राजस्थान में निकाय चुनाव के पहले चरण का मतदान खत्म होते ही अब सियासत का अगला दौर शुरू हो गया है. ईवीएम में प्रत्याशियों की किस्मत बंद होने के साथ ही भाजपा और कांग्रेस ने संभावित नतीजों के हिसाब से अपने पार्षद प्रत्याशियों को संभालने की कवायद शुरू कर दी है. खासतौर पर उन नगरीय निकायों पर नजर है, जहां मुकाबला कांटे का रहने और बोर्ड गठन के लिए एक-एक पार्षद महत्वपूर्ण होने की संभावना है.
रिसॉर्ट पॉलिटिक्स का दौर शुरू
राजस्थान में बाड़ेबंदी यानी रिसॉर्ट पॉलिटिक्स का दौर शुरू हो गया है. दोनों दल अपने संभावित विजेता पार्षदों को एकजुट रखने के साथ मजबूत निर्दलीय और बागी प्रत्याशियों पर भी नजर बनाए हुए हैं. 14 सितंबर को मतगणना के बाद कई निकायों में बोर्ड बनाने के लिए संख्या का गणित सामने आएगा, और इसके बाद राजनीतिक जोड़-तोड़ और तेज होने की संभावना है.
‘प्रशिक्षण वर्ग' और ‘धर्म यात्रा' का दिया नाम
भाजपा ने जयपुर देहात में मतदान के तुरंत बाद ही पार्षद प्रत्याशियों को लेकर अपनी कवायद शुरू कर दी है. पार्टी ने बाड़ेबंदी को सीधे तौर पर बाड़ेबंदी कहने के बजाय ‘प्रशिक्षण वर्ग' और ‘धर्म यात्रा' का नाम दिया है.
प्रमुख चेहरों को होटल में ठहराया
जयपुर देहात उत्तर जिले में तीन स्थानों पर प्रशिक्षण वर्ग की तैयारी की गई है. मनोहरपुर और शाहपुरा में पार्षद प्रत्याशी रहे सभी प्रमुख चेहरों को होटल में ठहराया गया है. चौमू और कालाडेरा में भी दो दिन बाद प्रशिक्षण वर्ग शुरू करने की तैयारी है. प्रशिक्षण वर्ग में चुनाव की समीक्षा के साथ संगठन से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा होगी.
कामकाज को लेकर फीडबैक लेंगे
प्रत्याशियों से वार्ड में पार्टी कार्यकर्ताओं के कामकाज को लेकर फीडबैक लिया जाएगा. चुनाव के दौरान प्रमुख नेताओं से मिली मदद और स्थानीय स्तर पर सामने आई कमियों पर भी चर्चा होगी. जयपुर देहात दक्षिण में भी भाजपा ने इसी तरह की तैयारी शुरू कर दी है. जिलाध्यक्ष राजेश गुर्जर की निगरानी में प्रशिक्षण वर्ग और धर्म यात्रा की योजना बनाई गई है.
धार्मिक स्थलों के दर्शन कराने की योजना
जोबनेर, रेनवाल, फुलेरा, सांभर, नरैना, दूदू, फागी, बगरू, वाटिका, कानोता, बस्सी और चाकसू में पार्षद प्रत्याशियों के प्रशिक्षण वर्ग शुरू किए गए हैं. भाजपा की ओर से इन प्रत्याशियों को धर्म यात्रा पर ले जाने की भी तैयारी है, इसमें पुष्कर सरोवर, ब्रह्म मंदिर, सवाई माधोपुर का त्रिनेत्र गणेश मंदिर, खाटूश्यामजी और सालासर बालाजी सहित दूसरे धार्मिक स्थलों के दर्शन कराए जाने की योजना है.
इन प्रशिक्षण वर्गों में सिर्फ प्रत्याशियों को एक साथ रखने की कवायद नहीं होगी. पार्टी चुनाव के दौरान हुए कामकाज का फीडबैक भी लेगी. किस वार्ड में संगठन ने कितना काम किया, कार्यकर्ताओं की सक्रियता कैसी रही, प्रमुख नेताओं से कितनी मदद मिली और कहां कमी रह गई, इन मुद्दों पर चर्चा की जाएगी.
प्रत्याशियों की राय भी ली जाएगी
साथ ही आगे पार्टी के कामकाज को लेकर प्रत्याशियों की राय भी ली जाएगी. मतगणना के दौरान क्या सावधानियां रखनी हैं, और पूरी प्रक्रिया में प्रत्याशियों व कार्यकर्ताओं की भूमिका क्या होगी, इसे लेकर भी प्रशिक्षण दिया जाएगा. यानी भाजपा की कवायद में चुनावी समीक्षा, संगठन का फीडबैक, मतगणना की तैयारी और संभावित बोर्ड गठन की रणनीति एक साथ शामिल है.
