Tiger Deaths in Madhya Pradesh: मध्य प्रदेश, जिसे देश ‘टाइगर स्टेट' के नाम से भी जाना जाता है. वहां इन दिनों बाघों की रहस्यमयी और चिंताजनक मौतों ने वन्यजीव प्रेमियों को चौंका दिया है. महज तीन महीनों में आठ बाघों की मौत ने वन महकमे से लेकर अदालत तक हलचल मचा दी है. इनमें से तीन मामलों में करंट लगने की पुष्टि हुई है, जबकि एक बाघिन की कथित मौत सोलर फेंसिंग से लगातार बहते करंट के कारण होने का दावा सामने आने के बाद मामला और गंभीर हो गया है.
अब यह मुद्दा जंगल की सीमा से निकलकर Madhya Pradesh High Court की निगरानी और Madhya Pradesh Special Task Force की जांच तक पहुंच चुका है. सवाल सिर्फ मौतों का नहीं, बल्कि उस संरक्षण मॉडल का है, जिस पर मध्य प्रदेश को देश का अग्रणी टाइगर लैंडस्केप माना जाता है.
बाघिन का मुंह सोलर फेंसिंग में फंस गया
वन्यजीव कार्यकर्ताओं के मुताबिक यह घटना अभूतपूर्व और बेहद चिंताजनक है. बताया जा रहा है कि बाघिन का मुंह सोलर फेंसिंग में फंस गया, जिससे उसे लगातार करंट लगता रहा और उसकी मौत हो गई. यह भारत में संभवतया पहला ऐसा मामला होगा, जहां सोलर ऊर्जा ढांचे की वजह से किसी बाघ की मौत हुई हो.
STF ने वन विभाग से मांगी रिपोर्ट
जो मामला पहले बाघों की बिखरी हुई मौतों तक सीमित था, वह अब बड़े कानूनी और जांच के दायरे में पहुंच चुका है. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट इस पूरे मामले की निगरानी कर रहा है. प्रधान मुख्य वन संरक्षक (HoFF) विजय अम्बाड़े ने सख्त निर्देश जारी किए हैं और अब स्पेशल टास्क फोर्स (STF) पुलिस ने भी वन विभाग को पत्र लिखकर बाघों की मौत से जुड़े मामलों की विस्तृत जानकारी मांगी है. NDTV के पास HoFF और STF दोनों के खतों की प्रतियां मौजूद हैं. मामला अब सिर्फ जंगल की फाइलों तक सीमित नहीं है यह अदालत और पुलिस मुख्यालय तक पहुंच चुका है.

Tiger Deaths in Madhya Pradesh
नवंबर-फरवरी के बीच हुई मौतें
नवंबर 2025 से 24 फरवरी 2026 के बीच बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व और उसके आसपास कुल आठ बाघों की मौत आधिकारिक रूप से दर्ज की गई. इनमें से चार मौतें रिजर्व के अंदर हुईं, जबकि चार रिजर्व की अधिसूचित सीमा के बाहर टेरिटोरियल फॉरेस्ट डिवीजनों में हुईं. वन विभाग का कहना है कि रिजर्व के अंदर हुई चार मौतें प्राकृतिक कारणों बीमारी, आपसी संघर्ष और डूबने की वजह से हुईं, लेकिन असली झटका रिजर्व की सीमा के बाहर हुआ.
बाघ कृषि भूमि में आ जाते हैं
रिपोर्ट में कहा गया है कि भटकते हुए बाघ अक्सर रिजर्व की सीमा पार कर कृषि भूमि में पहुंच जाते हैं, जहां फसल बचाने के लिए किसान कभी-कभी अवैध बिजली वाले तार लगा देते हैं. ऐसे में संपर्क होते ही मौत हो सकती है, लेकिन सोलर फेंसिंग का एंगल सामने आने के बाद मामला विस्फोटक हो गया है.
वन अधिकारी ने क्या कहा?
शहडोल सर्किल के मुख्य वन संरक्षक महेंद्र प्रताप सिंह ने मामले की गंभीरता स्वीकार की. उन्होंने कहा कि रिपोर्ट में उल्लेख है कि बाघिन का मुंह सोलर फेंस में फंसने के बाद लगातार करंट बहता रहा. मामला विस्तृत जांच में है. सोलर फेंसिंग से इस तरह की घटना की मुझे पहले जानकारी नहीं है. संभव है तकनीकी खराबी रही हो. ऑटो-कट सिस्टम इनबिल्ट होता है, शायद समय पर काम नहीं कर पाया, लेकिन वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे ने विभागीय तर्कों को सिरे से खारिज किया. उनका कहना है कि भारत में अब तक ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया है.

