मुंबई की सत्ता के गलियारों में 'मराठी अस्मिता' के नाम पर दो दशक बाद जो 'ठाकरे जुगलबंदी' देखने को मिली थी, वह अब बीएमसी चुनाव के नतीजों के बाद अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है. जिस 'मराठी यूनाइटेड फ्रंट' ने भाजपा के अभेद्य दुर्ग को चुनौती देने का संकल्प लिया था, वह अब 'सुकृत उम्मीद' यानी स्वीकृत नगरसेवकों (Nominated Corporators) के पदों के आवंटन को लेकर उपजे गहरे असंतोष की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है.
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि यह केवल एक या दो सीटों का विवाद नहीं है, बल्कि यह 'असली ठाकरे' की विरासत और मुंबई के मराठी वोट बैंक पर वर्चस्व स्थापित करने की एक सोची-समझी बिसात है, जहां 'मातोश्री' और 'शिवतीर्थ' के बीच की दूरियां अब 'वोटों की दूरी' में तब्दील होती दिख रही हैं .
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इस 'सियासी संग्राम' की मुख्य जड़ बीएमसी के विधायी ढांचे के तहत नामित होने वाले 5 नगरसेवकों की सीटों का गणित है, जिसे तकनीकी भाषा में 'कोशेंट प्रणाली' कहा जाता है. शिवसेना (UBT) को अपनी 65 सीटों की बदौलत कम से कम 1 निश्चित और शेष मतों के आधार पर कुल 3 सीटों पर दावेदारी मिलने की संभावना बनी थी .
विवाद तब भड़का जब मात्र 6 सीटें जीतने वाली मनसे ने उद्धव ठाकरे से इन 3 सीटों में से 1 सीट की 'सियासी हिस्सेदारी' मांगी, लेकिन उद्धव ठाकरे ने अपने कैडर के हितों को सर्वोपरि रखते हुए इस पावर-शेयरिंग फॉर्मूले को सिरे से खारिज कर दिया.
सूत्रों का दावा है कि उद्धव ठाकरे ने साईनाथ दुर्गे, माधुरी मांजरेकर और कैलाश पाठक जैसे अपने कट्टर वफादारों के नाम इन पदों के लिए लगभग तय कर लिए हैं, जिसने राज ठाकरे के खेमे में यह संदेश दिया कि इस गठबंधन में उन्हें केवल 'जूनियर पार्टनर' के रूप में देखा जा रहा है.
आग में घी डालने का काम राज ठाकरे की मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के आधिकारिक आवास 'नंदनवन' में हुई हालिया 'सीक्रेट' मुलाकात ने किया. हालांकि राज ठाकरे ने इस भेंट को मुंबई के नागरिक मुद्दों और विकास से जुड़ी एक औपचारिक मुलाकात बताया है, वही शिंदे गुट की नेता शाइना एनसी ने बड़े ही कूटनीतिक अंदाज में कहा कि उनके नेता एकनाथ शिंदे का व्यक्तित्व ही ऐसा है कि हर कोई उनसे प्रभावित हो जाता है और यदि इस मुलाकात से ठाकरे भाइयों के बीच अड़चन आती है, तो यह उनका निजी मामला है कि उन्हें साथ रहना है या नही.
मनसे के भीतर उबल रहे इस गुस्से को पार्टी के वरिष्ठ नेता अविनाश अभ्यंकर के हालिया बयान ने और भी स्पष्ट कर दिया है, जिन्होंने संगठन के पुनर्गठन के लिए बुलाई गई एक उच्च स्तरीय बैठक के बाद सीधे तौर पर चेतावनी दी है. अभ्यंकर ने दोटूक शब्दों में कहा कि वर्तमान में जनता के मत को कोई महत्व नहीं दिया जा रहा है और 'हर चीज की एक एक्सपायरी डेट होती है', जो यूबीटी के साथ उनके मौजूदा गठबंधन के अंत की ओर इशारा करता नजर आया.
उन्होंने यह भी साफ किया कि स्वीकृत नगरसेवक की सीट लेने या न लेने का अंतिम निर्णय राज ठाकरे ही करेंगे, लेकिन पार्टी के भीतर यह भावना प्रबल है कि उन्हें वह सम्मान नहीं मिल रहा जिसके वे हकदार थे. इसी बीच, मनसे के मुंबई अध्यक्ष संदीप देशपांडे के व्हाट्सएप स्टेटस 'जिनका मन ही नहीं लगा सकते, उनसे दिल्लगी की क्या बात' ने इस सियासी खटास को सोशल मीडिया पर सार्वजनिक कर दिया है, जिसे उद्धव ठाकरे की 'संकीर्ण मानसिकता' पर एक कड़ा प्रहार माना जा रहा है .
दूसरी ओर, शिवसेना (UBT) इस डैमेज कंट्रोल में जुटी है और गठबंधन को अटूट दिखाने की कोशिश कर रही है. पार्टी प्रवक्ता आनंद दुबे ने दलील दी है कि उद्धव और राज दोनों ही बुद्धिमान और प्रगतिशील सोच रखने वाले नेता हैं जो छोटी-छोटी बातों पर मनमुटाव नहीं करते, और मराठी अस्मिता के लिए उनका साथ आगे भी बना रहेगा. दुबे का तर्क है कि किसी छोटे नेता के स्टेटस या तीखे बयान से इस ऐतिहासिक गठबंधन में दरार नहीं आने वाली है.
हालांकि, धरातल की हकीकत कुछ और ही बयां करती है, क्योंकि 2026 के बीएमसी परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भाजपा और शिंदे सेना का गठबंधन अब मुंबई का नया शक्ति केंद्र बनकर उभरा है . ऐसे में ठाकरे बंधुओं का यह बिखराव न केवल मराठी वोट बैंक को विभाजित करेगा, बल्कि 2029 के विधानसभा चुनावों के लिए भी एक नई और चुनौतीपूर्ण राजनीतिक पृष्ठभूमि तैयार करेगा.
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