Maratha Andolan: महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक चर्चाओं के केंद्र में आ गया है. मराठा आरक्षण आंदोलन के प्रमुख नेता मनोज जरांगे पाटील ने आज मराठा समाज की एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई है, जिसे भविष्य की रणनीति तय करने के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है. बैठक में हैदराबाद गजट, सातारा गजट, छात्रों के लंबित वैधता प्रमाणपत्र और आरक्षण से जुड़े अन्य मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है. ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि क्या महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण आंदोलन एक बार फिर तेज होने जा रहा है.
मराठा समाज की बैठक पर टिकी निगाहें
मनोज जरांगे पाटील की ओर से बुलाई गई इस बैठक को मराठा आंदोलन के अगले चरण की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है. आंदोलन से जुड़े सूत्रों के अनुसार बैठक में मराठा समाज की लंबित मांगों और सरकार की ओर से किए गए वादों की समीक्षा की जा सकती है. विशेष रूप से हैदराबाद गजट और सातारा गजट के आधार पर प्रमाणपत्र जारी करने, आरक्षण प्रक्रिया और छात्रों के लंबित वैधता प्रमाणपत्रों के मुद्दे प्रमुख रूप से उठ सकते हैं.
पहले भी दे चुके हैं बड़ा अल्टीमेटम
मई 2026 में मनोज जरांगे पाटील ने केंद्र और राज्य सरकार को चेतावनी देते हुए कहा था कि मराठा समाज की मांगें पूरी नहीं होने पर आंदोलन अपने तय कार्यक्रम के अनुसार आगे बढ़ेगा. उन्होंने कहा था कि मराठा समाज अपने बच्चों के भविष्य से समझौता नहीं करेगा और जरूरत पड़ने पर लोग "तूफान की तरह" सड़कों पर उतरेंगे. जरांगे ने आरोप लगाया था कि सरकार शिंदे समिति की सिफारिशों को लागू करने में देरी कर रही है और कई महत्वपूर्ण फैसले अब तक लंबित हैं.
इन मुद्दों को लेकर नाराजगी
जरांगे पाटील लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि मराठा समाज से जुड़े कई वादे अब तक पूरे नहीं हुए हैं. इनमें शिंदे समिति की सिफारिशें लागू करना, आंदोलनकारियों पर दर्ज मामलों को वापस लेना, सारथी योजना को प्रभावी बनाना और हैदराबाद गजट के आधार पर प्रमाणपत्र वितरण जैसे मुद्दे शामिल हैं. उनका कहना है कि छात्रों के भविष्य से जुड़े मामलों में देरी मराठा समाज के युवाओं को नुकसान पहुंचा रही है.
ओबीसी संगठनों की चेतावनी से बढ़ा विवाद
मराठा आरक्षण का मुद्दा केवल मराठा समाज तक सीमित नहीं है. जून 2026 में कई ओबीसी संगठनों और नेताओं ने सरकार को चेतावनी दी थी कि यदि मराठा समुदाय को ओबीसी श्रेणी में शामिल किया गया या 'सगे-सोयरे' अध्यादेश लागू किया गया, तो राज्यव्यापी आंदोलन और महाराष्ट्र बंद तक का आह्वान किया जा सकता है. ओबीसी नेताओं का दावा है कि ऐसा होने पर मौजूदा आरक्षण संरचना प्रभावित होगी और उनके समुदाय के अधिकारों पर असर पड़ेगा.
सरकार के सामने दोहरी चुनौती
एक ओर मराठा समाज आरक्षण और प्रमाणपत्रों से जुड़े मुद्दों के समाधान की मांग कर रहा है, वहीं दूसरी ओर ओबीसी संगठन किसी भी ऐसे कदम का विरोध कर रहे हैं जिससे उनके आरक्षण अधिकार प्रभावित हों. ऐसे में राज्य सरकार के सामने संतुलन बनाना बड़ी चुनौती बन गया है. आज होने वाली बैठक और उसके बाद मनोज जरांगे पाटील की प्रेस कॉन्फ्रेंस से यह संकेत मिल सकता है कि आने वाले दिनों में मराठा आंदोलन किस दिशा में आगे बढ़ेगा. फिलहाल महाराष्ट्र की राजनीति और सामाजिक संगठनों की नजरें इस बैठक पर टिकी हुई हैं, क्योंकि इसके नतीजे राज्य में आरक्षण की बहस को फिर से तेज कर सकते हैं.
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