- NCP में अजित पवार के निधन के बाद नेतृत्व परिवर्तन को लेकर कानूनी और संगठनात्मक विवाद अब गहरा गया है
- सच्चिदानंद सिंह ने सुनेत्रा पवार के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाने की प्रक्रिया पर उल्लंघन का आरोप लगाया है
- नोटिस में प्रफुल पटेल को अंतरिम राष्ट्रीय अध्यक्ष मानने की मांग और सुनेत्रा पवार के चुनाव को अवैध बताया गया है
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) में अजित पवार के निधन के बाद शुरू हुआ नेतृत्व परिवर्तन अब खुली अंदरूनी खींचतान में बदलता दिखाई दे रहा है. पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष और महाराष्ट्र की उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार को पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं राष्ट्रीय सचिव सच्चिदानंद सिंह द्वारा भेजे गए सात पन्नों के कानूनी नोटिस ने NCP के भीतर चल रहे सत्ता संघर्ष को सार्वजनिक कर दिया है.
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका समय है. यह कानूनी नोटिस ऐसे समय सामने आया है जब महाराष्ट्र के राजनीतिक गलियारों में शरद पवार की NCP (SP) के NDA के करीब आने या भविष्य में किसी नए राजनीतिक समीकरण का हिस्सा बनने की अटकलें तेज हैं. हाल ही में शरद पवार का महाराष्ट्र विधानसभा पहुंचकर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे से मुलाकात करना और बदलते राजनीतिक घटनाक्रमों ने इन चर्चाओं को और हवा दी है. हालांकि, इन अटकलों की किसी भी पक्ष की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है. हालांकि सुनेत्रा पवार से जब पूछा गया कि क्या उनकी पार्टी में कोई फूट है, तो उन्होंने कहा कि तत्करे साहब इस पर बात करेंगे.
#WATCH | Mumbai | On being asked if there is a split in her party, NCP President & Maharashtra Deputy CM Sunetra Pawar says, "Tatkare Sahib will be speaking on it." pic.twitter.com/CqskfuosZh
— ANI (@ANI) July 14, 2026
क्या है कानूनी नोटिस का पूरा मामला?
सच्चिदानंद सिंह द्वारा भेजे गए सात पन्नों के कानूनी नोटिस में दावा किया गया है कि 26 फरवरी 2026 को आयोजित राष्ट्रीय अधिवेशन में सुनेत्रा पवार को राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाने की पूरी प्रक्रिया पार्टी के संविधान के अनुरूप नहीं थी. नोटिस में आरोप लगाया गया है कि अजित पवार के निधन के बाद पार्टी के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रफुल पटेल को अंतरिम राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी संभालनी चाहिए थी. लेकिन ऐसा किए बिना राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाया गया और अध्यक्ष पद का चुनाव कराया गया.
नोटिस में केवल सुनेत्रा पवार के चुनाव पर ही सवाल नहीं उठाए गए, बल्कि राष्ट्रीय अधिवेशन की वैधता को भी चुनौती दी गई है. दावा किया गया है कि अधिवेशन बुलाने, प्रतिनिधियों को सूचना देने, चुनाव प्रक्रिया संचालित करने और अध्यक्ष घोषित करने तक पार्टी संविधान के अनिवार्य प्रावधानों का पालन नहीं किया गया.
सुनेत्रा पवार के चुनाव पर सवाल
नोटिस में मांग की गई है कि सुनेत्रा पवार का चुनाव "अवैध, शून्य और अस्तित्वहीन" घोषित किया जाए, राष्ट्रीय कार्यकारिणी के पुनर्गठन को निरस्त किया जाए और पार्टी संविधान के अनुसार नए सिरे से राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव कराया जाए. बता दें कि यह कानूनी नोटिस केवल सुनेत्रा पवार को ही नहीं, बल्कि कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रफुल पटेल और राष्ट्रीय महासचिव और चुनाव प्रक्रिया के नोडल अधिकारी बृजमोहन श्रीवास्तव को भी भेजा गया है.
कौन हैं सच्चिदानंद सिंह?
