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Tiger Deaths in MP: हाईकोर्ट में NDTV के रिपोर्ट की गूंज, अदालत की सख्ती के बाद वन विभाग ने बनाई SIT

Tiger Deaths in MP: NDTV की रिपोर्ट ने पहले ही चेतावनी दी थी कि 2025 में बाघों की 57 प्रतिशत मौतें अप्राकृतिक थीं. एक ही सप्ताह में छह बाघों की मौत, जंगलों में बिछे करंट तार, और हर मौत को “आपसी संघर्ष” बताकर फाइल बंद कर देना ये सब उस व्यवस्था की ओर इशारा करते हैं, जहां संरक्षण कागज़ों तक सिमटता जा रहा है.

Tiger Deaths in MP: हाईकोर्ट में NDTV के रिपोर्ट की गूंज, अदालत की सख्ती के बाद वन विभाग ने बनाई SIT
Tiger Deaths in MP: मप्र में बाघों की मौत पर हाईकोर्ट सख्त, NDTV रिपोर्ट के बाद वन विभाग ने बनाई SIT

Tiger Deaths in MP: मध्य प्रदेश जिसे दुनिया भर में “टाइगर स्टेट” (Tiger State) के रूप में जाना जाता है, आज अपने ही दावों के कटघरे में खड़ा है. बाघ संरक्षण की उपलब्धियों पर गर्व करने वाले इस राज्य में जब बाघों की लाशें जंगलों में मिलने लगीं, तो यह सवाल उठना तय था. इसी सवाल को सामने लेकर आया NDTV, 16 दिसंबर 2025 की रिपोर्ट में और अब उसी रिपोर्ट के आधार पर हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका (PIL) के बाद वन विभाग को कार्रवाई के लिए मजबूर होना पड़ा है. NDTV ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया था कि साल 2025 में मध्य प्रदेश में 54 बाघों की मौत हुई, जो 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत के बाद किसी एक साल में सबसे अधिक है. इस रिपोर्ट को हाईकोर्ट में दायर PIL में एनेक्सचर P-1 के रूप में संलग्न किया गया.

Tiger Deaths in MP: Tiger Deaths in MP

Tiger Deaths in MP: बाघों की मौत पर कोर्ट सख्त

कोर्ट में क्या कहा गया?

याचिका में कहा गया कि “टाइगर स्टेट” में संरक्षण के दावों और जमीनी हकीकत के बीच गंभीर विरोधाभास है. खास तौर पर बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व जैसे प्रमुख अभयारण्यों में बाघों की कई मौतें ‘अप्राकृतिक' श्रेणी में दर्ज की गईं. NDTV की रिपोर्ट में शिकार, करंट से मौत, स्नेर ट्रैप, संदिग्ध परिस्थितियां और विभागीय लापरवाही को प्रमुख कारण बताया गया था.

PIL में यह भी कहा गया कि बाघों की लगातार हो रही मौतें वन विभाग की निगरानी व्यवस्था, प्रवर्तन और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं. NDTV की रिपोर्ट के आधार पर हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को समझा, जिसके बाद वन विभाग ने औपचारिक रूप से स्थिति को “अत्यंत गंभीर और चिंताजनक” माना.

अब प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख, मध्य प्रदेश के कार्यालय से 19 जनवरी 2026 को आदेश जारी किया गया. आदेश में स्वीकार किया गया कि बीते दो महीनों में बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व, उमरिया और आसपास के क्षेत्रों में बाघों और तेंदुओं की असामान्य मौतों की लगातार रिपोर्ट मिल रही है.

इन मौतों के कारणों में शामिल बताए गए हैं, करंट लगना, स्नेर ट्रैप, खुले कुओं में गिरना और आपसी संघर्ष.

आदेश में साफ कहा गया है कि प्रथम दृष्टया किसी स्तर पर लापरवाही से इंकार नहीं किया जा सकता. यह भी स्वीकार किया गया कि 2024 में गठित SIT के बावजूद पहले चिन्हित की गई कमियां दोबारा सामने आ रही हैं.

वन विभाग ने नई SIT गठित की

वन विभाग ने अब एक नई विशेष जांच टीम (SIT) गठित की है, जो पिछले दो महीनों में हुई सभी बाघ और तेंदुओं की मौतों की तथ्यात्मक, निष्पक्ष और विस्तृत जांच करेगी. यदि जांच में किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही पाई जाती है, तो जवाबदेही तय करने की सिफारिश की जाएगी. SIT को यह भी निर्देश दिए गए हैं कि वह भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस और व्यावहारिक सुझाव दे. जांच रिपोर्ट और सिफारिशें 15 दिनों के भीतर प्रस्तुत करनी होंगी.

 ‘टाइगर स्टेट' या ‘टाइगर कब्रिस्तान'?

NDTV की रिपोर्ट ने पहले ही चेतावनी दी थी कि 2025 में बाघों की 57 प्रतिशत मौतें अप्राकृतिक थीं. एक ही सप्ताह में छह बाघों की मौत, जंगलों में बिछे करंट तार, और हर मौत को “आपसी संघर्ष” बताकर फाइल बंद कर देना ये सब उस व्यवस्था की ओर इशारा करते हैं, जहां संरक्षण कागज़ों तक सिमटता जा रहा है. अब सवाल यही है कि क्या मध्य प्रदेश सिर्फ नाम का “टाइगर स्टेट” रहेगा, या NDTV की रिपोर्ट और हाईकोर्ट की सख्ती के बाद उन जिम्मेदार लोगों पर भी कार्रवाई होगी, जिनकी लापरवाही ने जंगलों में बाघों की दहाड़ से ज्यादा लाशों की आवाज़ तेज कर दी है.

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