- बॉम्बे HC ने कहा शादीशुदा जिंदगी की मामूली नाराजगी तलाक का आधार नहीं हो सकती.
- कोर्ट ने 2003 में हुई शादी को खत्म करने की पति की अर्जी खारिज कर दी.
- कोर्ट ने पत्नी को हर महीने 5000 रुपये गुजारा-भत्ता देने के आदेश को बरकरार रखा.
बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने फैसला सुनाया है कि शादीशुदा जिंदगी में होने वाली मामूली नाराजगी और रोजमर्रा की नोक-झोंक को तलाक का आधार बनने वाली क्रूरता नहीं माना जा सकता. अदालत ने 2003 में हुई शादी को खत्म करने की पति की अर्जी को खारिज कर दिया और पत्नी को हर महीने ₹5,000 का गुजारा-भत्ता देने के आदेश को बरकरार रखा. जस्टिस उर्मिला जोशी-फाल्के और जस्टिस राज वाकोडे की बेंच ने कामठी के रहने वाले 44 साल के एक शख्स की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपनी पत्नी से तलाक के लिए 2016 में फैमिली कोर्ट में अर्जी दाखिल की थी.
पत्नी पर क्या आरोप लगे थे?
पति ने आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी अक्सर उसकी मां से झगड़ती थी, बच्चा न होने के लिए उसे दोषी ठहराती थी, बुरा बर्ताव करने के झूठे आरोप लगाती थी और उसके खिलाफ शिकायतें दर्ज कराती थी, जिससे उसे बहुत ज्यादा मानसिक पीड़ा होती थी.
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कोर्ट में पत्नी की क्या दलील?
पत्नी ने अपने वकील अनिल ठाकरे के जरिए इन आरोपों से इनकार किया और कहा कि उसके साथ बुरा बर्ताव किया गया और दहेज की मांग की गई. यही भी दावा किया कि उसने बार-बार अपने ससुराल लौटने की कोशिश की, लेकिन उसे लौटने नहीं दिया गया.
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कोर्ट ने नतीजा निकाला?
बेंच ने पाया कि पति के सबूतों से शारीरिक या मानसिक क्रूरता की कोई खास घटना साबित नहीं हुई. कोर्ट ने गौर किया कि पति से जिरह के दौरान यह बात सामने आई कि पत्नी ने उसके पिता की बीमारी के वक्त उसकी और उसके परिवार की मदद की थी और पारिवारिक रीति-रिवाजों में भी हिस्सा लिया था. इससे यह भी पता चला कि उसने साथ रहने की कोशिश की थी, जबकि पति ने उसे वापस लाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया था.
बेंच ने कहा, "कानून की नजर में क्रूरता के सामान्य आरोप क्रूरता नहीं माने जाते." बेंच ने जोर देकर कहा कि आरोप व्यवहार के 'समय, स्थान और तरीके' के बारे में स्पष्ट होने चाहिए. अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों (जैसे समर घोष बनाम जया घोष) का हवाला दिया और कहा कि वैवाहिक जीवन का आकलन समग्र रूप से किया जाना चाहिए.
पत्नी को मिलता रहेगा गुजारा-भत्ता
जजों ने गुजारा-भत्ता (मेंटेनेंस) के खिलाफ की गई चुनौती को भी खारिज कर दिया. फैमिली कोर्ट ने दर्ज किया था कि पति, जो ऑर्डनेंस फैक्टरी का कर्मचारी है, महीने के ₹23,808 कमाता था. उन्होंने कहा, "पत्नी पहले नर्स के तौर पर काम करती थी, लेकिन शादी के बाद उसने नौकरी छोड़ दी और उसकी आय का कोई स्वतंत्र जरिया नहीं था."
हाई कोर्ट ने माना कि पति की अपनी बातों से ही यह साबित होता है कि उसने पत्नी की अनदेखी की और उसे गुजारा-भत्ता देने से इनकार किया. कोर्ट ने पत्नी को दिए जाने वाले ₹5,000 के मासिक गुजारा-भत्ते को उचित माना और अदालत को इसमें दखल देने की कोई वजह नहीं मिली.
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