सच्चिदानंद सिंह NCP के पुराने और अनुभवी संगठनात्मक नेताओं में गिने जाते हैं. वे लंबे समय तक पार्टी के राष्ट्रीय सचिव रहे हैं और संगठन में पर्दे के पीछे रणनीतिक भूमिका निभाने वाले नेताओं में उनकी पहचान रही है. उनके द्वारा भेजा गया यह नोटिस केवल व्यक्तिगत असहमति नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर मौजूद एक प्रभावशाली वर्ग की नाराजगी का संकेत माना जा रहा है. खासतौर पर इसलिए क्योंकि नोटिस में सीधे तौर पर प्रफुल पटेल की भूमिका को संवैधानिक रूप से अधिक मजबूत बताया गया है.
क्या प्रफुल पटेल के समर्थन में खुला मोर्चा?
कानूनी नोटिस में स्पष्ट कहा गया है कि अजित पवार के निधन के बाद पार्टी का अंतरिम नेतृत्व प्रफुल पटेल के हाथों में होना चाहिए था. इसी वजह से राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज हो गई है कि पार्टी के भीतर एक धड़ा आज भी प्रफुल पटेल को संगठन के स्वाभाविक नेता के रूप में देखता है.
दिलचस्प बात यह है कि प्रफुल पटेल ने भी पहली बार सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि पार्टी के भीतर मतभेद हैं. उन्होंने कहा कि अजित पवार के निधन के बाद संगठन में जो परिस्थितियां बनी हैं, उन्हें देखते हुए पार्टी को "सुधारात्मक कदम " उठाने होंगे ताकि संगठन को और मजबूत बनाया जा सके. प्रफुल पटेल के इस बयान को पार्टी के भीतर मौजूद असंतोष की अप्रत्यक्ष स्वीकारोक्ति के रूप में देखा जा रहा है.
क्या पार्थ पवार की बढ़ती भूमिका भी बनी वजह?
NCP के भीतर चल रहे इस विवाद के पीछे एक और कारण की चर्चा लगातार हो रही है. पार्टी सूत्रों के हवाले से दावा किया गया है कि अजित पवार के निधन के बाद पार्थ पवार का संगठन और निर्णय प्रक्रिया में बढ़ता प्रभाव वरिष्ठ नेताओं के एक वर्ग को असहज कर रहा है.सूत्रों का कहना है कि कई पुराने नेताओं को लगता है कि संगठनात्मक फैसलों में उनकी भूमिका पहले की तुलना में कम हो गई है. हालांकि, पार्टी की ओर से इस दावे की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है.
शरद पवार को लेकर अटकलों के बीच क्यों अहम है यह विवाद?
इस कानूनी नोटिस का महत्व केवल संगठनात्मक विवाद तक सीमित नहीं है. यह ऐसे समय सामने आया है जब महाराष्ट्र की राजनीति में नए राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चाएं तेज हैं.हाल के दिनों में शरद पवार की राजनीतिक सक्रियता, महाराष्ट्र विधानसभा में उनकी मौजूदगी, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे से मुलाकात तथा NDA को लेकर चल रही राजनीतिक चर्चाओं ने इस विवाद की टाइमिंग को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है.
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि शरद पवार या उनकी पार्टी की ओर से NDA में शामिल होने को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा या पुष्टि नहीं हुई है.
अब NCP के सामने सबसे बड़ी चुनौती
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि NCP इस कानूनी नोटिस का क्या जवाब देती है. क्या पार्टी इसे केवल कानूनी विवाद मानकर अदालत में जवाब देगी या संगठन के भीतर उठ रही नाराजगी को दूर करने के लिए कोई राजनीतिक और संगठनात्मक पहल करेगी? अगर इस विवाद का जल्द समाधान नहीं निकला तो यह केवल एक कानूनी लड़ाई नहीं रहेगा, बल्कि NCP के भीतर नेतृत्व और संगठन पर नियंत्रण की बड़ी लड़ाई का रूप ले सकता है.
फिलहाल इतना तय है कि अजित पवार के बाद NCP में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर उठे सवाल अब पूरी तरह सार्वजनिक हो चुके हैं. आने वाले दिनों में पार्टी की प्रतिक्रिया, प्रफुल पटेल की भूमिका, सुनेत्रा पवार की रणनीति और शरद पवार की अगली राजनीतिक चाल पर पूरे महाराष्ट्र की नजर रहेगी.
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