महाराष्ट्र की राजनीति में एक हादसा सब कुछ बदल गया. बुधवार (28 जनवरी 2026) को बारामती एयरपोर्ट के पास Learjet 45 विमान क्रैश में एनसीपी प्रमुख और उपमुख्यमंत्री अजित पवार की मौत हो गई. विमान में सवार पायलट, को-पायलट, पीएसओ और फ्लाइट अटेंडेंट समेत सभी पांच लोगों की जान चली गई. अजित पवार महायुति सरकार में फाइनेंस, प्लानिंग जैसे महत्वपूर्ण विभाग संभालते थे और एनसीपी (अजित गुट) के सबसे मजबूत चेहरे थे.
मौत के चार दिन बाद कुर्सी की जंग शुरू
मौत के महज चार दिन बाद (शनिवार, 31 जनवरी 2026) शाम 5 बजे उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार महाराष्ट्र की पहली महिला उपमुख्यमंत्री बनकर शपथ लेने वाली हैं. एनसीपी विधायक दल की बैठक में उन्हें एनसीपी अध्यक्ष, विधायक दल नेता और उपमुख्यमंत्री पद सौंपा गया. वे अजित के सभी मंत्रालयों की प्रभारी रहेंगी (वित्त छोड़कर, जो अब सीएम देवेंद्र फडणवीस के पास रहेगा). प्रफुल्ल पटेल, छगन भुजबल, सुनील तटकरे जैसे दिग्गज नेताओं ने यह फैसला लिया और सुनेत्रा को ऑनलाइन बैठक में राजी किया गया. लेकिन यह जल्दबाजी क्यों? शोक की छाया में, अंतिम संस्कार की राख ठंडी होने से पहले कुर्सी की यह बेताबी?
पीछे की कहानी: एनसीपी विलय का डर
अजित पवार की मौत से पहले दोनों एनसीपी गुटों (अजित गुट और शरद पवार गुट) के विलय की बातें तेज थीं. 17 जनवरी को अजित और शरद पवार की बैठक हुई थी. शरद पवार ने शनिवार को बारामती प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुलासा किया कि अजित की इच्छा थी कि दोनों गुट एक हों. 12 फरवरी को ऐलान होना था. जयंत पाटिल, शशिकांत शिंदे और अजित ने बात शुरू की थी. दुर्भाग्य से हादसा हो गया.' शरद ने कहा, 'अब भी हम चाहते हैं कि एकीकरण हो.' अजित गुट के नेताओं को डर सता रहा है. अगर विलय हुआ तो कमान पूरी तरह शरद पवार के हाथ में चली जाएगी.
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अजित के साथ आए कई नेता (जिन्हें CBI, ED, ACB जांचों से राहत मिली थी) अपनी सत्ता और सुरक्षा खो सकते हैं. महायुति गठबंधन टूट सकता है, क्योंकि शरद पवार ने स्पष्ट कहा है कि वे BJP के साथ नहीं जाएंगे.
इसलिए अजित गुट ने तुरंत सुनेत्रा पवार को आगे किया. वे परिवार की सदस्य हैं, विधायकों में स्वीकार्य हैं और 'बाइंडिंग फोर्स' बन सकती हैं. ताकि विधायक शरद गुट की ओर न खिंचें. सुनेत्रा राजनीति में नई हैं (2024 में बारामती से चुनाव हारी थीं), इसलिए दिग्गज उन्हें आसानी से प्रभावित कर सकते हैं.
शरद पवार की नाराजगी
शरद पवार ने स्पष्ट कहा, 'सुनेत्रा की शपथ की मुझे मीडिया से पता चला. परिवार से कोई चर्चा नहीं. प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे ने फैसला लिया.' उन्होंने परिवार की अनदेखी पर नाराजगी जताई. पार्थ पवार (अजित के बेटे) ने भी शरद से मुलाकात की, लेकिन फैसला पहले ही हो चुका था. सुप्रिया सुले और सुनेत्रा के बीच पुरानी चुनावी रंजिश भी अब परिवार की विरासत की लड़ाई में बदल सकती है.
