- राज ठाकरे संग गठबंधन की वजह से मुंबई बीएमसी चुनाव में उद्धव ठाकरे को अपक्षा के मुताबिक वोट नहीं मिल सके.
- मुंबई के उत्तर भारतीय, मुस्लिम, गुजराती और मारवाड़ी वोटरों को गठबंधन केी वजहसे समर्थन नहीं मिल सका
- राज ठाकरे के लाउडस्पीकर विरोधी बयानबाजी और कट्टर मराठी विचारधारा ने मुस्लिम और अन्य समुदायों को दूर कर दिया
मुंबई बीएमसी चुनाव में उद्धव और राज ठाकरे का गठबंधन कुछ खास कमाल नहीं कर पाया. ऐसा लग रहा है कि गठबंधन का दांव उद्धव पर उल्टा पड़ गया है. ठाकरे की शिवसेना 66 सीटों पर बढ़त बनाए हुए हैं तो वहीं राज ठाकरे की एमएनएस सिर्फ 9 सीटों पर सिमटी दिखाई दे रही है. 2026 के बीएमसी चुनाव परिणाम ठाकरे बंधुओं की एक बड़ी गलती को उजागर करने वाले हैं. ऐसा लग रहा है कि एशिया के सबसे अमीर नगर निगम में "मराठी मानुष" का दांव कोई खास जादू नहीं दिखा सका.
1-सिंगल बास्केट ब्लंडर
एक कहावत है कि अपने सारे अंडे एक टोकरी में मत रखो. इस कहावत को नजरअंदाज करते हुए, उद्धव और राज ठाकरे ने अपनी पूरी रणनीति मराठी मतदाताओं पर केंद्रित कर दी. ठाकरे बंधुओं ने सिर्फ एक समुदाय पर ध्यान केंद्रित कर लिया. जिसकी वजह से मुंबई में रहने वाले दूसरे समुदायों ने उनसे दूरी बना ली.
2-महानगर की वास्तविकता की अनदेखी
मुंबई एक ऐसी जगह है, जहां अलग-अलग भाषा और जाति समुदाय के लोग रहते हैं. भले ही यहां पर मराठी वोट 35% है, जो कि काफी अहम है. लेकिन मराठी वोटर अकेे यहां बहुमत में नहीं हैं. बाकी बचे 65% लोग एमएनएस की उकसावे वाली बयानबाजी से अलग-थलग महसूस कर रहे थे.
3-बाकी मुंबई का गणित
मुंबई में 22% उत्तर भारतीय, 20% मुस्लिम और 18% गुजराती,मारवाड़ी हैं, जिनका हार जीत में अहम रोल होता है. ये लोग मिलकर मुंबई का भविष्य तय करते हैं. सिर्फ मराठी वोट बैंक इसके लिए नाकाफी है. राज ठाकरे की तरफ अपना इतना ज्यादा झुकाव दिखाकर उद्धव इन बड़े समुदायों के निशाने पर आ गए.
4-धर्मनिरपेक्ष कवच का खोना
कांग्रेस के साथ एमवीए गठबंधन में उद्धव ठाकरे की छवि उदार थी. एमवीए में अलग-अलग समुदाय उनको पसंद करते थे. लेकिन राज ठाकरे से हाथ मिलाने से उनकी ये उदारवादी छवि खत्म हो गई और कट्टरता वाला संदेश लोगों में गया. जिसकी वजह से गठबंधन लोगों को खास पसंद नहीं आया.
5-लाउडस्पीकर का मुद्दा
राज ठाकरे का मस्जिदों में लाउडस्पीकर के खिलाफ आक्रामक रुख 20% मुस्लिम मतदाताओं के लिए आज भी ताजा घाव बना हुआ है. 2024 के लोकसभा चुनावों में उद्धव का समर्थन करने वाले कई मुस्लिम वोटर्स उनका एमएनएस से हाथ मिलाना बर्दाश्त नहीं कर सके.
6-उत्तर और दक्षिण को अलग-थलग करना
उत्तर और दक्षिण भारतीयों के साथ राज ठाकरे और एमनएस का व्यवहार किसी से छिपा नहीं है. उद्धव ने राज ठाकरे संग गठबंधन करके इन समुदायों की एमएनएस के साथ पुराने मतभेदों की यादें ताजा कर दीं. राज की मराठी बनाम अन्य की सोच ने लोगों में डर का माहौल बना दिया. जिसकी वजह से इन लोगों को बीजेपी- शिंदे शिवसेना का ही विकल्प ज्यादा अच्छा लगा.
7-पहचान बनाम विकास
ठाकरे बंधुओं ने "मराठी गौरव" के नारे पर चुनाव प्रचार किया, जबकि महायुति गठबंधन ने बुनियादी ढांचे और विकास के नाम पर वोट मांगे. समझदार वोटर्स को लगा कि पहचान की लड़ाई से गड्ढों, पानी, पुनर्निर्माण, बुनियादी ढांचे और स्थानीय परिवहन जैसी रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता है.
8-एमवीए का जादू गायब
2024 के आम चुनावों में, यूबीटी-कांग्रेस-एनसीपी की तिकड़ी ने साबित कर दिया था कि वे मुंबई में एक साथ जीत हासिल कर सकते हैं. लेकिन कांग्रेस की समावेशी पहुंच की जगह एमएनएस के ध्रुवीकरण वाले ब्रांड ने पहले से इस गठबंधन को तोड़ दिया, जो लोगों को पसंद नहीं आया.
9-बीजेपी विरोधी वोटों का बंटवारा
शिवसेना यूबीटी और एमएनएस के एक साथ चुनाव लड़ने से कांग्रेस को अकेले चुनाव लड़ना पड़ा, जिससे बहुकोणीय मुकाबले हुए. इससे उपनगरों में विपक्षी वोट बंट गए, इसका फायदा बीजेपी और शिंदे सेना को प्रमुख वार्डों में मिला.
10-एक रणनीतिक आत्मघाती गोल
अंकगणित के बजाय खून के रिश्ते को चुनकर उद्धव ठाकरे ने भले ही परिवार में अपनी पकड़ मजबूत कर ली हो, लेकिन इस प्रक्रिया में उन्होंने मुंबई का ज्यादातर वोटबैंक खो दिया.
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