कभी खाड़ी देशों में फंसे किसी बेबस मजदूर का पासपोर्ट जब्त हो जाने की दर्दभरी कहानी, तो कभी बिहार की एक व्याकुल मां की रोती-बिलखती गुहार जो विदेश में लापता हुए अपने बेटे की तलाश कर रही हो... कभी पाकिस्तान, सऊदी अरब या मलेशिया में फंसे किसी ऐसे भारतीय की दास्तान जिसके पास न पैसे बचे हों, न दस्तावेज और न ही घर लौटने की कोई उम्मीद. ऐसी लड़कियां जिन्हें बार-बार खरीदा और बेचा जा रहा हो... अधिकांश लोगों के लिए ये कहानियां केवल सहानुभूति जगाने के साथ समाप्त हो जाती हैं, लेकिन भोपाल के सैयद आबिद हुसैन के लिए ऐसी हर कहानी किसी जंग से कम नहीं है. क्योंकि ऐसे लोगों या उनके परिवार के एक फोन कॉल के बाद ही आबिद का काम शुरू होता है.
सोशल मीडिया और हजारों आभारी परिवारों के बीच "वास्तविक जीवन के बजरंगी भाईजान" के रूप में जाने जाने वाले, भोपाल के इंटीरियर डिजाइनर सैयद आबिद हुसैन अब तक 1000 से ज्यादा विदेश में फंसे भारतीयों की वतन वापसी करा चुके हैं. इसके लिए वे कोई शुल्क नहीं लेते. आबिद कहते हैं, "यह ईश्वर का काम है. जब कोई परिवार मदद मांगता है, तो मैं बस अपने प्रयास शुरू कर देता हूं. मैंने कितने लोगों की मदद की है, इसकी गिनती भी कभी नहीं करता."
यूपी के छोटे से गांव से भोपाल पहुंचे, यहीं के हो गए
दरअसल, मूल रूप से उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर जिले के रुद्रपुर भगाही गांव के रहने वाले आबिद वर्ष 2006 में चित्रकार और इंटीरियर डिजाइनर के रूप में अपना करियर बनाने के लिए भोपाल आए गए थे. इसके बाद से वे झीलों की नगरी के ही होकर रह गए. और फिर वे विदेश में फंसे लोगों की मदद करते-करते वे रियल लाइफ के बजरंगी भाईजान बन गए.

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'रमजान' के पहले केस से बदल गया मकसद
NDTV से बात करते हुए आबिद बताते हैं कि पहली बार उन्होंने रमजान नाम के लड़के की मदद जो विदेश में फंसा हुआ था. इस दौरान उन्हें समझ आया कि आम परिवारों के लिए अंतरराष्ट्रीय नौकरशाही से निपटना कितना मुश्किल काम है. दूतावास, आव्रजन (इमिग्रेशन) प्रक्रियाएं, कानूनी दस्तावेज और राजनयिक चैनल अक्सर उन लोगों के लिए बेहद जटिल और डरावने लगते थे जो पहले से ही चिंता और आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे. रमजान की घर वापसी के बाद उन्होंने इस काम को अपना मिशन बना लिया.
10 से ज्यादा देशों और भारत के कोने-कोने तक मदद

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मोबाइल फोन ही 'कार्यालय', ऐसे करते हैं काम
मानवीय सहायता में शामिल कई बड़े संगठनों के विपरीत, आबिद बिना किसी औपचारिक संस्था या बड़े फंडिंग नेटवर्क के काम करते हैं. उनका कार्यालय अक्सर उनका मोबाइल फोन ही होता है. जब भी कोई उनसे मदद के लिए संपर्क करता है, तो वे सबसे पहले दस्तावेज जुटाना, पहचान सत्यापित करना और भारतीय दूतावासों, विदेश मंत्रालय तथा उस देश के अधिकारियों से संपर्क स्थापित करना शुरू कर देते हैं, जहां व्यक्ति फंसा हुआ है. इस काम में सोशल मीडिया भी उनका एक महत्वपूर्ण साधन बन जाता है. ऑनलाइन अभियान चलाकर, संबंधित अधिकारियों को टैग करके और मीडिया का ध्यान आकर्षित करके, वे अधिकारियों पर तब तक दबाव बनाए रखते हैं जब तक कि कोई ठोस समाधान न निकल जाए.
कभी हार नहीं मानते आबिद

real life bajrangi bhaijaan syed abid hussain bhopal: सैयद आबिद हुसैन को मिल चुके हैं कई अवार्ड.
परिवारों को एक साथ हंसते-रोते देखना ही सफलता
तमाम पुरस्कार और सार्वजनिक मान्यताएं प्राप्त करने के बावजूद, आबिद खुद को एक बेहद साधारण व्यक्ति के रूप में देखते हैं. वे कहते हैं कि उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार महीनों या सालों की अनिश्चितता और खौफ के बाद परिवारों को फिर से एक साथ हंसते-रोते देखना है. लंबे संघर्ष के बाद जब कोई विदेश से अपने घर लौटता है तो परिवार उन्हें खूब दुआएं देता हैं. इसी को वे अपनी सच्ची सफलता मानते हैं.
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