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क्या है असली खेल?
अजित गुट: सत्ता बचाने और विलय रोकने की कोशिश में जुटा है. सुनेत्रा को 'ढाल' बनाकर अलग अस्तित्व बचाना पार्टी के लिए चुनौती है.
शरद गुट: विलय की उम्मीद में बैठा था. लेकिन अब हादसे ने सब रोक दिया. शरद पवार कहते हैं, 'अजित की इच्छा पूरी होनी चाहिए.'
महाराष्ट्र की राजनीति में यह ट्रेजडी सिर्फ एक हादसा नहीं- बल्कि पावर, परिवार और विरासत का नया अध्याय है. सुनेत्रा की शपथ एक नई शुरुआत है, लेकिन पुरानी रणनीतियों के साथ. क्या विलय होगा या टूट और गहराएगी? ये तो आने वाले हफ्ते बताएंगे.
सत्ता और कानूनी पेचीदगियों का डर
एक अन्य कारण भी है जिससे अजित पवार की एनसीपी के नेता एकीकरण से घबराए हुए हैं. शरद पवार ने हाल ही में स्पष्ट किया था कि वे किसी भी स्थिति में भाजपा के साथ नहीं जाएंगे. इससे यह अंदेशा पैदा हो गया कि एकीकृत एनसीपी केंद्र में एनडीए और राज्य में महायुति गठबंधन से अलग हो सकती है. ऐसी स्थिति में इन नेताओं के हाथ से सत्ता जा सकती है. गौरतलब है कि इनमें से कई नेता महायुति में शामिल होने से पहले सीबीआई, ईडी और एंटी-करप्शन ब्यूरो जैसी जांच एजेंसियों की जांच के दायरे में थे. गठबंधन में शामिल होने के बाद उन्हें न केवल सत्ता मिली, बल्कि कानूनी मामलों में भी राहत मिली. इन नेताओं को डर है कि यदि पार्टी महायुति से बाहर निकली, तो उनकी कानूनी मुश्किलें दोबारा शुरू हो सकती हैं. दूसरी ओर, सुनेत्रा पवार राजनीति में अपेक्षाकृत नई हैं. उन्होंने 2024 में अपनी ननंद सुप्रिया सुले के खिलाफ बारामती से लोकसभा चुनाव लड़कर राजनीति में कदम रखा था, जिसमें उन्हें असफलता मिली थी. ऐसे में दिग्गज नेताओं को लगता है कि यदि सुनेत्रा पार्टी के शीर्ष पर रहती हैं, तो उनके फैसलों को प्रभावित करना और अपना वर्चस्व बनाए रखना आसान होगा.
शरद पवार की अनदेखी और भविष्य की आशंकाएं
दिलचस्प बात यह है कि सुनेत्रा पवार को ये जिम्मेदारियां सौंपने के फैसले में शरद पवार को शामिल नहीं किया गया. शनिवार सुबह बारामती में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने नाराजगी भरे स्वर में कहा कि यह फैसला प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे ने लिया है और उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई. सुनेत्रा पवार के चयन की प्रक्रिया से शरद पवार को दूर रखने ने एनसीपी नेताओं की मंशा पर सवाल खड़े कर दिए हैं. माना जा रहा है कि इसके पीछे दोनों पार्टियों के विलय का वह फैसला है जो 17 जनवरी को शरद पवार और अजीत पवार की बैठक में लिया गया था और जिसका औपचारिक ऐलान 12 फरवरी को होना था. दिग्गज नेताओं को आशंका है कि यदि पार्टी फिर से एक हुई, तो उसमें शरद पवार के प्रति वफादार रहे नेताओं का दबदबा बढ़ जाएगा और अजीत पवार के साथ आए नेताओं की अहमियत कम हो जाएगी.
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