राजस्थान के शहरी निकाय चुनाव पूरे हो चुके हैं. प्रदेश में भाजपा को बड़ी सफलता मिली है. प्रदेश के 10 नगर निगमों में से 9 में भाजपा का बोर्ड बना है. वहीं, सभी निकायों की बात करें तो 204 निकायों में भाजपा ने बोर्ड बनाया है. कांग्रेस केवल 96 निकायों में ही बोर्ड बना पाई है. भाजपा ने पूरे प्रदेश के साथ-साथ आदिवासी अंचल में भी अपने प्रदर्शन से सभी को चौंका दिया है. प्रदेश के आदिवासी बहुल जिलों बांसवाड़ा, डूंगरपुर और प्रतापगढ़ में भाजपा ने बेहतर प्रदर्शन किया. तीनों जिलों की 9 निकायों में से 7 में भाजपा का बोर्ड बना.
बांसवाड़ा की 3 निकायों में से भाजपा ने 2 और कांग्रेस ने 1 निकाय में जीत दर्ज की. डूंगरपुर की दोनों निकायों में भाजपा को सफलता मिली. वहीं, प्रतापगढ़ की 4 निकायों में से 3 में भाजपा और 1 में कांग्रेस ने जीत हासिल की.
केवल राजनीतिक नहीं, वैचारिक भी है बढ़त
भाजपा की इस जीत और आदिवासी अंचल में बढ़ते वोट शेयर को केवल राजनीतिक रणनीति के रूप में नहीं देखा जा सकता. भारतीय जनता पार्टी संगठन के स्तर पर लगातार मजबूती से काम कर रही है. वहीं, आदिवासी अंचलों में आरएसएस से जुड़े वनवासी कल्याण परिषद भाजपा को वैचारिक आधार देने का काम कर रहे हैं.
आदिवासी समाज को मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिश
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि आदिवासी अस्मिता, अलग प्रदेश, अलग धर्म और धर्मांतरण जैसे मुद्दों के बीच वनवासी कल्याण परिषद आदिवासी समाज को मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास करती है. भाजपा की आदिवासी क्षेत्रों में बढ़त को केवल चुनावी सफलता नहीं माना जा सकता.
इसका एक पक्ष यह भी है कि आदिवासियों को हिंदुत्व, विकास और राष्ट्रीयता जैसे मुद्दों से जोड़ने की कोशिश की जा रही है. लंबे समय से आदिवासी इलाकों में मिशनरियों के प्रभाव को कम करने की चर्चा होती रही है. एक वर्ग आदिवासियों को हिंदू समाज से अलग पहचान के रूप में प्रस्तुत करता रहा है. राजस्थान में वर्ष 2018 में गुजरात से आई भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) और बाद में उससे बनी भारत आदिवासी पार्टी ने अलग भील प्रदेश की मांग जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया. क्षेत्र में पहले से ही धर्मांतरण का मुद्दा भी चर्चा का विषय रहा है.
शिक्षा और खेल के जरिए पहुंच
वनवासी कल्याण परिषद, डूंगरपुर के संगठन महामंत्री बताते हैं कि परिषद जनजातीय और गरीब वर्ग के युवाओं को अच्छी शिक्षा तथा खेलों में आगे बढ़ने के लिए सहयोग करती है ताकि वे रोजगार और नौकरी के अवसर हासिल कर सकें. उन्होंने बताया कि शाम के समय तीरंदाजी की शाखाएं संचालित होती हैं, जहां बच्चे और युवा अभ्यास करते हैं. इसके माध्यम से कई खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचे हैं और आगे चलकर नौकरियां भी प्राप्त कर रहे हैं.
संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने का प्रयास
भारत आदिवासी पार्टी (बाप) पर पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि बाप इस क्षेत्र में एक तीसरी राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरी है. पार्टियां आती-जाती रहती हैं. उन्होंने कहा कि कल्याण आश्रम ने गांवों में विद्यालय, संस्कार केंद्र और छात्रावास स्थापित किए हैं. एक समय धर्मांतरण की घटनाएं अधिक चर्चा में थीं. ऐसे में भजन मंडली और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों को अपनी संस्कृति, परंपरा और संस्कारों से जोड़ने का प्रयास किया गया. उनका कहना है कि कुछ युवा भ्रमित हो सकते हैं, लेकिन राजनीतिक गतिविधियां उनके संगठन का विषय नहीं हैं. उनका उद्देश्य केवल शिक्षा, जागरूकता और सामाजिक विकास है.
विद्यार्थियों को मिल रहा सहारा
आश्रम में पढ़ने वाले अनीस ने बताया कि वहां रहकर पढ़ाई की सुविधा मिलती है. छात्रों को योग और विभिन्न खेलों का प्रशिक्षण भी दिया जाता है. उन्होंने बताया कि वह पिछले छह वर्षों से आश्रम में रह रहे हैं. अनीस के अनुसार उनसे पहले कई छात्र यहां से पढ़कर अच्छी नौकरियों और संस्थानों तक पहुंचे हैं. आश्रम की वजह से पढ़ाई, रहने और खाने के खर्च की चिंता नहीं रहती. उनके जैसे परिवारों के लिए अपने स्तर पर ऐसी सुविधाएं जुटा पाना आसान नहीं होता.
भाजपा को मिल रहा वैचारिक लाभ
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि वनवासी कल्याण परिषद अपने सामाजिक और जनहित के कार्यों के माध्यम से आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़े रखने का प्रयास करती है. यही वैचारिक मजबूती भाजपा के लिए राजनीतिक समर्थन में बदलती दिखाई देती है.
शहरी निकाय चुनाव में भाजपा ने आदिवासी अंचल में अच्छा प्रदर्शन किया है. प्रदेश में अब पंचायतीराज चुनाव प्रस्तावित हैं और सभी राजनीतिक दल तैयारियों में जुट गए हैं. अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या शहरी निकाय चुनावों में मिली भाजपा की बढ़त आदिवासी बहुल ग्रामीण क्षेत्रों में भी उसी तरह कायम रह पाएगी या नहीं. इसी पर आने वाले चुनावों की दिशा काफी हद तक निर्भर करेगी.
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