- एंबेसडर कार का उत्पादन 1958 में पश्चिम बंगाल के उत्तरपाड़ा प्लांट से शुरू हुआ
- 1970 और 1980 के दशक में एंबेसडर ने भारतीय कार बाजार का लगभग पचहत्तर प्रतिशत हिस्सा नियंत्रित किया था
- 1983 में मारुति 800 के आने के बाद एंबेसडर की लोकप्रियता में गिरावट आई और तकनीकी विकास में पिछड़ गई
Ambassador Car History: भारतीय ऑटोमोबाइल इतिहास में एक ऐसा दौर था जब देश की सत्ता, रसूख और प्रशासनिक ताकत सिर्फ एक गाड़ी के पहियों पर घूमती थी— एंबेसडर. आज भले ही नेताओं और नौकरशाहों के काफिले में आलीशान एसयूवी (SUVs) नजर आती हों, लेकिन दशकों तक देश के प्रधानमंत्री से लेकर राज्यों के मुख्यमंत्रियों, जिला कलेक्टर्स और पुलिस कप्तानों की आधिकारिक सवारी सिर्फ और सिर्फ सफेद या पीली बत्ती लगी एंबेसडर ही हुआ करती थी. लुटियंस दिल्ली के मंत्रालयों के बाहर खड़ी एंबेसडर कारों की कतारें इस बात का सबूत थीं कि भारत की व्यवस्था पर इस गाड़ी का कितना गहरा नियंत्रण था.एंबेसडर की कहानी सिर्फ लुटियंस दिल्ली के पावर कॉरिडोर तक सीमित नहीं थी. यह आजाद भारत के संभ्रांत परिवारों की पहली पसंद और हर आम भारतीय का एक ऐसा सपना थी, जिसे हासिल करना जीवन की सबसे बड़ी कामयाबी माना जाता था. लेकिन वक्त बीतने के साथ-साथ पश्चिम बंगाल के उत्तरपाड़ा की फैक्ट्री से निकलकर देश के कोने-कोने में राज करने वाली इस आइकॉनिक कार का जलवा न सिर्फ खत्म हुआ बल्कि ये बाजार से पूरी तरह गायब भी हो गई. इस रिपोर्ट में जानते हैं क्या है एंबेसडर के किंग बनने और बिखरने की पूरी कहानी?

वह दौर जब यह 'किंग ऑफ इंडियन रोड्स' थी
साल 1958 में पश्चिम बंगाल के हुगली जिले में स्थित उत्तरपाड़ा प्लांट से जब हिंदुस्तान मोटर्स (Hindustan Motors) ने पहली एंबेसडर उतारी, तो यह ब्रिटिश कार 'मौरिस ऑक्सफोर्ड' (Morris Oxford Series III) के डिजाइन पर आधारित थी. इसके बाद अगले तीन दशकों तक भारतीय सड़कों पर इसका एकछत्र राज रहा.यह सिर्फ एक गाड़ी नहीं, बल्कि भारत के संभ्रांत वर्ग (Elite Class) की पहचान थी. इसके भारी-भरकम लोहे के ऊंचे ढांचे और मजबूत चेसिस के कारण इसे 'सड़क का टैंक' कहा जाता था, जो उस दौर की गड्ढों से भरी भारतीय सड़कों के लिए सबसे मुफीद थी.उस दौर में शादियों में एंबेसडर कार का दहेज में मिलना या किसी बारात के आगे इसका चलना पूरे खानदान की सामाजिक प्रतिष्ठा और नाक का सवाल माना जाता था.
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एंबेसडर के एकाधिकार का वो दौर
एम्बेसडर के सुनहरे दौर को सिर्फ यादों से नहीं, बल्कि इसके प्रोडक्शन और बाजार हिस्सेदारी के मजबूत आंकड़ों से समझा जा सकता है. 1970 और 1980 के दशक के शुरुआती सालों तक भारतीय कार बाजार के लगभग 70 से 75 फीसदी हिस्से पर अकेले हिंदुस्तान मोटर्स का कब्जा था.
उस दौर में कंपनी का सालाना टर्नओवर करोड़ों में था क्योंकि 'लाइसेंस राज' के कारण बाजार में कोई तीसरी विदेशी कंपनी पैर जमा नहीं सकती थी. गाड़ी खरीदने के लिए लोगों को एडवांस बुकिंग कराकर महीनों और कई बार सालों तक इंतजार करना पड़ता था.
