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रीवा रियासत के अजब-गजब नियम: जब 4 घोड़ों की बग्घी पर बिफरे राजा, अकबर को दी पनाह और हिंदी को बनाया राजभाषा

1140 ईस्वी में स्थापित रीवा रियासत का इतिहास केवल सफेद बाघों और तानसेन तक सीमित नहीं है. अकबर के बचपन की शरणगाह रही इस रियासत के अजब-गजब नियम हैरान करते हैं—जहां 4 घोड़ों की बग्घी पर राजा बिफर गए और हिंदी को पहला राजकीय दर्जा दिया गया. जानिए रीवा के दिलचस्प किस्से.

रीवा रियासत के अजब-गजब नियम: जब 4 घोड़ों की बग्घी पर बिफरे राजा, अकबर को दी पनाह और हिंदी को बनाया राजभाषा

हिंदुस्तान के इतिहास में जब भी राजशाही ठाट-बाट, आन-बान-शान और सनक की बात आती है, तो ध्यान अमूमन राजस्थान की रियासतों पर जाता है. लेकिन मध्य भारत के विंध्य इलाके में एक ऐसी रियासत थी, जिसके कायदे-कानून और किस्से सुनकर आज भी लोग हैरान रह जाते हैं. यह थी विंध्य और बघेलखंड की सबसे बड़ी रीवा रियासत. 1140 ईस्वी में स्थापित रीवा रियासत केवल सफेद बाघों की भूमि या संगीत सम्राट तानसेन की जन्मस्थली भर नहीं थी. यह वह रियासत थी जिसने 10 साल के बालक अकबर को पनाह दी, देश में पहली बार हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाया और लोकतंत्र से भी पहले प्रजा को राजा से सवाल पूछने का अधिकार दिया. लेकिन इसी रीवा का एक दूसरा रूप भी था—जहां किसी सेठ की 4 घोड़ों वाली बग्घी राजा को अपनी तौहीन लगती थी, जहां कोई भी इमारत राजा के महल से ऊंची नहीं बन सकती थी और जहां हाथी पर चढ़ने के लिए भी सरकारी परवाना लगता था.इस रिपोर्ट में रीवा रियासत की ऐसे ही भूले-बिसरे किस्सों को याद करते हैं.  

रीवा रिसायत का वेंकट भवन जिसकी नक्काशी आज भी लोगों को आकर्षित करती है

जब 4 घोड़ों की बग्घी बनी तौहीन और जबलपुर के सेठ को मांगनी पड़ी माफी

किस्सा 19वीं सदी के आखिरी दौर का है, जब रीवा के महाराजा अपनी यात्रा के दौरान जबलपुर-कटनी मार्ग पर स्थित सिहोरा पहुंचे थे. खबर मिलते ही जबलपुर के सबसे धनी मालगुजार और कारोबारी राजा गोकुलदास या सेठ गोकुलदास महाराजा की अगवानी के लिए सिहोरा पहुंचे. सेठ गोकुलदास को ब्रिटिश हुकूमत से 'राजा' की उपाधि मिली हुई थी और वे अंग्रेजों के तय प्रोटोकॉल के मुताबिक 4 घोड़ों से जुती अपनी आलीशान बग्घी में सवार होकर आए थे.डॉ. डी.ई.यू. बेकर की पुस्तक 'Baghelkhand: The Tigers' Lair के मुताबिक जैसे ही रीवा महाराजा की नजर 4 घोड़ों वाली बग्घी पर पड़ी, वे बिफर पड़े. रीवा रियासत के सख्त राजशाही नियमों के मुताबिक, 4 या उससे ज्यादा घोड़ों वाली बग्घी में चलने का हक सिर्फ रीवा के राजा या ब्रिटिश भारत के गवर्नर जनरल को ही था. महाराजा ने एक व्यापारी द्वारा इस तरह बग्घी में आने को सीधे तौर पर राजसत्ता की तौहीन और अपनी बराबरी करने की कोशिश माना. माहौल गरमा गया और महाराजा के इस कड़े रुख के आगे अंग्रेजों की सरपरस्ती में रहने वाले सेठ गोकुलदास को भी अपनी गलती माननी पड़ी और शिष्टाचार के साथ माफी मांगनी पड़ी. नियम ऐसा कि महल के कंगूरे से ऊंचा कोई घर नहीं बन सकता था

1903 का दिल्ली दरबार, जो राजा एडवर्ड सप्तम और महारानी एलेक्जेंड्रा के भारत के सम्राट और साम्राज्ञी के रूप में राज्याभिषेक के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया था: 7 ​​जनवरी 1903 को आयोजित दरबारी परेड में रीवा के महाराजा की हाथी गाड़ी.

