- भाजपा ने 3 नामों के पैनल से टिकट वितरण प्रक्रिया अपनाई.
- जयपुर के एक वार्ड से भाजपा के दो प्रत्याशी एक ही सिंबल पर मैदान में आए.
- टिकट बंटवारे के बाद भाजपा के सामने बगावत रोकने की एक बड़ी चुनौती है.
जयपुर नगर निगम चुनाव में भाजपा के टिकट बंटवारे ने पार्टी की अंदरूनी सियासी खींचतान की तस्वीर सामने ला दी है. कई दिनों तक बैठकों का दौर चला. रायशुमारी हुई. हर वार्ड से तीन नामों का पैनल तैयार किया गया. प्रदेश स्तर पर स्क्रीनिंग हुई. लेकिन जब टिकट बांटने की बारी आई तो संगठन पीछे और जनप्रतिनिधि आगे नजर आए. कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. टिकट की सूची जारी होने के बाद भी कुछ वार्डों में सिंबल को लेकर आखिरी वक्त तक खींचतान चलती रही. वार्ड 76 इसका सबसे बड़ा उदाहरण बन गया जहां भाजपा के दो प्रत्याशी सामने आ गए.
विधायकों की पसंद से विकल्प खत्म
भाजपा ने जयपुर के 150 वार्डों के टिकट के लिए शुरुआत में संगठनात्मक प्रक्रिया अपनाई. शहर संगठन ने वार्डवार तीन-तीन नामों के पैनल तैयार किए. इन नामों पर प्रदेश स्तर पर मंथन हुआ. लेकिन आखिरी दौर में कई विधानसभा क्षेत्रों में स्थानीय विधायकों की पसंद सबसे अहम हो गई. सूत्रों के मुताबिक कुछ विधायक सिंगल नाम लेकर पहुंचे और अपनी पसंद के उम्मीदवार को टिकट दिलाने पर अड़ गए. यानी जिस प्रक्रिया में संगठन ने तीन नामों का विकल्प तैयार किया था, अंतिम फैसले में कई जगह विकल्प ही खत्म हो गए.
मालवीय नगर विधानसभा क्षेत्र का वार्ड 76 इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प अध्याय है. भाजपा की घोषित सूची में पूर्व डिप्टी मेयर पुनीत कर्णावट का नाम आया, लेकिन इसके बाद विधायक कालीचरण सराफ की तरफ से कुलदीप मिश्रा को भाजपा का सिंबल दे दिया गया. कुलदीप मिश्रा ने उसी सिंबल पर नामांकन भी दाखिल कर दिया. दूसरी तरफ कर्णावट भी पार्टी के घोषित प्रत्याशी के रूप में मैदान में थे.

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यानी एक ही वार्ड में भाजपा के दो प्रत्याशी भाजपा के सिंबल के साथ खड़े हो गए. मामला प्रदेश नेतृत्व तक पहुंचा. इसके बाद कर्णावट के नाम से दोबारा सिंबल जारी किया गया. सराफ की तरफ से सफाई दी गई कि पहले कुलदीप मिश्रा का नाम तय था और प्रत्याशी बदलने से पहले ही उन्हें सिंबल दिया जा चुका था, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया. प्रदेश की सूची और स्थानीय स्तर पर सिंबल जारी करने के बीच आखिर इतना बड़ा अंतर कैसे रह गया.
जयपुर के कई क्षेत्र की कहानी की चर्चा
जयपुर में डिप्टी सीएम दिया कुमारी और कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ के विधानसभा क्षेत्रों की टिकट कहानी भी पार्टी के भीतर चर्चा में रही. सूत्रों के मुताबिक, दोनों नेता अपने क्षेत्रों के टिकटों को लेकर अपनी पसंद के नामों के साथ पहुंचे. संगठन की तरफ से तीन नामों के पैनल की प्रक्रिया पर जोर था, लेकिन दोनों नेताओं ने अपने विधानसभा क्षेत्रों में अपनी पसंद के उम्मीदवारों को लेकर स्पष्ट रुख रखा.

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इन क्षेत्रों में आखिरी फैसलों में जनप्रतिनिधियों की पसंद को खासा महत्व मिलने की चर्चा है. जयपुर की सिविल लाइंस विधानसभा सीट में टिकट वितरण के बाद एक अलग मोर्चा खुल गया. सूत्रों के मुताबिक कुछ वार्डों के टिकटों को लेकर विधायक गोपाल शर्मा और पार्टी के दूसरे नेताओं के बीच सहमति नहीं बन पाई. इसके बाद गोपाल शर्मा की नाराजगी की चर्चा तेज हुई. सिविल लाइंस के कुछ वार्डों के सिंबल को लेकर आखिरी समय तक तस्वीर साफ नहीं होने से यह मामला और गंभीर नजर आया.
मालवीय नगर में कालीचरण सराफ की भूमिका ने भी इस बहस को हवा दी. सराफ सरकार के वरिष्ठ विधायकों में हैं. टिकट वितरण में स्थानीय विधायक की भूमिका को नजरअंदाज करना आसान नहीं था. इस पूरी सूची में पूर्व महापौर कुसुम यादव का टिकट कटना भी महत्वपूर्ण है. कुसुम यादव जयपुर की महापौर रह चुकी हैं, लेकिन इस बार भाजपा ने उन्हें पार्षद का टिकट नहीं दिया. उनकी जगह संगठन से जुड़े सुनील कोठारी को मैदान में उतारा गया.
टिकट बंटवारे के बाद नई चुनौती
यानी भाजपा ने इस बार सिर्फ नए चेहरों को मौका नहीं दिया, बल्कि पिछली व्यवस्था के कई चर्चित चेहरों को भी बाहर का रास्ता दिखाया. भाजपा के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती टिकट बांटने के बाद की है. जिन नेताओं की पसंद के उम्मीदवारों को टिकट नहीं मिला, उन्हें साथ रखना होगा. जिन दावेदारों ने टिकट की उम्मीद में मेहनत की, उन्हें बगावत से रोकना होगा और जिन विधायकों ने अपनी पसंद के उम्मीदवारों के लिए ताकत लगाई, उनके साथ संगठन का तालमेल भी बनाए रखना होगा.
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