Madhya Pradesh News: करोड़ों रुपये की कथित वित्तीय अनियमितताओं, लोकायुक्त जांच और FIR को लेकर सुर्खियों में रहे सिंगरौली (Singrauli) के पूर्व प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) एस. बी.सिंह एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं. वजह है शहडोल संभाग में उन्हें सहायक संचालक का प्रभार सौंपा जाना. हैरानी की बात यह है कि जिस अधिकारी के खिलाफ लोकायुक्त पुलिस द्वारा भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों को लेकर एफआईआर दर्ज की जा चुकी है, उसी अधिकारी को महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारी सौंप दी गई है. इस फैसले ने न केवल शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि शासन की जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे है.
शिक्षा विभाग में करोड़ों का घोटाला
आरोप है कि विभाग में विभिन्न योजनाओं, खरीद प्रक्रियाओं और वित्तीय लेन-देन से जुड़े मामलों में करोड़ों रुपये की अनियमितताएं हुईं. शिकायतों के बाद शुरू हुई जांच ने इतना गंभीर रूप लिया कि लोकायुक्त संगठन को FIR दर्ज करनी पड़ी.
सहायक संचालक की सौंपी गई जिम्मेदारी
लोकायुक्त की कार्रवाई के बाद यह माना जा रहा था कि जांच पूरी होने तक संबंधित अधिकारियों की भूमिका सीमित रह सकती है, लेकिन घटनाक्रम ने अलग मोड़ ले लिया. अब उन्हीं अधिकारियों में शामिल एक पूर्व DEO को शहडोल संभाग में सहायक संचालक जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंप दी गई है. इस फैसले ने कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों से घिरे अधिकारी को जांच पूरी होने से पहले इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जानी चाहिए? क्या इससे जांच की निष्पक्षता को लेकर सवाल नहीं उठेंगे? और सबसे बड़ा सवाल- क्या यह फैसला शासन की जवाबदेही और पारदर्शिता की कसौटी पर खरा उतरता है?
मचा बवाल
शिक्षा विभाग के भीतर और बाहर इस निर्णय को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं. कुछ लोग इसे सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बता रहे हैं, जबकि आलोचकों का कहना है कि इससे भ्रष्टाचार के मामलों में सरकार की सख्ती को लेकर गलत संदेश जा सकता है. हालांकि कानूनी दृष्टि से देखा जाए तो केवल FIR दर्ज होना किसी व्यक्ति को दोषी नहीं बनाता. भारतीय न्याय व्यवस्था में आरोप साबित होने तक हर व्यक्ति निर्दोष माना जाता है. यही कारण है कि संबंधित अधिकारी के खिलाफ अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएंगे.
जानें पूरा मामला
दरअसल, अक्टूबर 2022 में एसबी सिंह को प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी की जिम्मेदारी मिली थी. इसके बाद से विभाग लगातार विवादों में रहा. करीब चार सालों में शिक्षा विभाग पर लगभग 25 करोड़ रुपये के घोटाले के आरोप लगे. वहीं मामला सामने आने के बाद लोकायुक्त ने जांच शुरू की.
जांच में सामने आया कि जिले की 558 स्कूलों के लिए स्वच्छता और कीटाणुनाशक सामग्री के नाम पर करीब 97 लाख रुपये खर्च दिखाए गए. 19 स्कूलों में वर्चुअल रियलिटी लैब स्थापित करने के नाम पर लगभग 4.68 करोड़ रुपये खर्च बताए गए. वहीं 61 स्कूलों में बिजली और मरम्मत कार्य के नाम पर करीब 3 करोड़ रुपये का खर्च दर्ज किया गया था.
लोकायुक्त ने अपराध क्रमांक 43/2026 के तहत मामला दर्ज किया, जिसमें कई अधिकारियों को आरोपी बनाया था. प्रभारी DEO एस. बी.सिंह , सहायक संचालक राजधर साकेत, जिला परियोजना समन्वयक रामलखन शुक्ल और वित्त से जुड़े अधिकारी भी जांच के दायरे में आ गए थे.
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फिर भी यह तथ्य अपनी जगह कायम है कि सिंगरौली का शिक्षा विभाग प्रकरण प्रदेश के सबसे चर्चित वित्तीय अनियमितता मामलों में गिना गया. लोकायुक्त FIR के बाद यह मामला लंबे समय तक राजनीतिक और प्रशासनिक बहस का विषय बना रहा. अब उसी प्रकरण से जुड़े अधिकारी को नई जिम्मेदारी मिलने के बाद मामला एक बार फिर सुर्खियों में लौट आया है. शासन के इस फैसले पर उठ रहे सवालों के बीच अब सबकी नजर लोकायुक्त जांच की अगली कार्रवाई पर टिकी है. जांच क्या नया खुलासा करती है, आरोप कितने साबित होते हैं और क्या सरकार इस विवाद के बीच कोई नया रुख अपनाती है... यह आने वाला समय तय करेगा. फिलहाल इतना जरूर है कि लोकायुक्त FIR के साए में मिली यह नई कुर्सी प्रशासनिक गलियारों में चर्चा और बहस का बड़ा विषय बन गई.
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