बाजार के प्रतिद्वंदी: जब एंबेसडर को मिली चुनौती
हालांकि पूरी तरह ऐसा भी नहीं था कि सड़कों पर एंबेसडर अकेली थी, लेकिन 'कंट्रोल इकोनॉमी' के उस दौर में इसके प्रतिद्वंदी बेहद सीमित थे. प्रीमियर ऑटोमोबाइल्स की 'फिएट 1100' (बाद में प्रीमियर पद्मिनी) एंबेसडर की सबसे बड़ी और इकलौती मजबूत प्रतिद्वंदी थी. तब जहां एंबेसडर अपने भारी लुक, सरकारी रसूख और बड़े पारिवारिक स्पेस के लिए जानी जाती थी, वहीं फिएट को थोड़ा आधुनिक, कॉम्पैक्ट और शहरी युवाओं की पसंद माना जाता था.इसके बाद 1980 के दशक में खुद हिंदुस्तान मोटर्स ने ही एंबेसडर से ऊपर के सेगमेंट के लिए 'कंटेसा' को लॉन्च किया, जो अपनी 'मसल कार' लुक के कारण बेहद अमीर लोगों की पसंद बनी, लेकिन वह कभी एंबेसडर के मास-प्रोडक्शन और लोकप्रियता का मुकाबला नहीं कर सकी. लंबी दूरी के सफर, आराम और स्टेटस के मामले में एंबेसडर ही हमेशा हावी रही.

कहां बदला वक्त: मारुति की एंट्री और तकनीकी ठहराव
एंबेसडर के इस अजेय साम्राज्य के ढहने की शुरुआत साल 1983 में हुई, जब सरकार के सहयोग से मारुति 800 (Maruti 800) बाजार में आई. मारुति हल्की थी, एंबेसडर के मुकाबले आधा पेट्रोल खाती थी, उसकी कीमत कम थी और उसे भीड़भाड़ वाली सड़कों पर मोड़ना व पार्क करना बेहद आसान था. जो मध्यमवर्ग सालों से एंबेसडर का सपना देखते-देखते थक चुका था, उसने तुरंत मारुति को अपनी 'फैमिली कार' बना लिया.
इसके बाद 1990 के दशक में उदारीकरण के बाद जब विदेशी कार कंपनियां आधुनिक फीचर्स, पावर स्टीयरिंग, बेहतरीन एयर कंडीशनिंग और सुरक्षा मानकों के साथ भारत आईं, तो एंबेसडर उनके सामने टिक नहीं सकी. हिंदुस्तान मोटर्स ने दशकों तक इसके मूल गोल डिजाइन और इंजन तकनीक में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया, जो उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक भूल साबित हुई. धीरे-धीरे यह कार आम लोगों के गैरेज और सरकारी महकमों से बाहर होती चली गई.
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कोलकाता की पीली टैक्सी: एम्बेसडर की आखिरी पनाहगाह
हालांकि जब देश के बाकी हिस्सों ने एंबेसडर से मुंह मोड़ लिया, तब पश्चिम बंगाल की संस्कृति और सड़कों ने इसे जिंदा रखा. आज भी अगर भारत में सबसे ज्यादा एंबेसडर कारें कहीं दिखाई देती हैं, तो वह कोलकाता शहर है.
हालांकि, नए प्रदूषण नियमों और रिप्लेसमेंट के कारण अब इनकी संख्या भी धीरे-धीरे कम हो रही है.
आज का सच: क्या यह ब्रांड वाकई मर चुका है?
लगातार घटती मांग और हर महीने हो रहे भारी घाटे के कारण आखिरकार मई 2014 में हिंदुस्तान मोटर्स ने एंबेसडर का प्रोडक्शन हमेशा के लिए बंद कर दिया और उत्तरपाड़ा प्लांट पर ताला लग गया. लेकिन इस ब्रांड की कहानी का अंत यहां नहीं होता.साल 2017 में फ्रांसीसी ऑटोमोबाइल दिग्गज प्यूज़ो (Peugeot / PSA Group) ने हिंदुस्तान मोटर्स से 'एंबेसडर' ब्रांड नेम और इसके वैश्विक अधिकारों को खरीद लिया था. ऑटोमोटिव इंडस्ट्री में आज भी यह कयास लगाए जाते हैं कि प्यूज़ो इस आइकॉनिक और भरोसेमंद नाम का इस्तेमाल भारतीय बाजार में एक आधुनिक इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) या प्रीमियम एसयूवी सेगमेंट के लिए कर सकती है.बहरहाल सड़कों से भले ही यह पुराना लोहा कम हो गया हो, लेकिन भारत की सत्ता, समाज और संस्कृति के इतिहास से एंबेसडर का नाम कभी मिटाया नहीं जा सकता.
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