुनावी समीकरण को बदल सकती है.

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