संवेदनशील निकायों में बाड़ेबंदी की तैयारी
भाजपा के साथ कांग्रेस ने भी संवेदनशील निकायों की पहचान शुरू कर दी है. पार्टी की रणनीति है कि जहां मुकाबला बेहद करीबी है, वहां मतदान के तुरंत बाद ही प्रत्याशियों को एकजुट किया जाए. दूसरे निकायों में मतगणना से ठीक पहले बाड़ेबंदी की जा सकती है. जरूरत पड़ने पर प्रत्याशियों को राजस्थान से बाहर ले जाने का विकल्प भी रखा गया है. कांग्रेस की कोशिश है कि परिणाम आने के बाद क्रॉस वोटिंग या राजनीतिक सेंधमारी की स्थिति न बने और उसके संभावित विजेता पार्षद एकजुट रहें.
निर्दलीय और बागी प्रत्याशी होंगे सबसे अहम
इस चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के अलावा मजबूत निर्दलीय और बागी उम्मीदवारों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है. कई निकायों में अगर दोनों प्रमुख दल बहुमत के आंकड़े से दूर रहते हैं तो निर्दलीय पार्षद बोर्ड गठन में निर्णायक हो सकते हैं. ऐसे में नतीजों के बाद दोनों दलों की नजर इन पार्षदों पर रहेगी.
खास तौर पर वे निर्दलीय या बागी उम्मीदवार जो अपने वार्ड में मजबूत स्थिति में हैं, उनके समर्थन को लेकर राजनीतिक संपर्क बढ़ सकता है. एक पार्षद का समर्थन भी किसी निकाय में बोर्ड की पूरी तस्वीर बदल सकता है.यही वजह है कि दोनों दल पहले से संभावित समीकरणों पर नजर रख रहे हैं.
ठिकाने बदलने तक की तैयारी
बाड़ेबंदी के दौरान पार्षदों के बाहरी संपर्क को सीमित रखने की रणनीति भी बनाई गई है. संभावित तौर पर स्मार्टफोन जमा करवाकर सिर्फ सीमित संपर्क के लिए साधारण फोन की अनुमति दी जा सकती है. पार्षदों को एक ही होटल या रिसोर्ट में लंबे समय तक रखने के बजाय 36 से 48 घंटे में ठिकाना बदलने की रणनीति पर भी काम किया जा रहा है. इसका मकसद बाहरी संपर्क और संभावित राजनीतिक सेंधमारी को रोकना है. महिला प्रत्याशियों को अपने साथ परिवार के एक सदस्य को रखने की छूट दिए जाने की भी तैयारी है.
14 सितंबर को आएगा फैसला
14 सितंबर को मतगणना के बाद तस्वीर साफ होगी. इसके बाद बाड़ेबंदी का फोकस भी बदल जाएगा. जो प्रत्याशी चुनाव हार जाएंगे, उन्हें बाड़ेबंदी से बाहर किया जा सकता है, जबकि जीतने वाले पार्षदों को बोर्ड गठन तक साथ रखने की रणनीति अपनाई जाएगी. यहीं से असली सियासी गणित शुरू होगा. किस दल के पास कितनी सीटें हैं, कितने निर्दलीय जीते हैं और कौन से बागी पार्षद किसके साथ जा सकते हैं, इन सबका हिसाब लगाया जाएगा.
20 सितंबर को अध्यक्ष और महापौर पद का चुनाव
नतीजे आने के बाद भी राजनीतिक दलों को तुरंत राहत नहीं मिलेगी. बोर्ड गठन की प्रक्रिया के दौरान पार्षदों को एकजुट रखना सबसे बड़ी चुनौती होगी. 20 सितंबर को महापौर, सभापति और अध्यक्ष पद के लिए चुनाव होगा. इसके बाद 21 सितंबर को उपमहापौर, उपसभापति और उपाध्यक्ष पद के चुनाव के साथ बोर्ड गठन की प्रक्रिया पूरी होगी. यानी 14 सितंबर को मतगणना से लेकर 21 सितंबर तक राजस्थान के नगरीय निकायों में सियासी गतिविधियां लगातार तेज रहने वाली हैं.
दलों के लिए असली परीक्षा अब शुरू
पहले चरण का मतदान खत्म होने के साथ चुनाव का एक हिस्सा पूरा हो गया है, लेकिन राजनीतिक दलों के लिए असली परीक्षा अब शुरू हुई है. दूसरे चरण की वोटिंग और फिर ईवीएम खुलने के बाद सीटों का आंकड़ा सामने आएगा, लेकिन कई निकायों में बोर्ड का फैसला सिर्फ भाजपा या कांग्रेस की जीती हुई सीटों से नहीं होगा. निर्दलीय और बागी पार्षदों का समर्थन, क्रॉस वोटिंग की आशंका और आखिरी समय तक खेमे में बनाए रखने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी.
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