1903 का दिल्ली दरबार, जो राजा एडवर्ड सप्तम और महारानी एलेक्जेंड्रा के भारत के सम्राट और साम्राज्ञी के रूप में राज्याभिषेक के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया था: 7 ​​जनवरी 1903 को आयोजित दरबारी परेड में रीवा के महाराजा की हाथी गाड़ी. साभार- wikipedia

रीवा रियासत में राजा की सर्वोच्चता को लेकर वास्तुकला तक के नियम तय थे. रियासत के फरमान के मुताबिक पूरे रीवा शहर या उसके आसपास के इलाकों में कोई भी जमींदार, सामंत या कारोबारी अपना मकान या हवेली रीवा फोर्ट (शाही महल) के मुख्य द्वार से ऊंचा नहीं बनवा सकता था. इसके पीछे सीधा संदेश था कि राज्य में 'महाराजा से ऊंचा स्थान किसी का नहीं हो सकता.' अगर किसी अमीर व्यापारी को बहुमंजिला इमारत बनानी भी होती, तो महाराज के दीवान कार्यालय से उसका नक्शा पास होता था. नक्शे में यह बारीकी से जांचा जाता था कि इमारत की ऊंचाई महल के कंगूरे से कम है या नहीं. इसका जिक्र इंपीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया', वॉल्यूम 21 में मिलता है. 

हाथी की सवारी पर पाबंदी: शाही फरमान के बिना नो एंट्री

इसी तरह, रीवा में हाथी सिर्फ एक जानवर नहीं, बल्कि राजसत्ता और सैन्य ताकत का प्रतीक था. सामान्य दिनों में किसी भी सेठ, सामंत या आम नागरिक को अपने निजी इस्तेमाल के लिए हाथी पर चढ़कर सार्वजनिक रास्तों से गुजरने की मनाही थी.हाथी की सवारी का हक सिर्फ राजा और राजपरिवार के पास था. अगर किसी रईस को अपने बेटे की बारात या किसी धार्मिक जुलूस में हाथी ले जाना होता, तो बाकायदा 'दरबार हुजूर' में अर्जी लगानी पड़ती थी. वहां से लिखित 'शाही परवाना' मिलने के बाद ही कोई व्यक्ति हाथी पर सवार हो सकता था. बिना इजाजत हाथी पर घूमना राजसत्ता से बगावत माना जाता था.
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जब रीवा के आंगन में बीता अकबर का बचपन 

इतिहास का एक और दिलचस्प अध्याय रीवा में ही लिखा गया. जब शेरशाह सूरी से हारकर हुमायूं दर-दर भटक रहा था, तब उसके 10 साल के बेटे अकबर को रीवा के महाराजा रामचंद्र सिंह बघेल ने अपने पास शरण दी थी.

रीवा के राजकुमार और अकबर एक साथ खेले-कूदे और उनके बीच गहरी दोस्ती हो गई.आगे चलकर जब अकबर दिल्ली का तख्त संभालकर मुगल सम्राट बना, तो उसने अपने पुराने दोस्त महाराजा रामचंद्र सिंह के दरबार से दो अनमोल रत्न मांगे. ये कोई और नहीं बल्कि संगीत सम्राट तानसेन और हाजिरजवाब बीरबल यानि महेश दास थे.

रीवा के दरबार से निकलकर ही ये दोनों अकबर के प्रसिद्ध 'नवरत्नों' में शामिल हुए.

देश में सबसे पहले हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाया 

रीवा रियासत सिर्फ कड़े नियमों के लिए ही नहीं, बल्कि क्रांतिकारी सुधारों के लिए भी जानी जाती है. 1847 में महाराजा विश्वनाथ सिंह देव ने सती प्रथा पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी थी. वे साहित्यप्रेमी थे और उन्होंने हिंदी का पहला औपचारिक नाटक 'आनंद रघुनंदन' भी लिखा था. वहीं, महाराजा गुलाब सिंह के दौर में रीवा भारत की पहली ऐसी रियासत बनी, जिसने 'हिंदी' को अपनी आधिकारिक राजकीय भाषा (राष्ट्रभाषा) घोषित किया. इसके अलावा, उन्होंने भारत में पहली बार 'उत्तरदायी सरकार' की व्यवस्था शुरू की, जिसमें आम नागरिक को राजा के प्रशासनिक फैसलों पर सवाल उठाने का वैधानिक अधिकार दिया गया था.
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सफेद बाघ 'मोहन', 1857 की क्रांति और भारत में विलय

रीवा का नाम पूरी दुनिया में 'सफेद बाघों की भूमि' (Land of White Tigers) के रूप में भी दर्ज है. मई 1951 में अंतिम महाराजा मार्तंड सिंह जूदेव ने बांधवगढ़ के जंगलों से दुनिया का पहला सफेद बाघ पकड़ा, जिसका नाम 'मोहन' रखा गया. इसी मोहन के वंश से आज दुनिया भर के चिड़ियाघरों में सफेद बाघ मौजूद हैं. इससे पहले, 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम में रीवा के रणबांकुरे ठाकुर रणमत सिंह बघेल ने अंग्रेजों के खिलाफ 2,000 विद्रोहियों की फौज लेकर छापामार युद्ध लड़ा था और कई ब्रिटिश अधिकारियों को धूल चटाई थी. आजादी के बाद महाराजा मार्तंड सिंह ने रीवा का भारत संघ में विलय किया, जिसके बाद यह विंध्य प्रदेश की राजधानी बना और 1956 में मध्य प्रदेश का अहम हिस्सा बन गया.

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