राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में दिवंगत अजित पवार की कमी को भरना आसान नहीं है. लेकिन पिछले कुछ महीनों में पार्टी के भीतर जिस नेता का प्रभाव लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है, वह हैं राज्यसभा सांसद पार्थ पवार. सार्वजनिक मंचों पर अपेक्षाकृत कम नजर आने वाले पार्थ अब संगठनात्मक फैसलों और राजनीतिक रणनीति के केंद्र में दिखाई दे रहे हैं. पार्टी के भीतर और राजनीतिक गलियारों में उन्हें अजित पवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने वाले चेहरे के तौर पर देखा जाने लगा है. हालांकि, उनके बढ़ते प्रभाव ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच नई राजनीतिक असहजता भी पैदा कर दी है.
सुनेत्रा पवार की सबसे मजबूत राजनीतिक ताकत?
अजित पवार के निधन के बाद घटनाक्रम तेजी से बदला. पहले उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार को महाराष्ट्र का उपमुख्यमंत्री बनाया गया और फिर उन्हें एनसीपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया. इसी दौरान पार्थ पवार को पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया, जबकि उनके भाई जय पवार को भी संगठन में अहम जिम्मेदारी दी गई. इन नियुक्तियों ने यह स्पष्ट संकेत दिया कि पवार परिवार पार्टी की कमान अपने हाथों में बनाए रखना चाहता है.
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पार्टी सूत्रों के मुताबिक, पार्थ पवार संगठनात्मक मामलों में लगातार सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं. समर्थकों का कहना है कि उनका काम करने का तरीका काफी हद तक उनके पिता अजित पवार जैसा है, कम बोलना, लेकिन फैसलों पर मजबूत पकड़ रखना. दूसरी ओर, पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं को उनका तेजी से बढ़ता प्रभाव सहज नहीं लग रहा है. माना जा रहा है कि यही वजह है कि प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे जैसे नेताओं के साथ मतभेदों की खबरें लगातार सामने आती रहती हैं.
सुनेत्रा पवार के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाने के बाद चुनाव आयोग को भेजे गए एक पत्र ने पार्टी के भीतर विवाद खड़ा कर दिया था. उस पत्र में वरिष्ठ नेताओं प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे के संगठनात्मक पदों का उल्लेख नहीं था. पार्टी ने इसे तकनीकी त्रुटि बताया, लेकिन राजनीतिक हलकों में यह चर्चा रही कि पत्र की रणनीति तैयार करने में पार्थ पवार की महत्वपूर्ण भूमिका थी. हालांकि, इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.
राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती भूमिका
सुनेत्रा पवार के नेतृत्व को कानूनी चुनौती मिलने के बाद कार्यकारी अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल ने सार्वजनिक रूप से कहा कि पार्टी को 'Corrective Steps' यानी सुधारात्मक कदम उठाने की जरूरत है. हालांकि बाद में उन्होंने पार्टी में किसी बड़े मतभेद से इनकार भी किया, लेकिन उनके बयान को पार्टी के भीतर बढ़ती असहजता का संकेत माना गया.

2019 के लोकसभा चुनाव में मावल लोकसभा सीट पर मिली हार के बाद पार्थ पवार ने खुद को सार्वजनिक राजनीति से कुछ दूरी पर रखा था. लेकिन अजित पवार के निधन के बाद उन्हें राज्यसभा भेजा गया. अब वे राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं. राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि भविष्य में केंद्र सरकार में मंत्री पद के लिए उनका नाम भी सामने आ सकता है, हालांकि इस पर कोई आधिकारिक संकेत नहीं है.
शरद पवार की पार्टी से रिश्ते बड़ी चुनौती
हाल ही में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से पार्थ पवार की मुलाकात ने महाराष्ट्र की राजनीति में नई चर्चाओं को जन्म दिया. खास बात यह रही कि इससे पहले प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे भी अलग-अलग मुख्यमंत्री से मिल चुके थे. इन बैठकों को एनसीपी के भीतर बदलते शक्ति संतुलन और नेतृत्व की खींचतान से जोड़कर देखा गया.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में पार्थ पवार की सबसे बड़ी चुनौती एनसीपी (शरद पवार) के साथ संबंधों को लेकर होगी. दोनों दलों के विलय की चर्चाएं पहले भी होती रही हैं. ऐसे में यदि भविष्य में दोनों गुटों के बीच कोई राजनीतिक समझौता या नई रणनीति बनती है तो उसमें पार्थ की भूमिका बेहद अहम मानी जाएगी.
पार्थ पवार का राजनीतिक सफर विवादों से भी अछूता नहीं रहा. 2019 में उन्होंने सुशांत सिंह राजपूत मामले में सीबीआई जांच की मांग कर राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी थीं. इसके अलावा पुणे भूमि सौदे से जुड़े आरोपों को लेकर भी उनका नाम राजनीतिक विवादों में आया. इन मामलों में उन्होंने किसी भी अनियमितता से इनकार किया है.हाल ही में उनकी सगाई की घोषणा भी चर्चा का विषय बनी. इससे पहले उनका निजी जीवन भी राजनीतिक सुर्खियों में आया.
क्या पार्थ पवार हैं एनसीपी का भविष्य?
अजित पवार के निधन के बाद एनसीपी में नेतृत्व का नया दौर शुरू हो चुका है. सुनेत्रा पवार पार्टी का औपचारिक चेहरा हैं, लेकिन संगठन के भीतर पार्थ पवार की सक्रियता लगातार बढ़ रही है. सवाल यह है कि क्या पार्टी का वरिष्ठ नेतृत्व उनके नेतृत्व को पूरी तरह स्वीकार करेगा या फिर आने वाले समय में एनसीपी के भीतर शक्ति संतुलन की लड़ाई और तेज होगी.
फिलहाल इतना तय है कि कम बोलने वाले पार्थ पवार अब महाराष्ट्र की राजनीति में एक ऐसे नेता के रूप में उभर रहे हैं, जिनकी हर राजनीतिक गतिविधि पर पार्टी के भीतर और बाहर समान रूप से नजर रखी जा रही है.
(डिस्क्लेमर: अभिषेक अवस्थी एनडीटीवी के संवाददाता हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)