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सचिन पायलट समेत राजस्थान कांग्रेस के 3 नेताओं को बड़ी जिम्मेदारी, 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव की कमान

पिछले चार दिनों में टिकट स्क्रिनिंग कमेटी की बैठकों में तेज़ी आई है. इससे पहले स्क्रिनिंग कमेटी के चेहरे केरल के चार से ज्यादा दौरे कर चुके हैं. जबकि टिकट तय करने को लेकर पार्टी का पैमाना जिताऊ क्षमता के रूप में तय हुआ है.

सचिन पायलट समेत राजस्थान कांग्रेस के 3 नेताओं को बड़ी जिम्मेदारी, 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव की कमान
सचिन पायलट
Rajasthan:

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस नेतृत्व ने राजस्थान के तीन नेताओं को बड़ी ज़िम्मेदारी दी है. इस लिस्ट में AICC महासचिव सचिन पायलट और भंवर जितेन्द्र सिंह के साथ ही राज्यसभा सांसद नीरज डांगी का नाम भी शामिल है. पार्टी ने जहां भंवर जितेन्द्र को असम का प्रभारी बनाया है तो सचिन पायलट को केरल के लिए सीनियर ऑब्ज़र्वर की ज़िम्मेदारी दी गई है. वहीं नीरज डांगी को केरल के लिए टिकट स्क्रिनिंग कमेटी में शामिल किया गया है. चुनावों की तारीखों के ऐलान से पहले ही इन नेताओं की सक्रियता अपने प्रभार वाले राज्यों में रही है. लेकिन अब चुनाव तक इनकी मेहनत और ज्यादा होगी.

टिकट से लेकर रणनीति और इलेक्शन मैनेजमेन्ट में अहम भूमिका 

राजस्थान से जिन नेताओं को पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने ज़िम्मेदारी दी है. उनकी भूमिका टिकट बंटवारे के लिए शुरू हो गई है. हालांकि टिकट स्क्रिनिंग कमेटी की बैठकें लगातार हो रही हैं और इसमें पार्टी एक-एक प्रत्याशी के नाम पर ठोक-बजाकर उसकी जीत की संभावनाओं को खंगाल रही है.टिकट स्क्रिनिंग कमेटी में भंवर जितेन्द्र सिंह असम की बैठकों में मौजूद रहे हैं जबकि केरल के लिए नीरज डांगी की सक्रियता लगातार देखी जा रही है. इसी तरह सीनियर ऑब्जर्वर के रूप में सचिन पायलट भी केरल चुनाव में अपनी ज़िम्मेदारी लगातार निभा रहे हैं. पार्टी नेतृत्व ने ज़िम्मेदारियां देने के साथ ही वरिष्ठ नेताओं की जवाबदेही भी तय करने की मंशा जताई है.

पिछले चार दिनों में टिकट स्क्रिनिंग कमेटी की बैठकों में तेज़ी आई है. इससे पहले स्क्रिनिंग कमेटी के चेहरे केरल के चार से ज्यादा दौरे कर चुके हैं. जबकि टिकट तय करने को लेकर पार्टी का पैमाना जिताऊ क्षमता के रूप में तय हुआ है.

सत्ता से बाहर चल रही कांग्रेस- क्या कर पाएगी वापसी?

पांच राज्यों के चुनावों की बात करें तो असम और केरल दोनों ही राज्य ऐसे हैं, जहां कांग्रेस पिछले दो कार्यकाल से लगातार सत्ता से बाहर चल रही है. तमिलनाडु में तो स्थिति इससे भी बदतर है.  सुदूर दक्षिण के राज्य में कांग्रेस को के. कामराज के बाद कोई करिश्माई नेता ही नहीं. कांग्रेस नेतृत्व ऐसी उम्मीद जता रही है कि इस बार के चुनाव में कुछ राज्यों में कांग्रेस की 'सत्ता का सूखा' खत्म हो सकता है. हालांकि पूर्व केन्द्रीय मंत्री और अलवर सांसद रहे जितेन्द्र सिंह लम्बे समय से असम में ज़िम्मेदारी संभाल रहे हैं. लेकिन उनका मुकाबला कांग्रेस की रणनीति को गहराई से समझने वाले हिमंत बिस्वा सरमा से है. बिस्वा भले मुख्यमंत्री बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीतकर बने हैं. लेकिन अपना सातवां चुनाव लड़ रहे हिमंत कांग्रेस के टिकिट पर भी असम में विधायक रहे हैं.

पांच राज्यों के चुनाव में प्रवासी राजस्थानी वोटर्स का भी है असर 

इस बार चुनाव जिन राज्यों में हैं उन सभी राज्यों में प्रवासी वोटर्स का भी असर है. असम और बंगाल में राजस्थानी प्रवासी बड़ी संख्या में हैं. लेकिन केरल, पुड्डुचेरी और तमिलनाडु में यह बहुत ज्यादा प्रभावी नहीं माने जाते. राजस्थानी प्रवासियों के होने से जितेन्द्र सिंह कांग्रेस को कितना फायदा दिला पाएंगे इसको लेकर एक्सरसाइज समय-समय पर होती रही है. लेकिन उनके मुकाबले के लिए बीजेपी भी राजस्थान मूल के नेताओं को यहां उतारने की तैयारी कर रही है.

कांग्रेस के लिए किस राज्य में कितनी संभावनाएं? 

यूं तो किसी भी चुनाव में कोई राष्ट्रीय पार्टी अपनी संभावनाओं को कमज़ोर नहीं मानती, लेकिन कांग्रेस के कार्यकर्ता यह तो मानते हैं कि तमिलनाडु और बंगाल के चुनाव में कांग्रेस सत्ता के लिए नहीं बल्कि बीजेपी और उसके सहयोगियों को रोकने के लिए उपस्थिति असरदार रखने की कोशिश करेगी. कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता यह ज़रूर मानते हैं कि केरल में पार्टी के लिए सबसे ज्यादा संभावनाएं हैं और असम में भी पार्टी मुकाबले में रहेगी. हालांकि असम में बीजेपी की रणनीति कांग्रेस को प्रभावी तरीके से काउन्टर करने की है. वहीं केरल में कांग्रेस की मजबूती की एक वजह राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा की कर्मभूमि होना भी माना जा रहा है. साथ में कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव केसी वेणुगोपाल का गृहराज्य भी केरल है. ऐस में पार्टी को केरल में अपनी जीत दिख रही है.

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