बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने नागपुर के गवर्नमेंट डेंटल कॉलेज (GDC) द्वारा एक महिला डॉक्टर पर लगाए गए 23.58 लाख रुपये के जुर्माने को रद्द कर दिया है. अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के तहत मां और बच्चे दोनों के लिए 'जीवन का अधिकार' (Right to Life) सर्वोपरि है. गर्भावस्था और प्रसव के बाद चिकित्सा देखभाल एक मौलिक आवश्यकता है. कोर्ट ने कहा कि कोई भी सर्विस रूल, बॉन्ड या कॉन्ट्रैक्ट किसी महिला को मातृत्व अवकाश लेने से नहीं रोक सकता और न ही इसके लिए उसे दंडित किया जा सकता है.
जस्टिस अनिल किल्लोर तथा जस्टिस राज वाकोडे की बेंच ने यह फैसला सुनाया है. तमिलनाडु की डॉ मीनाक्षी मुठिया एम डी एस की डिग्री पूरी करने के बाद एक वर्ष के लिए अनिवार्य सेवा हेतु नागपुर की सरकारी डेंटल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में सहयोगी प्राध्यापक के तौर पर नियुक्त हुई थीं. उन्हें 13 दिसंबर 2023 से 12 दिसंबर 2024 तक सर्विस देना था.
लेकिन मातृत्व के चलते उन्हें वर्ष 2024में 1 मई से 30 सितंबर तक अवकाश लेना पड़ा. अवकाश से लौटने पर महाराष्ट्र के मेडिकल शिक्षा तथा संशोधन डायरेक्टोरेट ने उनका अवकाश काल सेवा काल में समाहित करने से इनकार कर दिया था. अनिवार्य मेडिकल सेवा के बॉन्ड के तहत मातृत्व अवकाश का कोई प्रावधान न होने से ऐसा किया गया तथा महाविद्यालय ने उनपर बड़ा जुर्माना लगाने का विवादित आदेश जारी किया था.
अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट रूप से कहा कि गर्भावस्था में मां और बच्चे के जीवित रहने का मौलिक अधिकार शामिल है. प्रसव के बाद मां और बच्चे को चिकित्सा उपचार और स्वास्थ्य जोखिमों से बचने के लिए पर्याप्त समय की आवश्यकता होती है. बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए मां का साथ अनिवार्य है. इसलिए, किसी भी नियोक्ता (Employer) को महिला कर्मचारी के अनुपस्थित रहने पर उसे दंडित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती.
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