- बॉम्बे हाईकोर्ट ने गणेशोत्सव में PoP से बनी मूर्तियों के विसर्जन पर सख्ती जताई
- अदालत ने स्पष्ट किया कि उनका मकसद धर्म में हस्तक्षेप नहीं बल्कि प्राकृतिक जलस्रोतों के प्रदूषण को रोकना है
- कोर्ट ने पूछा कि किस धर्मग्रंथमें लिखा है कि गणेश मूर्ति केवल प्लास्टर ऑफ पेरिस की होनी चाहिए
गणेशोत्सव के दौरान प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) से बनी मूर्तियों के विसर्जन का मामले पिछले 2 साल से बॉम्बे हाईकोर्ट में है.सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले में स्पष्ट रुख अपनाया है. कोर्ट ने पीओपी मूर्तिकार संगठन और अखिल गणेशोत्सव समिति की दलीलों पर अहम सवाल किए. जस्टिस अजय गडकरी और जस्टिस कमल खाता की बेंच ने साफ किया कि अदालत का मकसद किसी भी धार्मिक विधि या पूजा-पाठ में बाधा डालना नहीं है, बल्कि प्राकृतिक जलस्रोतों में होने वाले प्रदूषण को रोकना है.
गणेश मूर्ति पीओपी की हो, ये किस धर्मग्रंथ में लिखा है-HC
सुनवाई के दौरान समिति के वकील उदय वारुंजीकर ने तर्क दिया कि हिंदू धर्म में गणेश विसर्जन का विशेष महत्व है और विसर्जन न करना धर्मशास्त्र के खिलाफ होगा. इस पर कोर्ट ने पूछा, "हमें दिखाइए कि किस धर्मग्रंथ या फैसले में लिखा है कि गणेश मूर्ति पीओपी की ही होनी चाहिए या उसकी ऊंचाई इतनी ही होनी चाहिए?"
इस पर वारुंजीकर ने स्पष्ट किया कि भले ही ऐसा न लिखा हो, लेकिन यदि कोई कहता है कि गणेश मूर्ति का विसर्जन नहीं करना चाहिए, उसे समुद्र तक ले जाकर वापस ले आना चाहिए, तो यह भी उचित नहीं है. यह केवल कुछ लोगों का विचार हो सकता है, यह हिंदू धर्म का विचार नहीं है.

मुद्दे से मत भटकिए, बहस सिर्फ PoP की मूर्ति पर है
इस पर जस्टिस अजय गडकरी ने सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि, "आप यानी हिंदू धर्म नहीं हैं. आप भी केवल एक विशेष त्योहार मनाने वाले लोगों का एक समूह हैं. मुद्दे से मत भटकिए, केवल पीओपी के मुद्दे पर जिरह करें.” कोर्ट ने कहा कि पीओपी जलस्रोतों की जैव विविधता के लिए हानिकारक है या नहीं? इसका जवाब दें.

जलस्रोतों में मूर्ति विसर्जित से जीवों को नुकसान
अदालत ने कहा कि आपसे किसी ने यह नहीं कहा है कि आप अपने धार्मिक अनुष्ठानों में फूल, अगरबत्ती का इस्तेमाल न करें या पूजा-पाठ न करें. मुद्दा केवल 6 फीट से ऊंची पीओपी गणेश मूर्तियों को प्राकृतिक स्रोतों में विसर्जित करने का है. कोर्ट ने वकील को मुद्दा न भटकाने की हिदायत देते हुए कहा कि यह मामला केवल 6 फीट से ऊंची पीओपी मूर्तियों को प्राकृतिक जलस्रोतों में विसर्जित करने से जैव विविधता को होने वाले नुकसान को रोकने का है. अदालत ने कहा कि धर्म अपनी जगह है, लेकिन पर्यावरण का संरक्षण भी अनिवार्य है.
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