Tiger Deaths in Madhya Pradesh
सोलर फेंसिंग चबा ले तो भी कुछ नहीं होता
अगर 300 किलो का बाघ DC सोलर फेंसिंग चबा ले, तब भी उसे कुछ नहीं होना चाहिए. अगर लगातार करंट बहा तो यह गंभीर सुरक्षा चूक है. अगर यह फेंसिंग बाघ के लिए असुरक्षित है तो इंसानों के लिए भी खतरा हो सकती है.
साल-दर-साल बढ़ रहा बाघों की मौत का आंकड़ा
उन्होंने हाईकोर्ट में दायर याचिका में व्यापक आंकड़े भी पेश किए, जिनसे बहस और तेज हो गई. दुबे की याचिका के मुताबिक मध्य प्रदेश में बाघों की मौत का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है.
- 2022: 43 बाघों की मौत
- 2023: 45 बाघों की मौत
- 2024: 46 बाघों की मौत
- 2025: 54 बाघों की मौत
- 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर शुरू होने के बाद सबसे ज्यादा
- 2026 (अब तक): 10 बाघों की मौत. दुबे का आरोप है कि यह बढ़ती मृत्यु दर संरक्षण और निगरानी व्यवस्था में प्रणालीगत खामियों की ओर इशारा करती है.
बाघों की मौतें अभी भी जारी
11 फरवरी 2026 को सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य सांघी ने हाईकोर्ट को बताया कि पिछली सुनवाई के बाद भी बाघों की मौतें जारी रहीं. इसके बाद अदालत ने बांधवगढ़ के फील्ड डायरेक्टर को विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया.
हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद 25 फरवरी 2026 को HoFF कार्यालय ने आदेश जारी कर पिछले दो महीनों में हुई सभी बाघ और तेंदुआ मौतों पर गठित SIT की रिपोर्ट 26 फरवरी 2026 तक अनिवार्य रूप से प्रस्तुत करने को कहा.
पुलिस मुख्यालय तक पहुंचा मामला
अब यह मामला जंगल की सीमाओं से निकलकर पुलिस मुख्यालय तक भी पहुंच चुका है. 12 फरवरी 2026 को मध्य प्रदेश STF ने अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) को पत्र लिखकर बाघों की मौत से जुड़े अपराधों की विस्तृत जानकारी मांगी, जिसके आंकड़े भी चिंताजनक हैं.
- 2023: 2 बाघों की शिकार से मौत
- 2024: 2 बाघों की शिकार से मौत
- 2025: 1 बाघ की शिकार से मौत और 2025 में ही 3 मामले बाघों के अंगों की तस्करी से जुड़े
पत्र में सभी मामलों की विस्तृत जानकारी, की गई कार्रवाई और वर्तमान स्थिति मांगी गई है.
STF की सक्रियता यह संकेत देती है कि एजेंसियां अब यह जांच रही हैं कि कहीं बाघों की मौतें सिर्फ प्राकृतिक या आकस्मिक घटनाएं नहीं, बल्कि संगठित लापरवाही या अवैध गतिविधियों से जुड़ी तो नहीं.
मध्य प्रदेश खुद को ‘टाइगर स्टेट' कहता है, लेकिन जब तीन महीने में आठ मौतें सामने आएं, 2025 में रिकॉर्ड 54 बाघ मरें और सोलर फेंसिंग जैसी तकनीक पर सवाल उठें तो कहानी संरक्षण की सफलता से हटकर संकट प्रबंधन की तरफ मुड़ जाती है.
हाईकोर्ट निगरानी कर रहा है। SIT पर डेडलाइन का दबाव है। STF मामले की परतें खंगाल रही है और प्रशासनिक तंत्र जवाब तलाश रहा है. सबसे बड़ा सवाल अब यही है क्या ये अलग-अलग घटनाएं हैं? या भारत के सबसे चर्चित टाइगर लैंडस्केप में गहराता हुआ संरक्षण संकट? जंगल चुप है, लेकिन अदालत में सवाल गूंज रहे हैं.
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